जिला जज की अनिवार्य रिटायरमेंट रद्द: सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट की याचिका खारिज की
Amir Ahmad
13 Feb 2026 4:42 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट की याचिका खारिज की, जिसमें जिला जज का अनिवार्य रिटायरमेंट रद्द करने के हाइकोर्ट के ही फैसले को चुनौती दी गई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक अधिकारी को राहत देने वाला हाइकोर्ट का निर्णय पूरी तरह संभव और उचित है इसलिए इसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।
पूरा मामला
यह विवाद 2011 के एक आदेश से जुड़ा है, जिसमें हरियाणा सरकार ने हाइकोर्ट के फुल कोर्ट निर्णय के आधार पर जिला जज डॉ. शिव शर्मा को 58 वर्ष की आयु में अनिवार्य रिटायरमेंट दी थी। डॉ. शर्मा ने इस आदेश को हाइकोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद सितंबर 2025 में चीफ जस्टिस शील नागू और जस्टिस संजीव बेरी की बेंच ने इस रिटायरमेंट आदेश को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया था। हाइकोर्ट ने अपने फैसले में एक पूर्व जज की भी आलोचना की थी, जिन्होंने डॉ. शर्मा की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में बिना किसी ठोस आधार के प्रतिकूल टिप्पणियां दर्ज की थीं।
हाइकोर्ट ने पाया कि डॉ. शर्मा का 30 साल का करियर लगातार 'गुड' और 'वेरी गुड' श्रेणियों में रहा था, लेकिन 2010-11 के मात्र 5 महीनों के दौरान उनके खिलाफ प्रतिकूल रिमार्क दर्ज किए गए।
ये टिप्पणियां किसी लिखित शिकायत या जांच पर आधारित नहीं थीं, बल्कि केवल अपुष्ट आरोपों पर आधारित थीं। इसी आधार पर हाइकोर्ट ने रिटायरमेंट को "कानूनी रूप से दोषपूर्ण और दुर्भावनापूर्ण" माना और अधिकारी को पुरानी वरिष्ठता व वेतन निर्धारण सहित सभी लाभ देने का आदेश दिया।
हाइकोर्ट ने प्रशासनिक पक्ष से इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी (SLP) दायर की थी।
चीफ जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची की बेंच ने सुनवाई के दौरान सीनियर वकील डॉ. एस. मुरलीधर के तर्कों को सुना, लेकिन बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि केवल 5 महीने के कार्यकाल के आधार पर किसी का पूरा करियर खराब करना सही नहीं है।
जस्टिस बागची ने इस बात की भी सराहना की कि हाइकोर्ट के वर्तमान प्रशासन ने अपनी ही न्यायिक बेंच के फैसले को चुनौती देकर निष्पक्षता का उदाहरण पेश किया। अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए जिला जज की बहाली का रास्ता साफ कर दिया।

