CEC के खिलाफ प्रदर्शन से कारोबार प्रभावित होने का आरोप: सुप्रीम कोर्ट ने व्यापारियों से प्रदर्शन आयोजकों को पक्षकार बनाने को कहा

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    सुप्रीम कोर्ट ने 3 नवंबर को उन व्यापारियों को निर्देश दिया, जिन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली में हुए प्रदर्शनों से कारोबार प्रभावित होने का आरोप लगाते हुए याचिका दायर की। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता प्रदर्शन के आयोजकों को भी मामले में पक्षकार बनाएं।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ प्रदर्शनों से जुड़ी याचिकाओं के समूह पर सुनवाई कर रही थी। इनमें कथित पुलिस कार्रवाई, निर्धारित प्रदर्शन स्थलों पर निगरानी और विरोध प्रदर्शन के अधिकार से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।

    पीठ ने किराना कमेटी दिल्ली को निर्देश दिया कि वह उन आयोजकों को याचिका में पक्षकार बनाए, जिनके खिलाफ आरोप लगाए गए।

    व्यापारिक संगठनों की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने कहा कि प्रदर्शनों के कारण दिल्ली में व्यावसायिक गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हुई हैं, खासकर त्योहारों के मौसम में। उन्होंने कहा कि दिल्ली के सभी व्यापारिक संगठनों की ओर से वह पेश हो रहे हैं और उस दिन कनॉट प्लेस में भी दुकानें बंद थीं तथा व्यावसायिक गतिविधियां लगभग ठप थीं।

    रोहतगी ने कहा,

    “मैं दिल्ली के सभी व्यापारिक संगठनों का प्रतिनिधित्व कर रहा हूं। सभी दुकानें बंद हैं। आज कनॉट प्लेस में कोई नहीं है। अगर आप त्योहारों के मौसम में बिक्री नहीं कर पाएंगे, तो हमारी बिक्री घट जाएगी। मेरा अनुरोध है कि इस समस्या का कोई अलग और व्यावहारिक समाधान निकाला जाए।”

    उन्होंने बताया कि दशहरे से पहले वाले सप्ताह में प्रदर्शन बुलाए जाने के कारण दुकानों का कारोबार प्रभावित हुआ। उन्होंने कहा कि व्यापारियों को भारी नुकसान हो रहा है और यदि प्रदर्शन जारी रहे तो दिवाली की बिक्री भी प्रभावित होगी।

    रोहतगी ने कोर्ट से अनुरोध किया कि अगले दो महीनों तक किसी भी तरह के प्रदर्शन या धरने की अनुमति न दी जाए। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि बंद का आह्वान करने वाले आयोजकों को इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी।

    सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर जोर देते हुए कहा कि हर व्यक्ति को प्रदर्शन करने का अधिकार है, लेकिन इसके नाम पर किसी निर्धारित स्थल पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं किया जा सकता।

    चीफ जस्टिस ने कहा,

    “आप किसी जगह पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं कर सकते। किसान, पत्रकार और दूसरे लोग कहां जाएंगे? हर किसी को विरोध करने का अधिकार है। निर्धारित अवधि के लिए ही निर्धारित समय दिया जाना चाहिए।”

    उन्होंने यह भी कहा कि प्रदर्शन की अनुमति देने वाले आदेशों में उसकी शर्तें और अवधि स्पष्ट रूप से तय होनी चाहिए। चीफ जस्टिस ने कहा कि किसी एक समूह को प्रदर्शन की अनुमति मिलने का मतलब यह नहीं है कि वह दूसरों को वहां आने या अपनी गतिविधियां करने से रोक सकता है।

    दिल्ली पुलिस की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति केवल एक दिन के लिए दी गई थी, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने वहां 17 दिनों तक कब्जा बनाए रखा। उन्होंने यह भी कहा कि प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च किया था। बिना पूर्व अनुमति के उन्हें संसद या सुप्रीम कोर्ट की ओर जाने की इजाजत नहीं दी जा सकती थी।

    सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि जंतर-मंतर एक निर्धारित प्रदर्शन स्थल है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा के लिए दिल्ली पुलिस जिम्मेदार थी। उन्होंने करीब 7,000 लोगों को हिरासत में लिए जाने का भी जिक्र किया और सवाल उठाया कि क्या ऐसी कार्रवाई लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है।

    इस पर सॉलिसिटर जनरल ने स्पष्ट किया कि इन लोगों को हिरासत में नहीं लिया गया, बल्कि केवल प्रदर्शन स्थल से हटाया गया।

    सीनियर एडवोकेट एन. हरिहरन ने दलील दी कि व्यापारियों का कारोबार प्रदर्शनों के कारण नहीं, बल्कि दिल्ली पुलिस की ओर से लगाए गए बैरिकेड्स के कारण प्रभावित हुआ। उनके अनुसार, असली सवाल यह है कि पुलिस की कार्रवाई उचित और परिस्थितियों के अनुपात में थी या नहीं।

    कर्नाटक यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (केयूडब्ल्यूजे) की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट पी.वी. दिनेश ने कहा कि प्रदर्शन स्थलों पर भी व्यापारी मौजूद हो सकते हैं। उन्होंने दलील दी कि हर जगह कुछ न कुछ व्यापारिक गतिविधियां होती हैं और यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

    पीठ ने ऑटो-रिक्शा संचालकों और ट्रक ऑपरेटरों को भी मामले में हस्तक्षेप करने की अनुमति दी। इनका कहना है कि प्रदर्शनों के कारण उनके आजीविका के अधिकार पर असर पड़ा है।

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