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CJI पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला ने इन- हाउस पैनल की कार्यवाही में हिस्सा ना लेने का फैसला किया

Live Law Hindi
1 May 2019 5:45 AM GMT
CJI पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला ने इन- हाउस पैनल की कार्यवाही में हिस्सा ना लेने का फैसला किया
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यह कहते हुए कि इन-हाउस कमेटी का माहौल "भयावह" है, भारत के मुख्य न्यायाधीश पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला ने इस कार्यवाही में भाग ना लेने का फैसला किया है।

पीड़ित महिला ने जारी की विज्ञप्ति
एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर पीड़ित महिला ने कहा है कि वो सुप्रीम कोर्ट के 3 न्यायाधीशों की उपस्थिति में और वकील या समर्थन वाले व्यक्ति के बिना डरी और घबराई हुई महसूस करती है।

"मुझे लगता है कि मुझे इस पैनल से न्याय मिलने की संभावना नहीं है और इसलिए मैं अब 3 जजों के पैनल की कार्यवाही में भाग नहीं ले रही हूं," शिकायतकर्ता ने कहा।

उसने अपने फैसले के लिए निम्नलिखित कारकों को बताया है:

"1. बिगड़ी हुई सुनवाई में, घबराहट और भय के बावजूद भी मेरे वकील/समर्थक व्यक्ति की उपस्थिति की अनुमति नहीं है।

2. समिति की कार्यवाही की कोई वीडियो या ऑडियो रिकॉर्डिंग नहीं हो रही है।

3. मुझे 26 और 29 अप्रैल, 2019 को दर्ज किए गए अपने बयानों की प्रति भी नहीं दी गई है।

4. मुझे उस प्रक्रिया के बारे में भी सूचित नहीं किया गया जिसका ये समिति पालन कर रही है "

विशाखा मामले के दिशानिर्देश लागू करने की मांग
पीड़िता ने यह भी उल्लेख किया है कि उसके मामले के गवाह न्यायालय के कर्मचारी हैं और उनकी समिति के सामने बिना किसी डर के पेश होने की कोई संभावना नहीं है। साथ ही उन्होंने यह असंतोष व्यक्त किया कि कार्यस्थल अधिनियम (महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न की रोकथाम) 2013 और विशाखा मामले के दिशानिर्देशों के तहत पैनल के गठन में प्रक्रिया का पालन करने की उनकी मांग को संबोधित नहीं किया गया।

जांच के लिए गठित किया गया है पैनल

23 अप्रैल को पूर्व जूनियर कोर्ट स्टाफ द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच करने के लिए जस्टिस बोबडे, जस्टिस रमना और जस्टिस इंदिरा बनर्जी का एक पैनल गठित किया गया था। बाद में महिला ने जस्टिस बोबडे को एक पत्र लिखा जिसमें जस्टिस रमना को इन-हाउस पैनल में शामिल करने पर आपत्ति जताई गई थी और दावा किया था कि वो CJI के निवास पर लगातार आते- जाते हैं और CJI के 'करीबी दोस्त' हैं। वो CJI के लिए एक परिवार के सदस्य की तरह हैं। महिला कर्मी ने यह भी कहा था कि 20 अप्रैल को जिस दिन उसका हलफनामा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को भेजा गया था, का दिन हैदराबाद में बोलते हुए जस्टिस रमना ने उसके आरोपों को खारिज कर दिया था। इसके कारण जस्टिस रमना ने खुद को अलग कर लिया और उनकी जगह जस्टिस इंदु मल्होत्रा ​​को पैनल में लाया गया।

उनकी प्रेस विज्ञप्ति के अंश:

"26 अप्रैल 2019 को होने वाली समिति की सुनवाई में, समिति के न्यायाधीशों ने मुझे बताया कि यह न तो इन-हाउस पैनल की कार्यवाही है और न ही विशाखा मामले के दिशानिर्देशों के तहत कार्यवाही की जा रहा है। यह सिर्फ अनौपचारिक कार्यवाही है । मुझे अपना ब्यौरा बताने के लिए कहा गया, जो मैंने अपनी क्षमता के अनुसार किया, हालांकि मुझे सुप्रीम कोर्ट के 3 माननीय न्यायाधीशों की मौजूदगी में और मेरे साथ एक वकील या समर्थन वाले व्यक्ति की गैर मौजूदगी में काफी डर और घबराहट महसूस हुई।

मैंने समिति को यह भी बताया था कि तनाव के कारण एक कान से मुझे सुनाई नहीं देता और मैं उसी के लिए दैनिक रूप से उपचार ले रही हू्ं। इसके परिणामस्वरूप मैं कभी-कभी यह सुनने में असमर्थ रही कि माननीय न्यायमूर्ति बोबडे ने समिति के समक्ष मेरे बयानों के रिकॉर्ड के रूप में अदालत के अधिकारी को क्या भेजा है।

आगे समिति ने कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग के लिए मेरे अनुरोध को अस्वीकार कर दिया। मुझे यह भी स्पष्ट रूप से कहा गया था कि समिति की सुनवाई के दौरान मेरे साथ कोई भी वकील/सहायता करने वाला व्यक्ति मौजूद नहीं रह सकता। मुझे मौखिक रूप से यह निर्देश दिया गया था कि मुझे समिति की कार्यवाही का मीडिया में खुलासा नहीं करना चाहिए और अपनी वकील एडवोकेट वृंदा ग्रोवर के साथ कार्यवाही को साझा नहीं करना है।

मुझे अगली सुनवाई के लिए 29 अप्रैल को समिति के समक्ष उपस्थित होने के लिए कहा गया था। "पहली सुनवाई में ही मैंने 2 प्रासंगिक मोबाइल नंबरों के कॉल रिकॉर्ड के सीडीआर और व्हाट्सएप कॉल और चैट के रिकार्ड के लिए समिति के समक्ष एक आवेदन भी किया। हालांकि समिति ने पहली सुनवाई पर मेरे आवेदन को स्वीकार नहीं किया।

वही आवेदन अंततः 30 अप्रैल 2019 को समिति द्वारा लिया गया, जब मैं असहाय और व्यथित महसूस कर रही थी और मैं अब आगे समिति की सुनवाई में भाग नहीं ले सकती।

मैंने पहली समिति की सुनवाई को छोड़ दिया। पहले दिन मैंने देखा कि जिस कार से मैं यात्रा कर रही थी, उसके पीछे एक मोटरसाइकिल पर 2 आदमी सवार थे, जिसका कुछ नंबर मैं नोट कर पाई।

अगली सुनवाई से पहले मैंने माननीय समिति के सदस्यों को यह सब बताते हुए एक विस्तृत पत्र लिखा। मैंने फिर से अनुरोध किया कि समिति की कार्यवाही को एक औपचारिक जांच के रूप में मानते हुए वकील वृंदा ग्रोवर को मेरे साथ आने और सहायता करने की अनुमति दी जाए ताकि मुझे क्रॉस परीक्षा के अधिकार के साथ मौखिक और दस्तावेजी दोनों सबूतों को पेश करने की अनुमति दी जा सके और मेरे आवेदन रिकॉर्ड में लिए जा सकें।

29 अप्रैल को होने वाली सुनवाई में मुझे फिर से मेरे साथ मौजूद वकील/सहायता प्राप्त व्यक्ति की अनुमति नहीं दी गई। मुझसे समिति द्वारा बार-बार यह पूछा गया कि मैंने इतनी देर से यौन उत्पीड़न की शिकायत क्यों की। मुझे समिति का माहौल बहुत भयावह लगा और वकील/सहायक की मौजूदगी के बिना सुप्रीम कोर्ट के 3 जजों द्वारा पूछताछ के कारण मैं घबरा गई।

मुझे यह भी नहीं दिखाया गया कि मेरे किन बयानों को रिकॉर्ड किया जा रहा है। 26 और 29 अप्रैल को दर्ज किए गए मेरे बयान की कोई भी प्रति मुझे आज तक नहीं दी गई है। मुझे आज समिति की कार्यवाही से बाहर निकलने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है क्योंकि समिति इस तथ्य की सराहना नहीं कर रही कि यह एक सामान्य शिकायत नहीं, बल्कि एक CJI के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत है। इसलिए इसमें ऐसी प्रक्रिया अपनाने की आवश्यकता है जो निष्पक्षता सुनिश्चित करे।

मुझे उम्मीद थी कि मेरे प्रति समिति का दृष्टिकोण संवेदनशील होगा और ऐसा कुछ नहीं होगा जो मेरे लिए और अधिक भय, चिंता और आघात का कारण बने। मुझे सूचित नहीं किया गया कि समिति ने मेरी शिकायत पर क्या CJI से कोई प्रतिक्रिया मांगी है? मुझे पैनल द्वारा इन सभी मामलों पर अनुमान लगाने और चिंतित रहने के लिए छोड़ दिया गया है।"

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