अवैध निर्माण गिराने से पहले आश्रय के अधिकार का भी ध्यान जरूरी, नीति बनाने के लिए सरकारों से संपर्क कर सकता है NGO: सुप्रीम कोर्ट
Amir Ahmad
12 Aug 2026 3:42 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अवैध निर्माणों को गिराने की कार्रवाई से जुड़े जनहित याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता गैर-सरकारी संगठन (NGO) को केंद्र, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सरकारों के समक्ष अपनी मांग रखने की स्वतंत्रता दी।
याचिका में ऐसी संतुलित नीति बनाने की मांग की गई थी जिससे नगर नियोजन और भवन कानूनों के पालन के साथ लोगों के आश्रय, आजीविका और गरिमा के अधिकारों की भी रक्षा हो सके।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि यह मुख्य रूप से नीति का विषय है और अलग-अलग राज्यों की परिस्थितियां अलग होने के कारण पूरे देश के लिए एक समान नीति निर्धारित करना उचित नहीं होगा।
पीठ ने सेंटर फॉर लॉ एंड गुड गवर्नेंस की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई की थी जिसमें केंद्र और सभी राज्यों को पक्षकार बनाया गया।
याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष ऐसे मामलों का उल्लेख किया, जहां कथित तौर पर अधिकारियों ने दशकों तक अनधिकृत निर्माणों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की, बल्कि वहां पानी और बिजली जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं तथा नगर निकायों द्वारा कर भी वसूला गया। इसके कई वर्षों बाद उन्हीं निर्माणों को गिराने की कार्रवाई शुरू कर दी गई।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि निर्माण गिराना अत्यंत कठोर कदम है। इसलिए ऐसी नीति होनी चाहिए जो नगर नियोजन और भवन कानूनों को लागू करने तथा लोगों के आश्रय, आजीविका और सम्मान के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करे।
वकील ने कहा कि गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार के एक हिस्से के रूप में आश्रय के अधिकार को न्यायालयों ने मान्यता दी। हालांकि कुछ फैसलों में यह भी कहा गया कि केवल लंबे समय तक किसी अनधिकृत निर्माण के बने रहने से वह वैध नहीं हो जाता, यहां तक कि ऐसे निर्माण भी जो कानून के तहत नियमित किए जा सकते हों।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि कई मामलों में सरकारी एजेंसियों ने अनधिकृत निर्माणों में रहने वाले लोगों को पानी और बिजली के कनेक्शन दिए तथा उनसे नगर निकाय कर वसूला। इसके बावजूद दशकों बाद उन्हीं निर्माणों को गिराने की कार्रवाई की गई।
इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने इस मुद्दे की जांच और उचित व्यवस्था तैयार करने के लिए अदालत की निगरानी में एक समिति गठित करने की मांग की।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इस दौरान कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही निर्माण गिराने की कार्रवाई को लेकर दिशा-निर्देश जारी कर चुका है।
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा,
“आप कानून का शासन लागू करने के लिए राज्य को दी गई शक्तियों का स्थान नहीं ले सकते। ये नीतिगत फैसले हैं। यदि राज्य की नीति मनमानी है या उचित प्रक्रिया का पालन नहीं करती है, तब हम हस्तक्षेप कर सकते हैं।”
अपने आदेश में पीठ ने याचिकाकर्ता की उस चिंता को दर्ज किया कि देश के अलग-अलग हिस्सों में सरकारों ने लंबे समय तक अनधिकृत निर्माणों को चुनौती नहीं दी और कुछ मामलों में पानी-बिजली की सुविधा देकर तथा नगर निकाय कर वसूलकर उनके बने रहने में योगदान भी दिया।
अदालत ने कहा कि ऐसी परिस्थितियां आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और दिल्ली सहित विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सामने आ सकती हैं। वहीं, कुछ अन्य स्थानों पर दशकों पहले बनी अनधिकृत बस्तियों को बिना पर्याप्त नोटिस या प्रभावित परिवारों के लिए उचित कल्याणकारी योजना के गिराने के आदेश दिए जाने की शिकायतें भी सामने आई हैं।
पीठ ने कहा कि वह उन परिवारों को लेकर उठाई गई चिंता को समझती है जिनका आश्रय का अधिकार निर्माण गिराए जाने की कार्रवाई से प्रभावित हो सकता है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों का समाधान मुख्य रूप से नीतिगत स्तर पर किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि परिस्थितियां एक राज्य से दूसरे राज्य में अलग हो सकती हैं और इसलिए नीतियों में भी अंतर की आवश्यकता हो सकती है।
इसी के साथ कोर्ट ने पूरे देश के लिए एक समान नीति निर्धारित करने से इनकार करते हुए जनहित याचिका का निपटारा कर दिया। हालांकि याचिकाकर्ता को याचिका की प्रति केंद्र सरकार, सभी राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों को भेजने की स्वतंत्रता दी गई है।
पीठ ने उम्मीद जताई कि सक्षम प्राधिकारी याचिका में उठाई गई चिंताओं पर उचित विचार करेंगे, विशेष रूप से इस आवश्यकता पर कि नगर नियोजन और भवन कानूनों को लागू करने के साथ-साथ निर्माण गिराए जाने से प्रभावित परिवारों पर पड़ने वाले असर का भी संतुलित तरीके से ध्यान रखा जाए।
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