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प्रसाद मेडिकल कॉलेज घूसकांड : CBI ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवारत जज के खिलाफ केस दर्ज किया

LiveLaw News Network
7 Dec 2019 6:36 AM GMT
प्रसाद मेडिकल कॉलेज घूसकांड : CBI ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवारत जज के खिलाफ केस दर्ज किया
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सीबीआई ने शुक्रवार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस एन शुक्ला के खिलाफ एक मेडिकल कॉलेज का पक्ष लेने के लिए भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया है

न्यायमूर्ति शुक्ला के साथ, एजेंसी ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आईएम कुद्दुसी, प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के भगवान प्रसाद यादव वपलाश यादव और दो अन्य भावना पांडे और सुधीर गिरी को भी आरोपी बनाया है।

सीबीआई ने आरोप लगाया है कि न्यायमूर्ति शुक्ला को लखनऊ में एक मेडिकल कॉलेज चलाने वाले प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के अध्यक्ष बी पी यादव से घूस मिली, जो कि 2017 में एक मामले में अनुकूल आदेश के लिए न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) कुद्दुसी के माध्यम से तय की गई थी।जांच के लिए लखनऊ, मेरठ और दिल्ली में सात स्थानों पर रेड की गई और एजेंसी ने निवेश और वित्तीय लेनदेन के सबूत सहित कई सामग्री जब्त की है।

गौरतलब है कि 31 जुलाई को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की अनुमति दे दी थी

तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने CBI को इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ के जज न्यायमूर्ति एसएन शुक्ला के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA) के तहत FIR दर्ज करने की अनुमति दी थी

दरअसल पूर्व मुख्य न्यायाधीशदीपक मिश्रा द्वारा जज के खिलाफ प्रारंभिक जांच का आदेश यूपी के एडवोकेट जनरल राघवेंद्र सिंह की उस शिकायत पर दिया गया था जिसमें जस्टिस शुक्ला पर गंभीर न्यायिक कदाचार का आरोप लगाया गया था। इन आरोपों की जांच के लिए तीन उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के एक पैनल का गठन किया गया था, जिसने अंततः उन्हें सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन करते हुए छात्रों के प्रवेश की समय सीमा बढ़ाकर एक निजी मेडिकल कॉलेज को फायदा पहुंचाने का दोषी पाया।

पैनल की रिपोर्ट देखने के बाद मुख्य न्यायाधीश मिश्रा ने उन्हें इस्तीफा देने या जल्दी सेवानिवृत्ति लेने के लिए कहा था लेकिन न्यायमूर्ति शुक्ला ने इससे इनकार कर दिया। इसके बाद न्यायमूर्ति शुक्ला द्वारा पूर्व मुख्य न्यायाधीश के समक्ष अपने न्यायिक कार्य को फिर से आवंटित करने का अनुरोध किया गया, जिसे अस्वीकार कर दिया गया था। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने न्यायिक अनियमितताओं और दुर्भावनाओं के कारण न्यायमूर्ति शुक्ला को हटाने के लिए संसद में एक प्रस्ताव लाने के लिए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को लिखा था।

फिर उन्होंने PCA के तहत न्यायमूर्ति शुक्ला के खिलाफ दुराचार और न्यायिक अनियमितताओं के आरोपों पर CBI को FIR दर्ज करने की अनुमति दी। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "मैंने उपरोक्त विषय पर आपके पत्र पर संलग्न नोट पर विचार किया है। मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में, मैं जांच के लिए एक नियमित मामला शुरू करने की अनुमति देने के लिए विवश हूं।"

मुख्य न्यायाधीश ने यह कदम के वीरस्वामी बनाम भारत संघ और अन्य, 1991 SCC (3) 655 में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के मद्देनजर उठाया है, जिसमें अदालत ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज के खिलाफ मुख्य न्यायाधीश को सबूत दिखाए बिना और उनकी अनुमति के बिना FIR दर्ज नहीं हो सकती।विशेष रूप से किसी भी जांच एजेंसी ने 1991 से पहले किसी उच्च न्यायालय के सेवारत जज की जांच नहीं की है इसलिए ये मामला अलग है।

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