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" प्रेस को रोक नहीं सकते " : मुख्य न्यायाधीश ने कोरोना वायरस महामारी का सांप्रदायिकरण करने पर कुछ मीडिया हाउस पर कार्रवाई की मांग वाली याचिका पर कहा

LiveLaw News Network
13 April 2020 12:19 PM GMT
 प्रेस को रोक नहीं सकते  : मुख्य न्यायाधीश ने कोरोना वायरस महामारी का सांप्रदायिकरण करने पर कुछ मीडिया हाउस पर कार्रवाई की मांग वाली याचिका पर कहा
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली के निज़ामुद्दीन में तब्लीगी जमात की बैठक को कोरोना से जोड़कर सांप्रदायिकरण करने पर मीडिया के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करने वाली याचिका पर अंतरिम आदेश पारित करने से इनकार कर दिया।

मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने कहा, "हम प्रेस को रोक नहीं सकते। हम अंतरिम आदेश / निर्देश पारित नहीं करेंगे।"

मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे, जस्टिस एलएन राव और जस्टिस एमएम शांतनागौदर की पीठ ने समाचार सामग्री के बारे में ठोस दीर्घकालिक उपाय करने के लिए कहते हुए मामले को दो सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया। पीठ ने कहा कि इस मामले में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को भी पक्षकार बनाया जाए।

याचिकाकर्ता ने जोर देकर कहा कि अदालत को इस संबंध में कार्रवाई करनी चाहिए क्योंकि कर्नाटक में हिंसा की घटनाएं हुई हैं और लोगों के नाम सार्वजनिक किए गए थे।

याचिकाकर्ता ने जोर दिया, "वे कोरोना रोगियों के नाम और पते प्रकाशित कर रहे हैं। यह कानून के खिलाफ है।"

हालांकि, इसके लिए, पीठ ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता की प्रार्थना हत्याओं और मानहानि की तरफ है तो उसका उपाय कहीं और है।

पिछले हफ्ते, इस्लामिक विद्वानों के संगठन, जमीयत उलमा-ए-हिंद ने दिल्ली के निज़ामुद्दीन में तब्लीगी जमात की बैठक के सांप्रदायिकरण करने के लिए मीडिया के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

दलीलों में कहा गया है कि मीडिया के कुछ वर्ग "सांप्रदायिक सुर्खियों" और " कट्टर बयानों" का इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि पूरे देश में जानबूझकर कोरोना वायरस फैलाने के लिए पूरे मुस्लिम समुदाय को दोषी ठहराया जा सके, जिससे मुसलमानों के जीवन को खतरा है।

याचिका में कहा गया,

"वर्तमान याचिका प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के कुछ वर्गों द्वारा COVID-19 महामारी के प्रकोप को सांप्रदायिक रंग दिए जाने के कारण आवश्यक है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मुसलमानों के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करने वाले और उनके जीवन और स्वतंत्रता के लिए खतरा है।ये सम्मान के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन है जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत भी शामिल है। "

यह बताया गया है कि इस तरह की रिपोर्टिंग ने "सांप्रदायिक दुश्मनी" को जन्म दिया है और ऐसे समय में घृणा फैल गई है जब COVID ​​-19 के खिलाफ लड़ने के लिए एकजुट प्रयासों की आवश्यकता है।

वकील एजाज मकबूल के माध्यम से दायर याचिका में जोर दिया गया है कि मीडिया को मुस्लिम समुदाय के लिए पूर्वाग्रही तथ्य तोड़ मरोड़कर पेश करने की अनुमति देकर सरकार, विशेष रूप से सूचना और प्रसारण मंत्रालय, संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत भारत में सभी व्यक्तियों को कानून की समान सुरक्षा देने के अपने कर्तव्य में विफल रही है।

यह तर्क दिया गया है कि मीडिया ने मुसलमानों को निशाना बनाने के ऐसी रणनीति का सहारा लेकर पत्रकारिता के आचरण के सभी मानदंडों का उल्लंघन किया है। इसके अलावा, इस तरह की रिपोर्टिंग केबल टेलीविजन नेटवर्क नियम, 1994 के नियम 6 के स्पष्ट उल्लंघन में है, जो किसी भी कार्यक्रम को प्रतिबंधित करता है जिसमें धर्म या समुदायों पर हमला या धार्मिक समूहों के प्रति अवमानना ​​या शब्द हैं या जो सांप्रदायिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देते हैं।

याचिका में कहा गया,

"मीडिया के कुछ वर्गों के कार्य न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन द्वारा जारी किए गए आचार संहिता और प्रसारण मानकों की पत्र और भावना के खिलाफ भी हैं, जो समाचार चैनल के लिए नियामक संस्था है। संहिता के तहत, रिपोर्टिंग में तटस्थता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना मीडिया विनियमन के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक है।"

इस प्रकार यह आग्रह किया गया है कि मीडिया को सावधानी के साथ चलने के लिए निर्देशित किया जाए, निजामुद्दीन मरकज की घटना को किसी भी सांप्रदायिक कोण देने के खिलाफ चेतावनी दी जाए और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।

याचिका में आरोप लगाया गया कि सोशल मीडिया भी गलत सूचना और फर्जी खबरों से भरा हुआ है, जिसका उद्देश्य पूरी कोरोना वायरस की घटना को सांप्रदायिक आवाज देना और तब्लीगी जमात के बारे में "साजिश के सिद्धांतों" को देश भर में जानबूझकर फैलाना है।

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