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बिना HSC परीक्षा पास कोई उम्मीदवार ओपन विश्वविद्यालय से स्नातक है तो वह 3 साल के एलएलबी कोर्स में दाख़िला ले सकता है, पढ़िए बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला

Sharafat Khan
7 Aug 2019 9:22 AM GMT
बिना HSC परीक्षा पास कोई उम्मीदवार ओपन विश्वविद्यालय से स्नातक है तो वह 3 साल के एलएलबी कोर्स में दाख़िला ले सकता है, पढ़िए बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला
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अगर कोई उम्मीदवार जिसने किसी ओपन विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री ली है, और अगर वह 10+2 की उच्च माध्यमिक परीक्षा पास नहीं की है तो भी तीन साल के एलएलबी कोर्स में दाख़िला ले सकता है।

एक महत्त्वपूर्ण फैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कोई उम्मीदवार जिसने किसी ओपन विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री ली है, और अगर वह 10+2 की उच्च माध्यमिक परीक्षा पास नहीं की है तो भी तीन साल के एलएलबी कोर्स में दाख़िला ले सकता है।

न्यायमूर्ति एससी धर्माधिकारी और एमएस कार्निक की खंडपीठ ने जून में यह फ़ैसला दिया पर इसे हाल में अपलोड किया गया है। मुंबई विश्वविद्यालय के तीन-वर्षीय लॉ कोर्स में प्रवेश के लिए शोभा बुद्धिवंत की याचिका को बॉम्बे हाईकोर्ट ने सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया था।

पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता ने नासिक के यशवंतराव चह्वान खुला विश्वविद्यालय से 2005 में स्नातक की परीक्षा पास की। इसके बाद उसने मुंबई विश्वविद्यालय से अंगीभूत न्यू लॉ कॉलेज से एलएलबी के पहले वर्ष में दाख़िले के लिए आवेदन दिया।

उसकी प्रवेश प्रक्रिया 18 अगस्त 2011 को पूरी हुई और अगले ही दिन उसे न्यू लॉ कॉलेज ने बताया कि वर्ष 2008 के नियम के अनुसार उसको दाख़िला नहीं मिल सकता है। 8 सितम्बर 2015 को उसे अंततः बताया गया कि बार काउन्सिल ऑफ़ इंडिया ने जो नियम बनाया है उसको विश्वविद्यालय ने स्वीकार किया है और और इस नियम के अनुसार एचएससी की परीक्षा पास किए बिना कोई छात्र अगर डिग्री की परीक्षा पास कर ली है तो भी उसका तीन-वर्षीय लॉ कोर्स में प्रवेश नहीं ले सकता।

याचिकाकर्ता की पैरवी नितिन सतपूते ने की जबकि अमित सले ने बीसीआई की और रुई राड्रीगेज ने लॉ कॉलेज की पैरवी की।

फ़ैसला

सतपूते ने कहा कि याचिकाकर्ता 2005 में ही खुला विश्वविद्यालय से डिग्री की परीक्षा पास कर चुकी है और उस समय लागू नियम के अनुसार उसका एलएलबी में प्रवेश हो सकता था। उन्होंने कहा कि नियम 2008 याचिकाकर्ता पर लागू नहीं होता है।

सतपूते ने जीएस जगदीश बनाम चेयरमैन मामले में मद्रास हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ के फ़ैसले का हवाला दिया कि एक बार जब कोई मान्यताप्राप्त विश्वविद्यालय या बोर्ड कोई प्रमाणपत्र जारी करता है तो फिर कोई और अथॉरिटी उस पर ऊँगली नहीं उठा सकता है बशर्ते कि प्रमाणपत्र को कोई उचित अथॉरिटी या अदालत रद्द न कर दे।

बीसीआई के वक़ील ने कहा कि अगर उम्मीदवार एचएससी की परीक्षा पास किए बिना खुला विश्वविद्यालय से डिग्री हासिल किया है तो उम्मीदार अयोग्य ठहरा दी जाएगी।

खंडपीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उक्त फ़ैसले से सहमति जताते हुए कहा,

"याचिकाकर्ता 12वीं की परीक्षा में असफल हो चुकी है। पर अधिनियम 1989 के नियमों के अनुसार उसने लिखित प्रवेश परीक्षा पास की है जिसकी वजह से वह खुला विश्वविद्यालय के एफवाईबीए कोर्स में दाख़िले के योग्य बन गई। इस स्थिति में प्रतिवादी नम्बर 1 की आपत्ति कि याचिकाकर्ता ने एचएससी की परीक्षा पास नहीं की है, का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। याचिकाकर्ता ने अधिनियम 1989 के तहत स्थापित एक मान्यताप्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री ली है।

यह अनुचित है कि उम्मीदवार से अब भी यह उम्मीद की जाती है कि वह एचएससी की परीक्षा पास होने का प्रमाणपत्र दे। जीएस जगदीश के मामले में आए फ़ैसले में इस मुद्दे का निपटारा कर दिया गया है और इसी संदर्भ में वर्तमान याचिका भी स्वीकार की जा सकती है"।

इस तरह अदालत ने याचिका स्वीकार कर ली और याचिकाकर्ता को तीन-वर्षीय लॉ कोर्स में प्रवेश देने का निर्देश दिया।



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