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हिंदू अविभाजित परिवार की प्रॉपर्टी को संयुक्त संपत्ति साबित करने का दायित्व दावेदार पर: सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
6 April 2020 5:45 AM GMT
हिंदू अविभाजित परिवार की प्रॉपर्टी को संयुक्त संपत्ति साबित करने का दायित्व दावेदार पर: सुप्रीम कोर्ट
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"केवल संयुक्त कारोबार होने के आधार पर ही यह नहीं माना जा सकता कि वह संयुक्त परिवार है"

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हिंदू अविभाजित परिवार की संपत्ति को संयुक्त संपत्ति साबित करने का दायित्व उस व्यक्ति पर है जो ऐसा दावा करता है।

न्यायमूर्ति नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की खंडपीठ ने बंटवारे के एक मुकदमे से उत्पन्न अपील पर विचार करते हुए कहा कि संयुक्त परिवार के अस्तित्व में बने रहने का दावा करने वाले व्यक्ति को ना केवल परिवार के संयुक्त होने की सत्यता को प्रमाणित करना होता है, बल्कि उसके ऊपर यह साबित करने का भी दायित्व होता है कि संबंधित प्रॉपर्टी संयुक्त परिवार की संपत्ति है, जब तक कि यह साबित करने के लिए कोई और दस्तावेज रिकॉर्ड पर ना हो कि संबंधित संपत्ति संयुक्त परिवार की है या सम्मिलित कमाई से खरीदी गई है।

कोर्ट ने संबंधित मुकदमे का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें यह दलील कदापि नहीं है कि संबंधित परिवार हिंदू अविभाजित परिवार था और ना ही यह आरोप है कि परिवार के पास कोई संयुक्त प्रॉपर्टी थी। खंडपीठ ने 'अपालास्वामी बनाम सूर्यनारायणमूर्ति' मामले में प्रिवी काउंसिल के फैसले तथा 'श्रीनिवास कृष्णराव कांगो बनाम नारायण देवजी कांगो' तथा 'डी एस लक्ष्मणैया एवं अन्य बनाम एल. बालासुब्रमण्यम एवं अन्य' के मामले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के फैसलों का भी उल्लेख किया। बेंच ने 'डीएस लक्ष्मणैया' मामले में दिये गये निम्नलिखित टिप्पणियों का उल्लेख किया :-

"इसलिए कानूनी सिद्धांत यह है कि केवल संयुक्त हिंदू परिवार मौजूद होने के आधार पर कोई प्रॉपर्टी संयुक्त परिवार की प्रॉपर्टी नहीं मानी जा सकती। अव्वल तो जो इस प्रकार का दावा करता है उसे यह साबित करना होगा कि प्रॉपर्टी संयुक्त परिवार की संपत्ति है। यदि दावा करने वाला व्यक्ति यह साबित करने में सफल होता है कि विवादित संपत्ति संयुक्त परिवार की कमाई से अर्जित की गई थी तो उसे संयुक्त परिवार की संपत्ति मान ली जाएगी, लेकिन ऐसी स्थिति में तब यह साबित करने का दायित्व दूसरे पक्ष पर चला जाता है कि कथित संपत्ति उसकी खुद के पैसों से खरीदी गयी थी, न कि संयुक्त परिवार की सम्मिलित कमाई से।"

बेंच ने रिकॉर्ड में लाये गए दस्तावेजों के आधार पर कहा कि इस बात का कोई सबूत रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं है कि विवादित प्रॉपर्टी हिंदू अविभाजित परिवार की संपत्ति थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह संयुक्त परिवार की प्रॉपर्टी हो सकती है, लेकिन केवल बंधकपत्र में प्रॉपर्टी का जिक्र किए जाने के आधार पर इसे संयुक्त परिवार की प्रॉपर्टी नहीं कही जा सकती।

कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल कारोबार संयुक्त रूप से होने के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि कि संबंधित परिवार संयुक्त परिवार है।

केस नं. सिविल अपील संख्या 6875/2008

केस का नाम : भगवत शरण बनाम पुरुषोत्तम

कोरम : न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता

वकील : सीनियर एडवोकेट सुशील कुमार जैन एवं हरीन पी रावल

वकील : सीनियर एडवोकेट गुरु कृष्ण कुमार, विकास सिंह एवं अनुपम लाल दास




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