अटार्नी जनरल ने मौलिक कर्तव्यों को लागू करने के निर्देश वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में आपत्ति जताई

  • अटार्नी जनरल ने मौलिक कर्तव्यों को लागू करने के निर्देश वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में आपत्ति जताई

    भारत के अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने सोमवार को उस रिट याचिका पर आपत्ति जताई, जिसमें मौलिक कर्तव्यों को लागू करने के निर्देश और नागरिकों को उनके कर्तव्यों के बारे में जागरूक करने के लिए कदम उठाने की मांग की गई है।

    यह कहते हुए कि कर्तव्यों के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए कानून और न्याय मंत्रालय द्वारा "अत्यधिक काम" किया गया है, एजी ने कहा कि याचिकाकर्ता को रिट याचिका दायर करने से पहले तथ्यों का पता लगाने के लिए पहले शोध करना चाहिए था। एजी ने कहा कि कर्तव्यों को लागू करने के लिए कानून बनाने की प्रार्थना बिल्कुल भी मान्य नहीं है क्योंकि अदालत द्वारा संसद को कोई परमादेश जारी नहीं किया जा सकता है।

    जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एम एम सुंदरेश की पीठ ने 21 फरवरी को याचिका पर नोटिस जारी करते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा था कि क्या माननीय श्री रंगनाथ मिश्र बनाम भारत संघ और अन्य, जिसमें मौलिक कर्तव्यों के संचालन पर जस्टिस जेएस वर्मा समिति की रिपोर्ट की सिफारिशों के कार्यान्वयन के लिए विचार करने और उचित कदम उठाने के लिए केंद्र को निर्देश जारी किए गए थे। पीठ ने केंद्र सरकार से यह भी पूछा था कि क्या वह अपने फैसले को आगे बढ़ाने के लिए कोई कदम उठाने का प्रस्ताव रखती है।

    इसके अलावा, पीठ ने भारत के अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल की सहायता मांगी थी।

    सोमवार को शुरू में एजी ने पीठ से कहा,

    "मैं नोटिस पर पेश हो रहा हूं। मुझे इस याचिका पर ही आपत्ति है क्योंकि न्याय विभाग अपनी वेबसाइट पर इस उद्देश्य के लिए नागरिकों और छात्रों दोनों के लिए, किए गए जबरदस्त काम को दिखाता है। अनुच्छेद 51ए के बारे में जागरूक करने और स्कूलों के पाठ्यक्रम में पूरे 51ए को शामिल किया गया है, जिसमें उन्हें सिखाया जाना है, पूरे देश में बहसें हुई हैं, आदि। नेताओं ने इस पहलू पर संबोधित किया है- समय-समय पर -राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री। एक साल का जागरूकता अभियान चलाया गया..."

    जस्टिस कौल:

    "यह ठीक है। हम नोटिस जारी करने में भी चौकस थे और हमने कहा कि यह राजनीतिक व्यवस्था के दायरे में आता है। हम केवल उस सीमित बिंदु को जानना चाहते थे जिस पर हमने नोटिस जारी किया था, वह याचिकाकर्ता की प्रार्थनाओं का याचिका में ए' और 'जी' संदर्भ था। हम कहते हैं कि रंगनाथ मिश्रा बनाम भारत संघ में अवलोकन के अनुसार, सरकार सूचित कर सकती है कि क्या निर्णय के अनुसार कोई कदम उठाया गया है या क्या वह कोई कदम उठाने का प्रस्ताव करता है। यह हमारे नोटिस का बहुत सीमित जनादेश है।"

    एजी:

    "यह न्याय मंत्रालय की वेबसाइट पर विस्तृत रूप से सेट किया गया है। किसी भी जनहित याचिका की ओर से एक कर्तव्य है कि पहले जांच करें और फिर आगे आकर कहें कि क्या आवश्यक है। नागरिक कर्तव्य जागरूकता कार्यक्रम हुआ था। लगभग 48 करोड़ नागरिकों को कवर करते हुए स्कूलों में कार्यक्रम हुए हैं..."

    जस्टिस कौल:

    "क्या आप हलफनामे को रिकॉर्ड में रख सकते हैं ताकि हमें इसे देखने और ठोस आदेश पारित करने का भी लाभ मिल सके?"

    एजी:

    "मैं अटॉर्नी जनरल के रूप में पेश हो रहा हूं। आप भारत संघ को निर्देशित कर सकते हैं ..."

    जस्टिस कौल:

    "आप कहते हैं कि फैसले का जनादेश लागू कर दिया गया है?"

    एजी:

    "पीआईएल याचिकाकर्ता पर पहले तथ्य जानने का कर्तव्य है"

    जस्टिस कौल:

    "हम ध्यान देंगे कि भारत संघ इसे रिकॉर्ड में रख सकता है, फिर हम कार्यवाही बंद कर देंगे"

    एजी:

    "प्रार्थना (ए) और (जी) एक कानून बनाने के लिए दिशानिर्देश की मांग कर रही हैं जो आप नहीं कर सकते ..."

    जस्टिस कौल:

    "इसलिए, सवाल यह है कि क्या आप कुछ करने का प्रस्ताव रखते हैं या नहीं?"

    एजी:

    "नहीं, माई लॉर्ड्स, इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। सबसे पहले, आप संसद को कानून बनाने का निर्देश नहीं देंगे ..."

    सॉलिसिटर जनरल की ओर से पेश हुए एक वकील ने कहा,

    "हम निर्देश लेंगे और इस मामले में जवाब दाखिल करेंगे"

    जस्टिस कौल:

    "हमें सरकार द्वारा बताया गया है कि सॉलिसिटर जनरल भी पेश हो रहे हैं और वे रिकॉर्ड पर रखना चाहेंगे ..."

    एजी:

    "मैं अटॉर्नी जनरल के रूप में पेश हो रहा हूं, एसजी भारत संघ के लिए उपस्थित होंगे"

    जस्टिस कौल:

    "हां, और सबसे वरिष्ठ कानून अधिकारी के रूप में, हम आपसे जानना चाहते थे कि क्या हो रहा है"

    एजी:

    "प्रार्थना में मौलिक कर्तव्यों के पालन को सुनिश्चित करने और नागरिकों को अपने मौलिक कर्तव्यों को ठीक से निर्वाह करने की आवश्यकता के लिए व्यापक अच्छी तरह से परिभाषित कानून बनाने के लिए केंद्र और राज्यों को निर्देश जारी करने की मांग की है। मुझे नहीं लगता कि प्रार्थना कैसे सुनवाई योग्य होगी। (छ) मौलिक कर्तव्यों के प्रदर्शन के संबंध में लोगों को जागरूक करने और नागरिकों के बीच सामान्य जागरूकता फैलाने के लिए पर्याप्त उचित कदम उठाने के लिए दिशानिर्देश/विनियम बनाने की मांग करती है। प्रार्थना सुनवाई वाली नहीं होगी!

    जस्टिस कौल:

    "इसीलिए हमने कहा था कि सरकार अदालत को सूचित कर सकती है कि क्या निर्णय के अनुसरण में कोई कदम उठाया गया है या यदि वह प्रस्तावित करता है। हम अपने परमादेश का उपयोग नहीं करेंगे"

    एजी:

    "बहुत अच्छा। सॉलिसिटर जनरल जवाब दाखिल कर सकते हैं। लेकिन पूरी बात वेबसाइट पर है..."

    इसके बाद पीठ निम्नलिखित आदेश को निर्देशित करने के लिए आगे बढ़ी:

    "एजी पेश हुए और कहा कि स्वयं वेबसाइट पर ही बड़ी मात्रा में सामग्री है जिसे याचिकाकर्ता को खुद को अवगत कराना चाहिए था और जो उसे उन सवालों के जवाब देती है जो वह पूछना चाहते हैं।यह इस तथ्य से अलग है कि अटॉर्नी का कहना है कि मांगे गए परमादेश की प्रकृति प्रदान नहीं की जा सकती है। हमने विद्वान वकील को बताया कि माननीय रंगनाथ मिश्र बनाम भारत संघ मामले में इस न्यायालय के निर्णय के अनुसरण में उठाए गए कदमों, यदि कोई हो, के बारे में सरकार को सूचित करने के लिए हमने एक बहुत ही संकीर्ण दिशा में नोटिस जारी किया था। भारत संघ की ओर से, पेश होने वाले वकील का कहना है कि सॉलिसिटर जनरल पेश होंगे और वे जवाबी हलफनामे को रिकॉर्ड में रखना चाहेंगे। उत्तरदाताओं 1 और 2 की ओर से चार सप्ताह के भीतर आवश्यक कार्य किया जाना चाहिए। कुछ अन्य राज्यों ने भी उपस्थिति दर्ज कराई है और यदि वे चाहें तो उसी अवधि के भीतर अपना जवाबी हलफनामा भी दाखिल कर सकते हैं। जवाबी हलफनामा, यदि कोई हो, उसके बाद दो सप्ताह के भीतर दाखिल किया जाना चाहिए। ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद जुलाई 2022 के पहले विविध सप्ताह में सूचीबद्ध किया जाए ।"

    केस: दुर्गा दत्त बनाम भारत संघ और अन्य।

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