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अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट के बोझ को कम करने के लिए क्षेत्रीय अपीलीय अदालतों की वकालत की

LiveLaw News Network
27 Nov 2021 10:06 AM GMT
अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट के बोझ को कम करने के लिए क्षेत्रीय अपीलीय अदालतों की वकालत की
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एटॉर्नी जनरल ऑफ इंडिया केके वेणुगोपाल ने संविधान दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में कहा‌ कि कम से कम 4 क्षेत्रों (उत्तर, दक्षिण, पश्चिम और पूर्व) अपीलीय न्यायालय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, "मैं कम से कम 4 क्षेत्रों की परिकल्पना करूंगा, उत्तर, दक्षिण, पश्चिम और पूर्व। सभी में अपीलीय न्यायलय होगा, जिनमें 3 जजों की 3 पीठ को मिलाकर 15 जज होंगे।

" हम 60 जजों को जोड़ रहे हैं, जो मामलों को देखेंगे ताकि लंबित मामलों में काफी हद तक कटौती की जा सके। इसे कम किया जाएगा ताकि आप 3 या 4 साल की अवधि के भीतर मामलों का निपटारा कर सकें। इसका मतलब यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट को 34 जजों की जरूरत नहीं होगी, जो अभी उसके पास हैं। एक बार जब यह रेंट कंट्रोल, वैवाहिक मामलों आदि के बोझ से मुक्त हो जाता है और इसका परिणाम यह होता है कि 5 में से प्रत्येक की 3 संविधान पीठों में बैठे 15 जज संवैधानिक प्रकृति के मामलों को निपटाने के लिए पर्याप्त होंगे या जहां मौत की सजा शामिल होगी या संदर्भों की संवैधानिक आवश्यकता होगी आदि...।"

एटॉर्नी जनरल (एजी) ने अपने भाषण की शुरुआत यह कहते हुए की कि पिछले 75 वर्षों का एक बड़ा सवाल यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट एक संवैधानिक न्यायालय है। उन्होंने कहा कि आज सुप्रीम कोर्ट ने मामलों में अपने कवरेज का विस्तार किया है और हाईकोर्ट द्वारा तय किए गए उन सभी मामले को शामिल किया है, जिनमें निर्णय में गलती है, कानून को सही ढंग से नहीं रख गया है या तथ्यों की गंभीर गलतियां हैं।

उन्होंने कहा,

"अब इसका मतलब यह है कि जहां तक ​​सुप्रीम कोर्ट का संबंध है, यह वास्तव में संवैधानिक न्यायालय होने का दावा नहीं कर सकता है। आपको यह याद रखना होगा कि जहां तक ​​पश्चिमी सर्वोच्च न्यायालयों का संबंध है, उन्होंने अपने काम को इस तरह से प्रबंधित किया है कि वे 2 साल की अवधि के भीतर अपने मामलों का निपटान करने में सक्षम हैं। लेकिन जहां तक ​​भारत का संबंध है, वास्तविक स्थिति क्या है। हम पाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की सूची में 2008 से आपराधिक मामले लंबित हैं, 2009 से दीवानी मामले लंबित हैं और अगर यह 12 साल से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है तो यह सोचना चाहिए कि मामले ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट से आए हैं, जहां वे 10 साल लंबित रहे होंगे और लगभग 8/10 साल सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित हैं।"

2010 में शुरू किए गए प्रस्ताव पर भरोसा करते हुए एटॉर्नी जनरल ने कहा कि आज सभी मामलों (विवाह, किराया नियंत्रण, अधिग्रहण मामलों आदि) को संभालने के लिए अपीलीय अदालतों की आवश्यकता है जिनका संविधान या संविधान की व्याख्या से कोई लेना-देना ना हो।

एजी ने कहा कि इससे सुप्रीम कोर्ट के जज आराम से बैठकर मामलों की सुनवाई कर सकेंगे, बेहतरीन फैसले लिख सकेंगे, अलग-अलग देशों में लिखी गई कानून की किताबें पढ़ सकेंगे और उसे अपने फैसले में शामिल कर सकेंगे।

जस्टिस केके मैथ्यू के उस लेख का उल्लेख करते हुए जिसमें उन्होंने कहा था कि वह उचित समय में 100 जजों युक्त सुप्रीम कोर्ट की परिकल्पना कर सकते हैं एजी ने कहा, "अगर यह सच है तो मैं कहूंगा कि जहां तक ​​हमारा संबंध है, हम अपनी अदालत प्रणाली के विनियमन ढांचे में विफलता को स्वीकार कर रहे हैं, जहां यह इस देश के वादियों को तेजी से और उचित मूल्य पर न्याय दिलाने में सक्षम होगी।"

उन्होंने यह भी कहा कि समय आ गया था जब सुप्रीम कोर्ट के पूरे ढांचे पर पुनर्विचार करने की जरूरत है, जैसा यह आज मौजूद है क्योंकि हर चीज को कालीन के नीचे डालने पर कोई फायदा नहीं होगा। यह कहते हुए कि जो भी सुधार लागू होने जा रहे थे, उन्हें सुप्रीम कोर्ट तक ही सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि हाईकोर्टों और ट्रायल कोर्ट के लिए भी लागू किया जाना चाहिए।

"क्या हम इस तथ्य से अवगत हैं कि जब ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही चलती है तो एक वादी को क्या पीड़ा होती है और वे प्रतीक्षा करते हैं और हर बार मामले को 6 महीने के लिए स्थगित कर दिया जाता है और वे नहीं जानते कि मामला कब उठाया जाएगा और कब समाप्त होगा? "

एजी ने मामलों के निपटान के लिए देश में अपनाई गई बोझिल प्रक्रिया को दूर करने का भी आग्रह किया।

"आज हमें एक ऐसी प्रणाली विरासत में मिली है जो बेहद बोझिल है जहां सीपीसी में प्रक्रिया जो एक मोटी किताब है, उसके परिणामस्वरूप मामलों के निपटारे में देरी होती है। आपराधिक मामलों में निश्चित रूप से एक प्रक्रिया होती है जो अभियुक्त की रक्षा का पूरा अधिकार देती है, लेकिन मुझे लगता है कि बोझिल प्रक्रिया को दूर किया जाना चाहिए।"

अपने भाषण को समाप्त करते हुए एजी ने कहा कि अब समय आ गया है कि सरकार और न्यायपालिका को अदालतों के कामकाज की संरचना को बदलने के लिए एक साथ मिलकर काम करना चाहिए।

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