अनुसूचित जनजातीय क्षेत्रों में नगरपालिकाओं की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने सांसद को केंद्र सरकार से संपर्क करने को कहा

Amir Ahmad

4 Aug 2026 3:37 PM IST

  • अनुसूचित जनजातीय क्षेत्रों में नगरपालिकाओं की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने सांसद को केंद्र सरकार से संपर्क करने को कहा

    सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जनजातीय क्षेत्रों के शहरी इलाकों में नगरपालिकाओं के गठन की मांग वाली याचिका का निस्तारण करते हुए याचिकाकर्ता और लोकसभा सांसद राजकुमार रोत को केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालय के समक्ष अपनी मांग रखने की स्वतंत्रता दी।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने कहा कि यह विषय विधायी नीति के दायरे में आता है, इसलिए इस पर निर्णय लेना संसद और सरकार का क्षेत्राधिकार है।

    सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता स्वयं लोकसभा सदस्य हैं और यदि उन्हें इस विषय पर कानून बनाने की आवश्यकता महसूस होती है तो वे संसद में निजी सदस्य विधेयक भी प्रस्तुत कर सकते हैं।

    अदालत ने पूछा कि जब यह विषय विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है तो इसके लिए न्यायालय का दरवाजा क्यों खटखटाया गया।

    राजस्थान के बांसवाड़ा से सांसद और भारत आदिवासी पार्टी के नेता राजकुमार रोत ने अपनी याचिका में कहा था कि संविधान के 74वें संशोधन के माध्यम से शहरी स्थानीय स्वशासन के लिए संविधान में भाग 9-क जोड़ा गया था। हालांकि, संविधान के अनुच्छेद 243जेडसी के तहत अनुसूचित क्षेत्रों को इसके स्वतः लागू होने से बाहर रखा गया।

    याचिका में कहा गया कि इसी प्रकार 73वें संविधान संशोधन के जरिए ग्रामीण स्थानीय स्वशासन के लिए भाग 9 जोड़ा गया था और बाद में संसद ने पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 बनाकर उसे अनुसूचित क्षेत्रों में लागू किया। लेकिन 74वें संशोधन के तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद अनुसूचित जनजातीय क्षेत्रों के शहरी क्षेत्रों के लिए ऐसा कोई कानून नहीं बनाया गया।

    याचिकाकर्ता का कहना था कि अनुसूचित क्षेत्रों में तेजी से शहरीकरण, जनसंख्या वृद्धि, बुनियादी ढांचे का विस्तार और आर्थिक गतिविधियों में बढ़ोतरी के कारण कई बस्तियां अब शहरी स्वरूप ले चुकी हैं। इसके बावजूद वे नगरपालिकाओं की व्यवस्था से बाहर हैं।

    याचिका में दावा किया गया कि इस विधायी और प्रशासनिक रिक्तता के कारण अनुसूचित क्षेत्रों के निवासी भूमि उपयोग, सार्वजनिक ढांचा, स्थानीय नियोजन, स्वच्छता, जनस्वास्थ्य, नगर वित्त और पर्यावरण संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर प्रभावी ढंग से भागीदारी नहीं कर पा रहे हैं।

    याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि उन्होंने 6 मई 2026 को इस संबंध में आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय को प्रतिनिधित्व दिया, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

    याचिका में स्पष्ट किया गया कि संसद को किसी विशेष प्रकार का कानून बनाने का निर्देश देने की मांग नहीं की गई। बल्कि संविधान के अनुच्छेद 243जेडसी के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए उपयुक्त संवैधानिक दिशा-निर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया। इसके लिए विशाखा बनाम राजस्थान और अनीप बरनवाल मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा विधायी रिक्तता की स्थिति में जारी किए गए दिशा-निर्देशों का भी हवाला दिया गया।

    याचिका में केंद्र सरकार को जनजातीय कार्य मंत्रालय, आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय, संवैधानिक विशेषज्ञों, जनजातीय प्रशासन और शहरी नियोजन विशेषज्ञों तथा अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधियों की एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश देने की भी मांग की गई, ताकि अनुसूचित क्षेत्रों में नगर प्रशासन की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा कर आवश्यक विधायी और प्रशासनिक सुधारों की सिफारिश की जा सके।

    हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मामले में कोई निर्देश जारी करने के बजाय याचिका का निस्तारण करते हुए याचिकाकर्ता को केंद्र सरकार के समक्ष अपनी मांग रखने की स्वतंत्रता दी।

    स्टोरी को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story