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विशेष आवश्यकता वाले छात्रों के लिए शिक्षकों की नियुक्ति- 'यूपी सरकार इस मुद्दे पर सो रही है, इसे अति-संवेदनशीलता दिखानी चाहिए': सुप्रीम कोर्ट

Brij Nandan
25 Nov 2022 6:27 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए एक 'अपर्याप्त' हलफनामा दाखिल करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाई, जिसमें विशेष आवश्यकता वाले छात्रों को पढ़ाने के लिए राज्य में विशेष शिक्षकों की कमी पर प्रकाश डाला गया था।

सुनवाई के दौरान यूपी सरकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि वे 12000 नियमित शिक्षकों की नियुक्ति पर विचार कर रहे हैं और इसके लिए बजट आवंटित किया जा चुका है।

जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सुधांशु धूलिया की खंडपीठ ने पूछा,

"इस सहस्राब्दी में कब?"

खंडपीठ ने आगे पूछा,

"अब हमें सरकार के उठने तक इंतजार करना चाहिए?"

वकील ने कहा,

"यौर लॉर्डशिप, आप हमें निर्देश दे सकते हैं।"

कोर्ट ने कहा,

"क्या पूरी सरकार हमें ही चलानी है? आप हमें निर्देश देने के लिए कह रहे हैं, वे (याचिकाकर्ता) हमें निर्देश देने के लिए कह रहे हैं। इसके बाद आप कहेंगे कि न्यायालय अपनी सीमा का उल्लंघन कर रहा है।"

कोर्ट ने कहा,

"आप खड़े हैं, बैठे हैं या सो रहे हैं, हम यह जानना नहीं चाहते। आप इसे करें। अभी तक, आप बस सो रहे हैं, और कुछ नहीं। इस तरह के मामले हैं जहां आपको अति-संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। यह अपेक्षित है। हम बुलाते और उपदेश देते रहते हैं, यह क्या है? क्या यह हमारे द्वारा किया जाना है, मैडम?"

वकील ने खंडपीठ को सूचित करते हुए कहा कि नोडल शिक्षकों की नियुक्ति की जा चुकी है। प्रक्रिया "चालू" है।

खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि समस्या यह है कि नियमित नियुक्तियां नहीं की जाती हैं। योग्य लोगों को प्रतीक्षा में रखा जाता है।

वकील ने कहा,

"नोडल शिक्षकों को 90 दिनों का प्रशिक्षण दिया जाता है।"

बेंच ने कहा,

"लेकिन पहले से ही योग्य और प्रशिक्षित शिक्षकों को इंतजार किया जा रहा है। यह बैक-डोर एंट्री भी नहीं है, यह बैक-वेंटिलेटर एंट्री है।"

सुनवाई आगे बढ़ने पर बेंच ने पूछा,

"यूपी राज्य हमें बता रहा है कि इस परियोजना के लिए 2115 शिक्षक पर्याप्त हैं?"

याचिकाकर्ताओं के पक्ष ने बताया,

"और 13 लाख विशेष आवश्यकता वाले छात्र हैं।"

खंडपीठ ने तब राज्य सरकार से आग्रह किया कि वह सफाई दे और अपनी कार्ययोजना के बारे में अदालत को सूचित करे।

पीठ ने कहा,

"यहां तक कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित है, तब भी आप परेशान नहीं होते हैं। आप चाहते हैं कि चीजें कागजों के इस ढेर में खो जाएं? अन्यथा साफ और सीधे सामने आएं, आप क्या करना चाहते हैं।"

खंडपीठ ने राज्य सरकार के रुख पर भी असंतोष व्यक्त किया।

पीठ ने कहा,

"आपने (सरकार के प्रस्ताव) जो कहा है, उसके एक भी शब्द से हम संतुष्ट नहीं हैं। अगर ऐसा हो रहा है, तो नोडल एजेंसी को भूल जाइए, हम आपके विभाग को संभालने के लिए किसी को नियुक्त करने जा रहे हैं। अगर आपके अधिकारी काम करने को तैयार नहीं हैं तो कोई और इस विभाग को चलाएगा।"

कोर्ट ने आगे कहा,

"आपको ये प्रस्ताव देने वाला व्यक्ति वास्तव में वर्तमान में 'विशेष आवश्यकता' वाला है। वह भी इतने संवेदनशील मामले में, विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों की जरूरत है। जब पद सृजित होंगे, कृपया हमें बताएं।"

याचिकाकर्ताओं ने सूचित किया कि न्यायालय द्वारा पारित पिछले आदेशों के संबंध में अन्य राज्यों द्वारा भी पर्याप्त और प्रभावी अनुपालन नहीं किया गया है।

2021 में, न्यायालय के तीन-न्यायाधीशों ने इस मामले में कई निर्देश जारी किए थे। कोर्ट ने केंद्र सरकार से विशेष स्कूलों के लिए छात्र शिक्षक अनुपात के मानदंडों और मानकों को अधिसूचित करने के लिए कहा गया था।

विभिन्न राज्यों के शिक्षकों की ओर से पेश वकीलों ने सुनवाई के दौरान कहा कि कई राज्यों में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए नियमित शिक्षकों और शिक्षकों के बीच कोई समानता नहीं है। वकीलों ने बताया कि इन शिक्षकों की स्थायीता एक और समस्या है।

जैसे ही सुनवाई समाप्त हुई जस्टिस माहेश्वरी ने कहा,

"हमारे पास व्यावहारिक समाधान हैं। राज्यों के लिए पेश होने वाले वकील कृपया अपने विभागों के साथ चर्चा करें।"

पीठ ने इसके बाद यूपी, गुजरात, पश्चिम बंगाल और केरल राज्यों के वकीलों को निर्देश दिया कि वे अपने-अपने विभागों को उचित सलाह दें और अतिरिक्त हलफनामे दाखिल करें।

मामले की अगली सुनवाई दिसंबर के दूसरे सप्ताह में होगी।

केस टाइटल- रजनीश कुमार पाण्डेय और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य | डब्ल्यूपी (सी) संख्या 132/2016 एक्स

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