CAA विरोधी प्रदर्शन : UP में प्रदर्शनकारियों से संपत्ति का नुकसान वसूलने के नोटिस के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका

CAA विरोधी प्रदर्शन : UP में प्रदर्शनकारियों से संपत्ति का नुकसान वसूलने के नोटिस के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका

दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून और NRC के खिलाफ के विरोध प्रदर्शनों के कारण सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई के लिए उत्तर प्रदेश के जिला प्रशासन द्वारा जारी नोटिस को रद्द करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है।

कथित तौर पर, 19 दिसंबर, 2019 को लखनऊ और राज्य के अन्य हिस्सों में हुए विरोध प्रदर्शनों में सरकारी और निजी संपत्ति को कई नुकसान पहुंचाया गया जिसमें सरकारी बसें, मीडिया वैन, मोटर बाइक, आदि भी शामिल थी।

मोहम्मद शुजाउद्दीन बनाम उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2010 के फैसले के अनुसार ये नोटिस जारी किए गए जिसमें कहा गया था कि सरकार द्वारा नामांकित प्राधिकरण को नुकसान का आकलन और जनता से दावे प्राप्त करने हैं।

वकील परवेज आरिफ टीटू द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि उच्च न्यायालय का उक्त आदेश सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वत: संज्ञान लेकर दिए गए " डेस्टरेक्शन ऑफ पब्लिक एंड प्राइवेट प्रॉपर्टीज बनाम सरकार (2009) 5 SCC 212 में पारित दिशानिर्देशों का उल्लंघन है।

उस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहते हुए दिशा-निर्देश जारी किए थे कि हिंसा के कारण इस तरह के हर्जाने की वसूली के लिए विधानमंडल की अनुपस्थिति में, उच्च न्यायालय अपने दम पर सार्वजनिक संपत्ति को बड़े पैमाने पर नुकसान की घटनाओं का संज्ञान ले सकता है और मुआवजे की जांच और हर्जाना देने के लिए मशीनरी की स्थापना कर सकता है।

दिशानिर्देशों में कहा गया है कि हर्जाने या जांच की देयता का अनुमान लगाने के लिए एक वर्तमान या सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को दावा आयुक्त के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। ऐसा कमिश्नर हाईकोर्ट के निर्देश पर सबूत ले सकता है। एक बार देयता का आकलन करने के बाद इसे हिंसा के अपराधियों और घटना के आयोजकों द्वारा वहन किया जाएगा।

याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि उच्च न्यायालय का आदेश सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विपरीत है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने हर राज्य के उच्च न्यायालयों पर अभियुक्तों से नुकसान और वसूली के आकलन का जिम्मा सौंपा था जबकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इसमें दिशा-निर्देश दिए हैं कि राज्य सरकार इन प्रक्रियाओं को शुरू करे।

उनके अनुसार इसके गंभीर निहितार्थ हैं। उन्होंने कहा, "न्यायिक निरीक्षण / न्यायिक सुरक्षा एक प्रकार का सुरक्षा तंत्र है, जो मनमानी कार्रवाई के खिलाफ है। इसका मतलब है कि राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी अपने राजनीतिक विरोधियों या अन्य लोगों द्वारा विरोध के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है।"

याचिकाकर्ता ने आगे कहा है कि नोटिस बहुत ही मनमाने तरीके से जारी किए गए हैं, क्योंकि जिन लोगों को नोटिस भेजे गए हैंं ,उनके खिलाफ एफआईआर या कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया गया है।

याचिका में खुलासा किया गया है कि पुलिस ने 94 साल की उम्र में 6 साल पहले मरने वाले व्यक्ति बन्ने खान के खिलाफ मनमाने तरीके से नोटिस जारी किया था और साथ ही 90 साल की उम्र के 2 बुजुर्गों को भी नोटिस भेजा जिसका देश भर में प्रचार हुआ।

याचिकाकर्ता ने सीएए-एनआरसी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं की एक स्वतंत्र न्यायिक जांच कराने के लिए भी निर्देश मांगे गए हैं।

उन्होंने कहा कि सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन को विफल करने के लिए, यूपी प्रशासन के निर्देशों पर पुलिस ने सार्वजनिक जवाबदेही के खिलाफ भारी बल बल का इस्तेमाल किया और कानून के शासन के नियम के उलट संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 20 और 21 के तहत नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया। याचिका को वकील नीलोफर खान ने तैयार किया है।