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स्पेशल मैरिज एक्ट को जेंडर न्यूट्रल बनाने, LGBTQ+ समुदाय को सेम-सेक्स मैरिज की अनुमति देने की मांग करते हुए गे कपल ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया

Brij Nandan
25 Nov 2022 5:06 AM GMT
LGBTQ+ समुदाय
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 LGBTQ+ समुदाय

स्पेशल मैरिज एक्ट को जेंडर न्यूट्रल बनाने और LGBTQ+ समुदाय को सेम-सेक्स मैरिज की अनुमति देने की मांग करते हुए गे कपल ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में जनहित याचिका दायर की है।

याचिका में कहा गया है कि उनको भी अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति से शादी करने का मौलिक अधिकार है।

वे प्रार्थना करते हैं कि विशेष विवाह अधिनियम, जो विवाह की संस्था के लिए एक धर्मनिरपेक्ष कानून है, को किसी भी जेंडर या सैक्सुअल आधारित प्रतिबंधों को दूर कर जेंडर न्यूट्रल बनाया जाए।

याचिका में कहा गया है कि अधिनियम की धारा 4 किसी भी दो व्यक्तियों को विवाह करने की अनुमति देती है, लेकिन बाद की शर्तें केवल पुरुषों और महिलाओं के लिए इसके आवेदन को प्रतिबंधित करती हैं।

याचिका में कहा गया,

"पुरुष' और 'महिला' शब्दों की धारा 4 (सी) में उपयोग, साथ ही अधिनियम के अन्य वर्गों में 'पति/पत्नी' और 'दुल्हा/दुल्हन' जैसे जेंडर से संबंधित भाषा का उपयोग, शादी की पहुंच को एक 'पुरुष' और एक 'महिला' के जोड़े तक सीमित करता है। इस तरह की पहुंच को सीमित करना, एलजीबीटीक्यू + समुदाय के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और यह असंवैधानिक है।"

याचिका में आगे कहा गया है कि अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार भारत के संविधान के तहत प्रत्येक "व्यक्ति" को दिया गया मौलिक अधिकार है। हालांकि, इस देश में विवाह की संस्था को नियंत्रित करने वाला कानूनी ढांचा वर्तमान में LGBTQ+ समुदाय के सदस्यों को उनकी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने की अनुमति नहीं देता है।

यह संविधान के भाग III के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, जिसमें अनुच्छेद 14, 15, 19 (1) (ए) और 21 शामिल हैं, वे विरोध करते हैं।

पार्थ फिरोज मेहरोत्रा और उदय राज आनंद पिछले 17 सालों से एक-दूसरे के साथ रिलेशनशिप में हैं। उनका दावा है कि वे वर्तमान में दो बच्चों की परवरिश एक साथ कर रहे हैं, लेकिन वे कानूनी रूप से अपनी शादी को संपन्न नहीं कर सकते हैं, इसके परिणामस्वरूप ऐसी स्थिति पैदा हो गई है, जहां दोनों याचिकाकर्ता अपने दोनों बच्चों के साथ माता-पिता और बच्चे का कानूनी संबंध नहीं रख सकते हैं।

NALSA बनाम भारत संघ पर भरोसा किया गया है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि हमारा संविधान नॉन-बाइनरी व्यक्तियों की रक्षा करता है और अनुच्छेद 14, 15, 16, 19 और 21 के तहत परिकल्पित सुरक्षा "पुरुष" "या" महिला के बाइलॉजिकल सेक्स तक सीमित नहीं हो सकती है।

इसमें नवतेज सिंह जौहर और अन्य बनाम भारत संघ का भी जिक्र है। इस मामले में कहा गया था कि समलैंगिकों को सम्मान के साथ जीने का मौलिक अधिकार है। समान कानूनों के संरक्षण के हकदार हैं, और बिना किसी भेदभाव के समाज में रहने के हकदार हैं।"

सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी और एडवोकेट सौरभ कृपाल पेश होंगे।



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