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' पशु बलि धार्मिक प्रथा का एक अभिन्न अंग': केरल हाईकोर्ट के पशु व पक्षियों की बलि पर रोक के कानून को बरकरार रखने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका

LiveLaw News Network
26 Jun 2020 4:50 AM GMT
 पशु बलि धार्मिक प्रथा का एक अभिन्न अंग: केरल हाईकोर्ट के पशु व पक्षियों की बलि पर रोक के कानून को बरकरार रखने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका
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Animal Sacrifice An Essential Religious Practice': Plea In SC Against Kerala HC Judgment Upholding Law Prohibiting Animals and Birds Sacrifices

 केरल पशु और पक्षी बलि निषेध अधिनियम, 1968 की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखने वाले केरल उच्च न्यायालय के एक आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई है।

शक्ति पूजा करने वाले पीई गोपालकृष्णन ने यह अपील करते हुए दावा किया है कि पशु बलि उनकी धार्मिक प्रथा का एक अभिन्न अंग है और इस तरह उच्च न्यायालय का आदेश संविधान के अनुच्छेद 25 (1) के तहत उनके मौलिक अधिकार से टकराता है।

दरअसल 16 जून, 2020 को दिए गए आदेश में केरल उच्च न्यायालय ने अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया था।

मुख्य न्यायाधीश एस मणिकुमार और न्यायमूर्ति शाजी पी चैली की पीठ ने कहा कि इस बात की पुष्टि करने के लिए कोई सामग्री नहीं है कि हिंदू धर्म के किस समुदाय या किसी अन्य धर्म के तहत आवश्यक तरीके से किसी जानवर को मारना आवश्यक है, अगर वह व्यक्तिगत खपत के लिए नहीं है।

वकील ए कार्तिक के माध्यम से याचिकाकर्ता ने कहा है कि उनके आवेदन में उठाईं गईं खामियों पर विचार किए बिना खारिज करने का आदेश पारित किया गया।

याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए आधारों में शामिल हैं:

1) आदेश अनुचित रूप से भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत याचिकाकर्ताओं के अधिकारों में हस्तक्षेप करता है

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि पशु बलि शक्ति पूजा का एक अभिन्न अंग है और चूंकि वह देवता को ये चढ़ाने में असमर्थ है, इसलिए "देवी के क्रोध" का सामना करने की उचित आशंका है।

अपने तर्कों के समर्थन में, याचिकाकर्ता ने कई धार्मिक सिद्धांतों को रिकॉर्ड पर रखा है,जिसमें धार्मिक जनादेश की एक विस्तृत सूची का उल्लेख है, जो उनके धार्मिक रीति-रिवाजों और परंपराओं के लिए पशु बलि की प्रथा की अनिवार्यता और अपरिहार्यता को दर्शाता है।

2) भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन

याचिकाकर्ता ने कहा है कि यह अधिनियम अन्य धार्मिक समुदायों द्वारा समान व्यवहार में पशु बलि के अपराधीकरण को बाहर करता है, बिना किसी विवेक के अलग-अलग तरीके से इसकी स्थापना की गई है।

उन्होंने प्रस्तुत किया कि

"अगर कानून का उद्देश्य जानवरों के संरक्षण और सुरक्षा को सुनिश्चित करना था, तो वह सभी धार्मिक समुदायों में एक समान आवेदन की मांग करेंगे।"

यह भी तर्क दिया गया है कि ये केवल मानसिक स्थिति को यानी किसी भी देवता के लिए जानवर को मारने पर रोक लगाता है जबकि किसी जानवर को मंदिर परिसर में भी व्यक्तिगत उपभोग के लिए मारा जाता है तो अधिनियम में इसके लिए कोई रोक नहीं है।

याचिका में कहा गया कि

" लागू अधिनियम पशु बलि के पीछे की मंशा को अपराधी बनाता है, न कि पशु बलि को। यदि यह बलि किसी देवता के लिए नहीं, बल्कि मंदिर में भी व्यक्तिगत उपभोग के लिए है, तो यह मना नहीं है। यह मनमाना वर्गीकरण भारत के संविधान का अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।"

3) अधिनियम, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1060 (केंद्रीय विधान) के विपरीत है और इसलिए, भारत के संविधान के अनुच्छेद 254 के अनुसार शून्य है

याचिकाकर्ता ने कहा है कि जबकि केंद्रीय कानून धार्मिक उद्देश्यों के लिए जानवरों की बलि करने की छूट देता है, लेकिन लागू किया गया अधिनियम चुनिंदा रूप से अपराधीकरण करता है, इस प्रकार ये केंद्र के प्रावधान को नकारता है।

याचिका में कहा गया कि

" वह शब्दावलियों से संबंधित एक भेद का समर्थन करता है जो पूर्व में 'हत्या' शब्द को नियोजित करता है, और बाद वाले में शब्द 'बलिदान' को नियोजित करता है। यह राज्य अधिनियम की धारा 2 (बी) की अनदेखी में किया गया है, जो 'बलि' को हत्या में शामिल कर परिभाषित करता है।"

याचिका को वकील अनंतु बाहुल्यन, सर्वेश्वर कन्नन और अनुष्का परिदकर ने तैयार किया है।

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