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सोशल डिस्टेंसिंग का पालन न करने के मामलों में जेल/लॉक-अप में डालने के बजाय जागरूकता लाने की कोशिश की जाए : इलाहाबाद हाईकोर्ट

SPARSH UPADHYAY
23 Jun 2020 11:54 AM GMT
सोशल डिस्टेंसिंग का पालन न करने के मामलों में जेल/लॉक-अप में डालने के बजाय जागरूकता लाने की कोशिश की जाए : इलाहाबाद हाईकोर्ट
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बीते शुक्रवार (19 जून) को 7 याचिकाकर्ता द्वारा दायर याचिका के मामले में, जिसमे उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी, यह टिपण्णी की कि यह बेहतर होगा यदि Covid-19 के सामाजिक दूरी (Social Distancing) प्रोटोकॉल के विषय में लोगों के बीच जागरूकता फैलाई जाए, न कि लोगों को जेल या लॉक अप में डाला जाए जोकि पहले से ही भरे हुए हैं।

न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल एवं न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह की खंडपीठ ने यह टिपण्णी उस मामले में की जिसमे याचिकाकर्ताओं के खिलाफ धारा 188, 269 आईपीसी के तहत पुलिस स्टेशन ताजगंज, जिला - आगरा में FIR के जरिए मामला दर्ज किया गया था (Case Crime No. 0401 of 2020) 2020 और वे उस इस FIR को रद्द करने की अदालत से मांग कर रहे थे।

इस मामले में अदालत ने देखा कि FIR के मुताबिक, याचिकाकर्ताओं के खिलाफ केवल यह आरोप है कि सामाजिक दूरी (Social Distancing) के प्रोटोकॉल का पालन 8 से 10 लोगों की भीड़ के द्वारा नहीं किया गया, जोकि मल्को गली, ताजगंज आगरा के एक सार्वजनिक स्थान पर एकत्रित हुए थे और सभी याचिकाकर्ता इस भीड़ के सदस्य थे।

उपर्युक्त पर विचार करने पर, अदालत ने अपने आदेश में यह पाया कि उस स्थान (मल्को गली, ताजगंज आगरा) पर कोई भी अनैच्छिक/प्रतिकूल घटना घटित होने का आरोप नहीं है।

अदालत ने यह भी कहा कि इस बात पर कोई संदेह नहीं है कि शहर के लोग, एक दायित्व के तहत हैं कि वे COVID -19 महामारी के साथ देश की सामूहिक लड़ाई में सामाजिक दूरी के प्रोटोकॉल का पालन करें।

अदालत ने मुख्य रूप से अपने आदेश में यह टिपण्णी की कि

"यह प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह प्रोटोकॉल के बारे में जागरूक हो और यह देखे कि दूसरे भी उसका सख्ती से पालन कर रहे हों। हालाँकि, हमारी राय में इन लोगों पर लगाम कसना, जिन्होंने किसी कारण से सामाजिक दूरी के प्रोटोकॉल का उल्लंघन किया है, कोरोना संकट को और बढ़ा सकता है। हमारी राय में, लोगों के बीच जागरूकता फैलाना अधिक उचित होगा, बजाय इसके कि लोगों को जेल या लॉक अप में डाला जाए, जोकि पहले से ही ओवर-क्राउडेड हैं।"

आगे अदालत ने अपने आदेश में याचिकाकर्ताओं को स्वयं में सुधार लाने का अवसर प्रदान करते हुए कहा,

"उपर्युक्त पर विचार करते हुए, हम यह पाते हैं कि प्रथम सूचना रिपोर्ट एक संज्ञेय अपराध का खुलासा करती है, लेकिन याचिकाकर्ताओं को स्वयं में सुधार लाने का एक अवसर प्रदान करने के लिए, यह प्रदान किया जाता है कि वे (प्रत्येक) आगरा पुलिस अधीक्षक के समक्ष एक अंडरटेकिंग दायर करेंगे, जिसमें कहा जायेगा कि वे COVID-19 के सभी मानदंडों और प्रोटोकॉल का पालन करेंगे और भविष्य में इसका उल्लंघन नहीं करेंगे। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, आगरा याचिकाकर्ताओं द्वारा दिए गए अंडरटेकिंग पर विचार करते हुए जरुरत के मुताबिक कार्य करेंगे।"

उपरोक्त निर्देशों के मद्देनजर, अदालत द्वारा यह प्रदान किया गया कि धारा 173 (2) सीआरपीसी के तहत पुलिस रिपोर्ट के दाखिल होने तक, उपरोक्त मामले में याचिकाकर्ताओं को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा और वे सभी अन्वेषण (Investigation) में सहयोग करेंगे।

गौरतलब है की बीते मार्च में, कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की जेलों में कैदियों की संख्या को कम करने के लिए राज्यों से उन कैदियों को पैरोल या अंतरिम जमानत पर रिहा करने के लिए विचार करने पर कहा था जो अधिकतम 7 साल की सजा काट रहे हैं।

मुख्य न्यायाधीश एस. ए. बोबडे और जस्टिस एल नागेश्वर राव की बेंच ने राज्य सरकारों को उच्च शक्ति समिति का गठन करने को कहा था जो यह निर्धारित करेगी कि कौन सी श्रेणी के अपराधियों को या मुकदमों के तहत पैरोल या अंतरिम जमानत दी जा सकती है। इसके पश्च्यात, कई राज्य सरकारों द्वारा इस दिशा में उचित कदम भी उठाये गए।

इसके अलावा, मार्च के महीने में ही गुजरात हाईकोर्ट ने कहा था कि COVID19 की महामारी को रोकने के लिए निवारक उपाय तब तक सफलतापूर्वक और प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पाएंगे, जब तक कि बड़े पैमाने पर जनता और राज्य के नागरिक, जिन्हें बड़े पैमाने पर खतरे से सचेत रहना है, इनका ठीक से पालन नहीं करेंगे।

इस मामले में अदालत ने राज्य सरकार को कोरोना और उसके खतरों के प्रति जागरूकता फ़ैलाने को कहा था। अदालत ने यह टिपण्णी की थी कि राज्य सरकार द्वारा अवश्य ही प्रिंट और डिजिटल मीडिया व सोशल मीडिया द्वारा व्यापक प्रसार के उपाय किए गए हैं। परंतु फिर भी जमीनी स्तर पर और अधिक किए जाने की आवश्यकता है, विशेषकर ऐसी जगह पर और ऐसे लोगों के बीच, जहां प्रिंट और डिजिटल मीडिया, या सोशल मीडिया की सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं या जो ऐसी सुविधाओं से वंचित हैं।

आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें




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