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आखिरकार ' वसीयत' के नाम पर 65 साल से चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने ब्रेक लगाए

LiveLaw News Network
18 July 2020 11:58 AM GMT
आखिरकार  वसीयत के नाम पर 65 साल से चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने ब्रेक लगाए
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 "जहां एक वसीयत है, वहां एक मुकदमा है, " एक कहावत है जिसे एक प्रसिद्ध अमेरिकी वास्तुकार एडिसन मिज़नर ने बनाया था। अब सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में मामले के तथ्य इसी विचार को रेखांकित करते हैं।

इस मुकदमे में वसीयत के विवाद पर नायडू-परिवार में वर्ष 1955 में निचली अदालत से शुरू हुई मुकदमेबाजी में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला अब आया है । सुप्रीम कोर्ट ने 2007 के मद्रास हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर सभी अपीलों को खारिज करते हुए फैसला सुनाया।

मामले में लक्ष्मैया नायडू और रंगास्वामी नायडू, आर वेंकटसुमी नायडू के बेटे थे। रंगास्वामी की शादी आर कृष्णमल से हुई थी। लक्ष्मय्या के चार पुत्र थे, बख्तवत्सलम, वेंकटपति, जगन्नाथन और रामास्वामी।

रंगास्वामी नायडू की मृत्यु के बाद परिवार के सदस्यों के बीच विवाद 1955 में शुरू हुआ। 1898 की दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 145 के तहत कार्यवाही में, मजिस्ट्रेट को एक तरफ रंगस्वामी की विधवा और भतीजे और दूसरी तरफ लक्ष्मैया और उनके बेटों के बीच एक 'कब्जे' के विवाद का फैसला करना था। मामला यह था कि वसीयत करने के बाद रंगास्वामी की मृत्यु हो गई थी। मजिस्ट्रेट ने वसीयत के बारे कोई चर्चा नहीं की और पाया कि दूसरे पक्ष के पास कब्जा है।

विवाद यहीं खत्म नहीं हुए। रंगास्वामी की विधवा कृष्णमल ने 1958 में एक मुकदमा दायर किया। यह मुकदमा एक समझौता डिक्री में समाप्त हुआ। 1963 में, आर अलागिरिस्वामी नायडू और वी कल्याणस्वामी (परिवार के सदस्यों) नाम के दो व्यक्तियों ने मुकदमा दायर किया। इसके परिणामस्वरूप समझौता भी हुआ। लक्ष्मैया के पुत्र रामास्वामी की 1976 में और कृष्णमल की 1977 में मृत्यु हो गई। इन मौतों के बाद, अलागिरिस्वामी नायडू ने फिर से विभाजन के लिए मुकदमा दायर किया। सब जज, कोयम्बटूर ने मुकदमे का फैसला किया और विभाजन का आदेश दिया।

रंगास्वामी नायडू द्वारा वसीयत के बल पर कुछ बिक्री लेनदेन में प्रवेश करने के बाद, लक्ष्मीस्वामी नायडू के पुत्रों, विधवा और रामास्वामी नायडू की बेटियों ने ए अलागिरिस्वामी के खिलाफ मुकदमा दायर किया। मुकदमे में अन्य प्रतिवादी रंगास्वामी नायडू के भतीजे थे और जो वसीयत में थे। वादकारियों ने टाइटल की घोषणा और निषेधाज्ञा के लिए प्रार्थना की। 1983 में, आर अलगिरीस्वामी ने विभाजन के लिए भी मुकदमा दायर किया।

इन दोनों ही सूट का एक साथ ट्रायल किया गया। लक्ष्मैया नायडू के कानूनी उत्तराधिकारियों द्वारा इस आधार पर वसीयत को अवैध करार गया था कि यह जबरदस्ती और अनुचित तरीक़े से करवाई गई थी।

अलगिरीस्वामी द्वारा दायर किया गया मुकदमा खारिज कर दिया गया, जबकि लक्ष्मैया नायडू के कानूनी उत्तराधिकारियों द्वारा दायर किया गया मुकदमा डिक्री हो गया। पहली अपीलीय अदालत ने इन निष्कर्षों को उलट दिया। दोनों अदालतों ने समवर्ती रूप से पाया कि 1932 में विभाजन होने का कोई सबूत नहीं था। दूसरी अपील के कारण, मद्रास उच्च न्यायालय ने 2007 में ट्रायल कोर्ट के फैसले को बहाल कर दिया।

2008 में, विभिन्न पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के निर्णय को चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने दिए गए एक फैसले में सभी अपीलों को खारिज कर दिया।

रंगास्वामी की वसीयत का भाग्य

जैसा कि पहले कहा गया था, रंगास्वामी नायडू द्वारा बनाई गई वसीयत के आधार पर परिवार के सदस्यों के बीच विवाद के संबंध में भी सीआरपीसी की धारा 145 की कार्यवाही शुरू की गई थी।

1982/1983 के मुकदमों में ट्रायल कोर्ट द्वारा तैयार किए गए मुद्दों में से एक यह था कि क्या विचाराधीन प्रश्न वास्तविक था या नहीं। ट्रायल कोर्ट ने यह पाया कि वसीयत वास्तविक नहीं थी और यह वैध नहीं थी।

बाद में, प्रथम अपीलीय न्यायालय द्वारा वसीयत को वास्तविक पाया गया। दूसरी अपील की अनुमति देने वाले फैसले में, उच्च न्यायालय ने पाया कि वसीयत साबित नहीं हुई।

शुक्रवार को, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में, एक वसीयत के निष्पादन के सबूत से संबंधित कानून पर विस्तृत चर्चा की, जिसमें कहा गया:

"हम इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि वास्तव में आर नायडू द्वारा निष्पादित वसीयत उनकी अंतिम इच्छा थी।"

यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ने वसीयत की वैधता के संबंध में उच्च न्यायालय के निष्कर्षों से असहमति जताई, लेकिन अंततः वह मामले के अन्य पहलुओं के आधार पर इसके द्वारा प्राप्त अंतिम निष्कर्षों से सहमत था।

वरिष्ठ वकील सी ए सुंदरम, मोहना वी गिरी, मोहन परासरन, एस गुरु कृष्णकुमार, चित्रा संपत, वी राघवचारी, एस नागामुथु इस मामले में विभिन्न पक्षों के लिए उपस्थित हुए।

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