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CAA प्रोटेस्ट: दरियागंज से गिरफ्तार व्यक्तियों को जमानत न देने के फैसले में कमी क्या है?

LiveLaw News Network
25 Dec 2019 11:30 AM GMT
CAA प्रोटेस्ट: दरियागंज से गिरफ्तार व्यक्तियों को जमानत न देने के फैसले में कमी क्या है?
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करण त्र‌िपाठी

सुप्रीम कोर्ट ने दो हफ्ते पहले दोहराया था कि जमानत खारिज करने या देने के आदेश में ये दिखना कि न्यायिक विवेक का उचित प्रयोग किया गया है, आवश्यक है, साथ ही आदेश जमानत खारिज करने के लिए निर्धारित सिद्धांतों के आधार पर हो।

महिपाल बनाम राजेश कुमार @पोलिया के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि:

'यह खुले न्याय का मूलभूत आधार है, जिसके प्रति हमारी न्यायिक व्यवस्‍था प्रतिबद्ध है, कि जमानत स्वीकार करने या खारिज करने के मामले में जिन कारकों पर जज ने विचार किया है, उन्हें पारित आदेश में दर्ज किया जाए। खुला न्याय इस धारणा पर आधारित है कि न्याय न केवल किया जाना चाहिए, बल्कि प्रकट रूप से और बिना किसी संदेह के होते हुए दिखना भी चाहिए। जजों का तर्कपूर्ण निर्णय देने का कर्तव्य इस प्रतिबद्धता के केंद्र में है। जज ये समझाने के लिए बाध्य है कि कि किस आधार पर उन्होंने फैसला ‌लिया है। '

तीस हजारी कोर्ट में मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने एक आदेश पारित किया था, जिसमें दरियागंज इलाके से हिरासत में लिए गए 15 प्रदर्शनकारियों की जमानत याचिका खारिज कर दी गई। पांच पन्‍नों के आदेश में चार पन्‍नों में केवल काउंसल द्वारा दिए गए तथ्यों और तर्कों की रिकॉर्डिंग दी गई है।

अंतिम पैराग्राफों में, जहां स्पष्ट रूप से जमानत से इनकार किए जाने के कारण दिए गए हैं, एक को बचाव पक्ष के वकील की दलीलों की सराहना और जमानत खारिज करने के कारणों के लिए छोड़ दिया जाता है।

इसके अतिरिक्त, यह और अधिक चिंताजनक है कि इनमें से कुछ टिप्पणियों को 'अभियोजक द्वारा तर्क दिया गया' के रूप में दर्ज किया गया है, जो अभियोजक द्वारा अदालत के समक्ष वास्तव में ‌दिए गए तर्कों के विपरीत हैं, या ऐसे बयान हैं जो कभी तर्क थे ही नहीं।

फैसले के 8वें पैराग्राफ (पेज 3) में दर्ज है कि:

'यह तर्क दिया गया था कि 17 पुलिस अधिकारियों को चोटें आईं और अस्पताल में उनका इलाज किया गया।'

यह टिप्पणी अभियोजक द्वारा अदालत में दिए गए तर्क के बिलकुल विपरीत है। अभियोजक से जब कोर्ट में पुलिसकर्मियों के पर हुए हमलों के बारे में विशेष रूप से पूछा गया था तब उन्होंने जवाब दिया था कि कोई भी ऐसे कोई भी पुलिसकर्मी नहीं है, जिसे चोट के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

उसी पैराग्राफ में यह भी दर्ज किया गया कि:

'यह तर्क दिया जाता है कि जिस कार में आग लगाई गई वह डीसीपी सेंट्रल ऑफिस के कार्यालय के ठीक बाहर खड़ी थी और आग डीसीपी सेंट्रल ऑफिस को भी नुकसान पहुंचा सकती थी।'

अभियोजन पक्ष द्वारा दिए गए मौखिक तर्कों में ये पूरा बयान शामिल ही नहीं था। उन्होंने अदालत से केवल ये कहा था कि कि जिस वाहन को आग लगाई गई, वह सरकारी नहीं बल्कि निजी वाहन था।

ये विरोधाभास तब महत्वपूर्ण हो गए जब ‌कोर्ट ने जमानत से इनकार करने के लिए 'पुलिसकर्मियों के गंभीर रूप से घायल होने और अस्पताल में भर्ती होने' के तथ्य पर ज्यादा ऐतबार किया।

इस आदेश में गिरफ्तार व्यक्तियों के वकील द्वारा दी गई दलीलों की कम चर्चा की गई। आरोपी की ओर से पेश रेबेका मेमन जॉन ने दलील दी कि आईपीसी की धारा 120 बी और 34, जो क्रमशः आपराधिक साजिश और सामान्य इरादे से सबंधित हैं, मौजूदा मामले में नहीं लगाए जा सकते हैं क्योंकि गिरफ्तार व्यक्ति एक दूसरे को नहीं जानते हैं। यह भी तर्क दिया गया था कि उन्हें बिना किसी विशेष जानकारी या कारण के, केवल एफआईआर एफआईआर में दर्ज अपराधों से जोड़ने के लिए, उग्र प्रदर्शनकारियों की भीड़ से बेतरतीब ढंग से उठा लिया गया।

जॉन ने यह तर्क भी दिया कि उनमें 'गवाहों को प्रभावित करने' की कोई संभावना नहीं है, क्योंकि ये सभी समाज के गरीब तबके से ताल्लुक रखते हैं, सिलाई या बढ़ईगीरी का काम करते हैं।

इन दलीजों को मजिस्ट्रेट के आदेश में दर्ज किया गया था, लेकिन उन्होंने अपने फैसले में इन पर विचार नहीं किया। उन्होंने बचाव पक्ष के वकील द्वारा दिए गए उक्त तर्कों को खारिज करने का कोई कारण भी नहीं बताया। इसके विपरीत, उन्होंने आपराधिक साजिश और सामान्य इरादे के अभियोजक की दलीलों को स्वीकार कर लिया।

'विचाराधीन घटना में आरोपी व्यक्तियों द्वारा अपनाई गई मोडस ऑपरेंडी, आरोपी व्यक्तियों के मन की पूर्व योजना को दर्शाती है। इस तरह की घटनाओं से समाज में दहशत पैदा होती है।'

अदालत ने 'मोडस ऑपरेंडी' और 'इस तरह की घटनाओं' का प्रयोग, प्रथम दृष्टया, सामान्य इरादे और आपराधिक षड्यंत्र को स्थापित करने के लिए किया, जबकि न तो अभियोजन पक्ष द्वारा की गई बहस में न तो इनका खुलासा किया गया था, न ही मजिस्ट्रेट ने अपने आदेश में इन पर कुछ कहा गया था। इसलिए, हममें से कोई भी कभी भी यह नहीं जान पाएगा कि गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों द्वारा साजिश रचने के लिए कैसी 'मोडस ऑपरेंडी' अपनाई गई थी।

अंत में, जो इस आदेश की विश्वसनीयता पर भी संदेह पैदा करता है, वह गिरफ्तारी मेमो की ओर से स्थापित तथ्यों की पूर्ण अवहेलना है। कार्यवाही के दौरान, वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने अभियोजन पक्ष की 'अनायास गिरफ्तारी' की पूरी कहानी को चुनौती देते हुए कहा कि गिरफ्तारी मेमो के अनुसार, आरोपी व्यक्तियों को अगली सुबह 6 बजे गिरफ्तार किया गया था। अभियोजन पक्ष ने अपने मौखिक बहस में कभी भी इस तर्क को चुनौती नहीं दी। इस प्रकार यह तथ्य कि आरोपी व्यक्तियों को उसी दिन गिरफ्तार नहीं किया गया, बल्‍कि अगली सुबह गिरफ्तार किया गया, ज्यों का त्यों रहा।

'अनुसार जांच अधिकारी ने उत्तर दिया कि ड्यूटी पर मौजूद पुलिस अधिकारियों ने आरोपी व्यक्तियों ने मौके से गिरफ्तार किया था, जो दंगा करके के अपराध में लिप्त पाए गए थे।'

इसके अलावा, अदालत ने जमानत से इनकार करने के ट्रिपल टेस्ट के मूल्यांकन पर कोई टिप्पणी नहीं की। यह बताने के लिए कोई कारण दर्ज नहीं किया गया है कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति कैसे देश से भाग सकते हैं या गवाहों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। बल्कि, अदालत सिर्फ एक लाइन कहकर जमानत की दलील को खार‌िज कर दिया कि:

'इस चरण में ज़मानत ‌दिए जाने का कोई आधार नहीं बनता है।'

जब व्यक्तियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता खतरे में होती है तो हम न्यायिक आदेशों से कम से कम उम्मीद कर सकते हैं कि सभी कारकों और सिद्धांतों का पर्याप्त मुल्यांकन करेगी और या तो जमानत देने या खारिज करने के कारणों की उचित व्याख्या की जाएगी। कोर्ट का आदेश प्रभावी रूप से दोनों पक्षों के तर्कों पर ठोस ढंग से बात भी नहीं करता, साथ ही 'कारकों के संतुलन' और 'न्यायिक विवेक के उचित अनुप्रयोग' के सिद्धांतों से भी विचलित होता है।

लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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