Top
Begin typing your search above and press return to search.
ताजा खबरें

जम्मू- कश्मीर के एक- एक जिले में ट्रायल के आधार पर 4G सेवा बहाल होगी : एजी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया 

LiveLaw News Network
11 Aug 2020 7:00 AM GMT
Children Of Jammu and Kashmir From Continuing Education
x

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने मंगलवार को जम्मू-कश्मीर में 4 जी इंटरनेट की बहाली में अवमानना ​​याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच को सूचित किया कि विशेष समिति का विचार है कि जम्मू-कश्मीर की स्थिति अभी भी जम्मू और कश्मीर में 4 जी की सेवाएं इंटरनेट को बहाल करने के लिए अनुकूल नहीं है।

ऑटर्नी जनरल (एजी) ने प्रस्तुत किया कि विशेष समिति ने 10 अगस्त को एक बैठक की और इसने जम्मू-कश्मीर में प्रचलित स्थिति और देश की असमानता की चिंताओं पर विचार किया।

एजी ने कहा,

"समिति ने यह भी कहा है कि सख्त निगरानी के साथ कुछ क्षेत्रों में हाई स्पीड इंटरनेट को बहाल किया जा सकता है। इस क्षेत्र में आतंकवादी गतिविधियों की सीमा कम होनी चाहिए।"

एजी ने प्रस्तुत किया कि जम्मू और कश्मीर में एक- एक जिले में 15 अगस्त के बाद परीक्षण के आधार पर 4 जी इंटरनेट मिल सकता है। 2 महीने के बाद स्थिति की समीक्षा होगी।

जस्टिस एनवी रमना और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ गृह मंत्रालय और मुख्य सचिव, UT के खिलाफ अवमानना ​​कार्रवाई की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

 " जवाब दें कि क्या कोई क्षेत्र 4 जी की बहाली के लिए खुला है, " सर्वोच्च न्यायालय से शुक्रवार को केंद्र से पूछा था और जम्मू और कश्मीर में 4 जी स्पीड इंटरनेट पर लगे प्रतिबंध की समीक्षा के लिए विशेष समिति के गठन ना करने पर फाउंडेशन फॉर मीडिया प्रोफेशनल्स (FMP) द्वारा दायर अवमानना ​​याचिका पर सुनवाई को स्थगित कर दिया था।

जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने मामले की सुनवाई की और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा था कि क्या कुछ क्षेत्रों में 4 जी सेवाओं को बहाल करना संभव है।

11 मई को जम्मू और कश्मीर में 4 जी स्पीड इंटरनेट सेवाओं की बहाली के लिए किसी भी सकारात्मक दिशा-निर्देश को पारित करने से परहेज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया था कि वह याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए मुद्दों की जांच के लिए एक "विशेष समिति" का गठन करे। ये समिति केंद्रीय गृह मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में होनी चाहिए।

इस नोट पर, याचिकाओं का निपटारा कर दिया गया था। पीठ ने कहा था कि सेवाओं को प्रतिबंधित करने के आदेश में ज़िलेवार खतरे की धारणा को ध्यान में नहीं रखा गया।समिति को ज़िलेवार स्थिति को ध्यान में रखना होगा और फिर प्रतिबंधों को हटाने या जारी रखने के लिए फैसला करना होगा।

इस तरह के निर्देशों के बाद भी, विशेष समिति के गठन के बिना, जम्मू और कश्मीर में इंटरनेट प्रतिबंध बढ़ा दिए गए थे। FMP के अनुसार, ये सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की " जानबूझकर अवज्ञा" के समान है।

11 मई के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, J & K प्रशासन ने 27 मई, 17 जून और 8 जुलाई को - सीमा पार आतंकवाद के खतरे का हवाला देते हुए, इंटरनेट प्रतिबंध को तीन बार बढ़ाया। प्रशासन ने यह भी दावा किया कि 2G इंटरनेट की गति ने COVID-19 नियंत्रण, ऑनलाइन शिक्षा या ई-कॉमर्स के लिए कोई बाधा उत्पन्न नहीं की है।

अवमानना ​​याचिका के साथ, FMP ने क्षेत्र में 4 जी सेवाओं की तत्काल बहाली के लिए एक आवेदन भी दायर किया है, जिसमें कहा गया है कि महामारी और लॉकडाउन के इनकार के परिणामस्वरूप चिकित्सा सेवाओं, ऑनलाइन शिक्षा और ई-कॉमर्स गतिविधियों को बाधित किया गया है।

केंद्र सरकार ने अगस्त 2019 में J & K की तत्कालीन स्थिति में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के ठीक बाद एक पूर्ण संचार ब्लैकआउट लागू किया था। जनवरी 2020 में पांच महीने बाद, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर, मोबाइल उपयोगकर्ताओं के लिए 2 जी की गति पर सेवाओं को आंशिक रूप से बहाल किया गया था। ये पहुंच केवल एक चयनित "सफेद-सूचीबद्ध" साइटों को प्रदान की गई थी और सोशल मीडिया पूरी तरह से अवरुद्ध था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इंटरनेट का अनिश्चितकालीन निलंबन स्वीकार्य नहीं है और इंटरनेट पर प्रतिबंधों को अनुच्छेद 19 (2) के तहत आनुपातिकता के सिद्धांतों का पालन करना होगा।

सोशल मीडिया पर प्रतिबंध को 4 मार्च को हटा दिया गया था, लेकिन मोबाइल डेटा के लिए गति को 2G के रूप में बरकरार रखा गया था।

Next Story