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2019 के सुप्रीम कोर्ट के 40 सिविल लॉ जजमेंट

LiveLaw News Network
30 Dec 2019 10:15 AM GMT
2019 के सुप्रीम कोर्ट के 40 सिविल लॉ जजमेंट
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1. हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 30 के अनुसार वसीयत के जरिये संयुक्त परिवार में अविभाजित हिस्से का नियंत्रण स्थानांतरित किया जा सकता है

सुप्रीम कोर्ट ने सम्पत्ति के बंटवारे से संबंधित अपील खारिज करते हुए व्यवस्था दी कि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 30 के तहत संयुक्त हिन्दू परिवार की अविभाजित संपत्ति का हस्तांतरण वसीयत के जरिये किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की एक खंडपीठ ने कहा, "मिताक्षरा सहदायिकी संपत्ति के मामले में हिन्दू उत्तराधिकार कानून की धारा 30 व्यक्ति को वसीयत के जरिये सम्पत्ति के हस्तांतरण की अनुमति प्रदान करती है।"

(मुकदमा : राधाम्मा एवं अन्य बनाम मुद्दुकृष्णा एवं अन्य, सिविल अपील नंबर 7092/10, फैसले की तारीख : 23 जनवरी 2019)


2. लीज सम्पत्ति को किरायेदार से बेचने के समझौता मात्र से मालिक और किरायेदार का संबंध खत्म नहीं हो जायेगा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किरायेदार के हाथ सम्पत्ति बेचने का मकान मालिक द्वारा समझौता कर लेने मात्र से मकान मालिक-किरायेदार का दोनों पक्षों का संबंध समाप्त नहीं होगा, जब तक कि इसे लेकर समझौते में कोई करार न हो।

(मुकदमा : डॉ. एच के शर्मा बनाम श्री रामलाल, सिविल अपील सं. 1237-1238/2019, फैसले की तारीख- 28.01.2019)

3. ट्रायल के दौरान प्रतिवादी के पेश न होने की स्थिति में वादी की गवाही पर दिया गया आदेश एकतरफा आदेश कहलाता है

सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि ट्रायल के दौरान बचाव पक्ष की मौजूदगी के बिना वादी के साक्ष्य के आधार पर पारित आदेश एकतरफा आदेश होता है, जिसे नागरिक प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के नियम 13, आदेश-नौ के तहत निरस्त किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति ए एम सप्रे और न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी की पीठ ने एक हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ अपील की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया, जिसके तहत हाईकोर्ट ने सीपीसी के नियम 13, आदेश नौ के तहत प्रारम्भिक आदेश निरस्त कर दिया था।

(मुकदमा : जी रत्ना राय (लॉयर्स के माध्यम से) बनाम श्री मुत्तुकुमारस्वामी परमानेंट फंड लिमिटेड, सिविल अपील नं.- 2582-2583/2019, फैसले की तारीख: 01.02.2019)

4. दूसरी अपील : यदि निचली अदालत का फैसला स्पष्टतया विपरीत हो तब भी हाईकोर्ट के लिए कानून के व्यापक प्रश्न निर्धारित करना अनिवार्य है

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि निचली अदालत का फैसला स्पष्टतया विपरीत हो तब भी दूसरी अपील पर विचार करते हुए हाईकोर्ट के लिए कानून के व्यापक प्रश्न निर्धारित करना अनिवार्य होता है।

न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की पीठ ने केरल हाईकोर्ट के आदेश को केवल इस आधार पर निरस्त कर दिया कि हाईकोर्ट ने कानून के व्यापक प्रश्न तय किये बिना दूसरी अपील का निर्धारण किया।

(मुकदमा – श्रीदेवी एवं अन्य बनाम सरोजम एवं अन्य, सिविल अपील नं. 1301/2019, फैसले की तारीख – 30.01.2019)

5. स्थानीय आयुक्त की रिपोर्ट में अनियमितता मुकदमा खारिज करने का आधार नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि स्थानीय जांच के लिए नियुक्त स्थानीय आयुक्त की रिपोर्ट में कुछ अनियमितताओं के कारण ही किसी दीवानी मुकदमे को खारिज नहीं किया जा सकता।

रामलाल बनाम शालीग्राम मामले में वादी की ओर से दायर अपील की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना था कि क्या प्रथम अपीलीय अदालत के आदेश को इस आधार पर निरस्त करना न्यायोचित होगा कि स्थानीय आयुक्त ने निर्धारित निर्देशों के मद्देनजर हदबंदी नहीं की थी।

न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे और न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी की पीठ ने महसूस किया कि स्थानीय आयुक्त ने इस सीमांकन के लिए निर्धारित दिशानिर्देशों पर अमल छोड़ दिया था, इतना ही नहीं उसने सवालों के घेरे में आयी भूमि के तीन संदर्भ बिंदु निर्धारित नहीं किये थे। लेकिन कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा मुकदमा खारिज करने को नकार दिया था तथा कहा था कि जहां कोर्ट स्थानीय आयुक्त के कामकाज से संतुष्ट नहीं है, तो उसे आगे की जांच का ओदश दिया जाना चाहिए, जो उसे अच्छा लगे।

(मुकदमा :- रामलाल एवं अन्य बनाम शालीग्राम एवं अन्य, सिविल अपील नं. 8285/2009, फैसले की तारीख 04.01.2019)

6. राजस्व रिकॉर्ड इंट्री को इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि इसे धोखे से या अचानक से डाली गयी है

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कहा है कि राजस्व दस्तावेजों में इंट्री को इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि इसे धोखे या अचानक से डाला गया गया था।

(मुकदमा :- धरम सिंह बनाम प्रेम सिंह, सिविल अपील नं. 516/2019, फैसले की तारीख 05.02.2019)

7. विभिन्न अदालतों के अधिकार क्षेत्र में स्थित संपत्तियों से संबंधित मुकदमा इनमें से किसी एक अदालत में ही चलेगा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विभिन्न अदालतों के अधिकार क्षेत्र में स्थित अचल सम्पत्ति या सम्पत्तियों से संबंधित मुकदमा किसी भी अदालत में शुरू किया जा सकता है, जिसके स्थानीय अधिकार क्षेत्र में संपत्ति का एक हिस्सा या एक या उससे अधिक संपत्ति स्थित हो।

न्यायमूर्ति अशोक भूषण एवं न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की पीठ ने कहा कि सीपीसी की धारा 17 में 'संपत्ति के हिस्से' शब्द की व्याख्या केवल दो अदालतों के अधिकार क्षेत्र में स्थित एक संपत्ति के हिस्से के सीमित और प्रतिबंधात्मक अर्थ में नहीं समझा जा सकता है।

(मुकदमा : शिवनारायण (मृत) (कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से) बनाम मानिकलाल (म़ृत) कानूनी प्रतिनिधियों के जरिये), सिविल अपील संख्या 1052/2019, फैसले की तारीख : 06.02.2019)

8. विशेष राहत अधिनियम की धारा 38: वादी को मुकदमा दायर करने की तारीख से वास्तविक कब्जा साबित करना होगा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विशेष राहत कानून की धारा 38 के तहत दायर मुकदमे में उसी व्यक्ति के पक्ष में स्थायी आदेश दिया जाता है, जिसके पास मुकदमा दायर करने की तारीख को कब्जा हो।

(मुकदमा : बालकृष्ण दत्तात्रेय गलांदे बनाम बालकृष्ण रामभरोसे गुप्ता एवं अन्यख् सिविल अपील नं. 1509/2019, फैसले की तारीख 06.02.2019)

9. कोर्ट द्वारा उचित राहत के लिए प्रयास करने की अनुमति 'कंस्ट्रक्टिव रेस जुडिकाटा' के सिद्धांत के अमल पर रोक नहीं लगाती

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कोर्ट द्वारा किसी पक्ष को उचित राहत हासिल करने के लिए दी गयी अनुमति उस पक्ष द्वारा ऐसी राहत हासिल करने के दौरान 'कंस्ट्रक्टिव रेस जुडिकाटा' के सिद्धांत पर अमल से नहीं रोकती।

(मुकदमा : असगर बनाम मोहन वर्मा, सिविल अपील सं. 1500/2019, फैसला की तिथि: 05.02.2019)

10. सीपीसी की धारा 115 : वादकालीन आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका सुनवाई योग्य नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कहा है कि वादकालीन आदेशों के खिलाफ नागरिक प्रक्रिया संहिता (सीपीसीद्ध) की धारा 115 के तहत पुनर्विचार याचिकाएं सुनवाई योग्य नहीं है।

न्यायमूर्ति रोहिंगटन फली नरीमन और न्यायमूर्ति विनीत सरन की पीठ ने वादकालीन आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका स्वीकार किये जाने के फैसले के विरुद्ध अपील पर कहा, "हम यह मानने को विवश हैं कि इस मामले में हर कानूनी उपाय आजमा लिये गये हैं।"

(मुकदमा : टेक सिंह बनाम शशि वर्मा एवं अन्य, सिविल अपील नं. 1416/2019, फैसले की तारीख : 04.02.2019)

11. टीपी अधिनियम की धारा 43 :- स्वत्वाधिकार के त्रुटिपूर्ण प्रतिनिधित्व का हस्तांतरण भी सही, यदि हस्तांतरणकर्ता बाद में भी स्वत्वाधिकार हासिल करता है

सुप्रीम कोर्ट ने सम्पत्ति हस्तांतरण अधिनियम की धारा 43 के तहत 'फीडिंग द ग्रांट बाई एस्टॉपल' सिद्धांत का इस्तेमाल करके उस पक्ष को राहत प्रदान की, जिसे एक वेंडर ने त्रुटिपूर्ण प्रतिनिधित्व के जरिये गुमराह करके प्रॉपर्टी खरीदवायी थी।

(मुकदमा : तनुराम बोरा बनाम प्रमोद चंद्र दास (मृत) (कानूनी प्रतिनिधियों के जरिये) तथा अन्य, सिविल अपील संख्या 1575/2019, फैसले की तारीख :- 08.02.2019)

12. ट्रायल शुरू होने के बाद क्या मुकदमे में संशोधन की अनुमति है? सुप्रीम कोर्ट ने की व्याख्या

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक हालिया फैसले में व्याख्या की कि ट्रायल शुरू होने के बाद कब और किसी आधार पर याचिका में संशोधन की अनुमति दी जा सकती है?

न्यायमूर्ति एन वी रमन और न्यायमूर्ति मोहन एम शांतनगौदर ने अपने फैसले में कहा कि इस प्रकार की याचिका की सुनवाई करते वक्त कोर्ट को यह विचार करना होता है कि क्या यह वास्तविक विवाद है या दुर्भावना से ग्रसित, क्या यह दूसरे पक्ष के लिए पूर्वग्रह से ग्रसित तो नहीं है, जिसकी क्षतिपूर्ति रुपये-पैसों में नहीं की जा सकती।

(मुकदमा :- एम रेवन्ना बनाम अंजनाम्मा, सिविल अपील 1669/2019, फैसले की तारीख 14.02.2019)

13. लिमिटेशन्स एक्ट की धारा 60 के तहत निर्धारित समय के अंदर विलेख को निरस्त करने संबंधी याचिका दायर करके ही अभिभावक द्वारा नाबालिग की संपत्ति को बिक्री से बचाया जा सकता है

सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि लिमिटेशन्स एक्ट की धारा 60 के तहत निर्धारित समय के अंदर विलेख को निरस्त करने संबंधी याचिका दायर करके ही अभिभावक द्वारा नाबालिग की संपत्ति को बिक्री से बचाया जा सकता है। यह अवधि नाबालिग के बालिग होने के बाद तीन साल तक है।

यदि बालिग होने से पहले ही नाबालिग की मृत्यु हो जाती है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचार के लिए आये संबंधित मामले में हुआ, नाबालिग के कानूनी प्रतिनिधि को उस तारीख के तीन साल के भीतर मुकदमा दायर करना चाहिए, जिस तारीख को वह बालिग होता।

न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की पीठ विलेख की घोषणा एवं अचल सम्पत्ति के कब्जे से संबंधित मुकदमे में वादियों की अपील पर विचार कर रही थी। विशेष रूप से, वादियों ने बिक्री विलेख को निरस्त करने की प्रार्थना नहीं की थी, जो मामले के लिए घातक साबित हुआ।

(मुकदमा: मुरुगन एवं अन्य बनाम केशव गौंदर (मृत) (कानूनी प्रतिनिधियों के जरिये), सिविल अपील नं. 1782/2019, फैसले की तारीख : 25.02.2019)

14. प्रतिवादियों के वादी के रूप में स्थानांतरण की अनुमति कब दी जा सकती है? सुप्रीम कोर्ट का जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने सीपीसी के आदेश 23 के नियम 1(ए) दायरे का विश्लेषण किया, जिसके तहत कोर्ट के पास प्रतिवादियों को वादी के रूप में स्थानांतरण की अनुमति का अधिकार है।

न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित और न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी की पीठ ने कहा कि यदि वादी आदेश 23 के नियम एक के तहत अपना दावा वापस लेना या छोड़ना चाह रहा है और प्रतिवादी मुकदमे में रुचि रखते हुए खुद के वादी के तौर पर बदलाव की मांग करता है, और यदि इस महत्वपूर्ण सवाल का फैसला किया जाना है, तो प्रतिवादियों को वादी के रूप में स्थानांतरित किया जा सकता है।

(मुकदमा : आर धनसुन्दरी उर्फ आर राजेश्वरी बनाम ए एन उमाकांत एवं अन्य, सिविल अपील संख्या 7292/2009, फैसले की तारीख : 06.03.2019)

15. निर्धारित अवधि के बाद दायर वाद को निरस्त किया जा सकता है

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि नागरिक प्रक्रिया संहिता के नियम 11(डी) के आदेश 7 के तहत मुकदमा खारिज किया जा सकता है, यदि यह पता चलता है कि वाद निर्धारित अवधि के बाद दायर की गयी हो।

कोर्ट ने कहा, "वाद के प्रकथनों पर विचार करते हुए यदि यह पाया जाता है कि संबंधित मुकदमा निर्धारित समय सीमा के बाद दायर की गयी तो उसे सीपीसी के नियम 11(डी) के आदेश 7 के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए खारिज किया जा सकता है।"

(मुकदमा : राघवेंद्र शरण सिंह बनाम राम प्रसन्ना सिंह (मृत) कानूनी प्रतिनिधियों के जरिये, सिविल अपील संख्या 2960/2019, फैसले की तारीख 13.03.2019)

16. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 के तहत उत्तराधिकारियों का अधिमान्य अधिकार कृषि भूमि पर भी लागू होता है

सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 के तहत किसी हिंदू के उत्तराधिकारी को दिया गया अधिमान्य अधिकार लागू है, भले ही जिस सम्पत्ति पर सवाल खड़े किये गये हैं वह कृषि भूमि क्यों न हो?

धारा 22 में प्रावधान है कि जब किसी निर्वसीयती की अचल सम्पत्ति का हिस्सा दो उत्तराधिकारियों में हस्तांतरित होता है और इनमें से कोई एक उत्तराधिकारी सम्पत्ति या कारोबार में मौजूद अपना हिस्सा हस्तांतरित करने का प्रस्ताव रखता है तो दूसरे उत्तराधिकारी को हस्तांतरित किये जाने के वाले प्रस्तावित हिस्से पर अधिमान्य अधिकार होगा।

न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित और न्यायमूर्ति एम आर शाम की पीठ ने यह महसूस किया कि जहां तक हिमाचल प्रदेश का संबंध है तो वहां कृषि भूमि में अपने हिस्से से अधिक पर अधिकार जताने से संबंधित मामला हिन्दू उत्तराधिकार कानून की धारा 22 के दायरे में आता है। पीठ ने यह भी कहा कि अधिनियम की धारा 4(2) खत्म करने के साथ ही, इस कानून की धारा 22 की प्रासंगिकता का कोई अपवाद नहीं है। धारा चार(दो) निरस्त हो चुकी है, जिसके तहत संबंधित कानून के प्रावधान कृषि जोत में काश्तकारी अधिकारों के हस्तांतरण के मामलों में लागू नहीं होते थे।

(मुकदमा : बाबू राम बनाम संतोष सिंह (मृत) कानूनी प्रतिनिधियों के जरिये, सिविल अपील संख्या 2553/2019, फैसले की तारीख 15.03.2019)

17. सुप्रीम कोर्ट ने सीपीसी के नियम दो, आदेश-दो के तहत दावे को छोड़ने की कसौटी की व्याख्या की है

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियम-दो आदेश-दो के तहत आने वाले मामलों की सही परख है कि क्या नये मुकदमे में किया गया दावा वास्तव में पूर्व के मुकदमे की नींव से इतर कारणों पर आधारित है।

(मुकदमा : प्रमोद कुमार एवं अन्य बनाम झलक सिंह एवं अन्य, सिविल अपील संख्या 1055/2019)

18. मिताक्षरा कानून :- किसी पुरुष को प्राप्त वंशानुगत सम्पत्ति उसके नीचे तीन पीढ़ियों तक सहदायिकी सम्पत्ति होगी

सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि मिताक्षरा कानून के तहत यह नियम कि जब कभी एक पुरुष अपने तीन पीढ़ी पहले में से किसी की भी सम्पत्ति हासिल करता है तो उसकी आगे की तीन पीढी उस सम्पत्ति में संयुक्त रूप से बराबर का हिस्सा पायेगी, उत्तराधिकार के वैसे मामलों में लागू होगा जो हिन्दू उत्तराधिकार कानून 1956 से पहले के हों।

इस नियम का इस्तेमाल करते हुए न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की पीठ ने अर्शनूर सिंह की उस अपील को मंजूर कर लिया जिसमें उन्होंने अपने पिता धरम सिंह द्वारा 1999 में निष्पादित बिक्री विलेख को खारिज करने की मांग की थी। संबंधित बिक्री विलय के तहत धरम सिंह ने प्रतिवादी हरपाल कौर को संयुक्त परिवार की सम्पत्ति से वंचित कर दिया था, जिससे उन्होंने दूसरी शादी की थी।

(मुकदमा: अर्शनूर सिंह बनाम हरपाल कौर एवं अन्य, सिविल अपील संख्या 5124/2019, फैसले की तारीख 02.07.2019)

19. हिन्दू उत्तराधिकार – पिता से उत्तराधिकार के तौर पर मिली सम्पत्ति उन पुत्रों के हाथों में संयुक्त परिवार की सम्पत्ति होगी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पिता से उत्तराधिकार के तौर पर मिली सम्पत्ति उन पुत्रों के हाथों में संयुक्त परिवार की सम्पत्ति होती है।

न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की पीठ ने यह निर्णय सुनाया था।

(मुकदमा : डोडामुनियप्पा /कानूनी प्रतिनिधियों के जरिये/ बनाम मुणिस्वामी एवं अन्य, सिविल अपील नं. 7141/2008, फैसले की तारीख 01.07.2019)

20. पुत्र को वसीयत के जरिये या उपहार के तौर पर दी गयी पिता की स्वयं अर्जित सम्पत्ति तब तक स्वयं अर्जित सम्पत्ति होगी, जब तक कि विलेख में इस बारे में कोई उलट उल्लेख न किया गया हो

सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि उत्तराधिकार के मिताक्षरा कानून के तहत, पुत्र को वसीयत के जरिये या उपहार के तौर पर दी गयी पिता की स्वयं अर्जित सम्पत्ति तब तक स्वयं अर्जित सम्पत्ति की श्रेणी में होगी, जब तक कि विलेख दस्तावेज में इसके उलट कोई उल्लेख न किया गया हो।

न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ ने गुजरात हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील का निपटारा करते हुए यह व्यवस्था दी थी।

(मुकदमा : गोविंदभाई छोटाभाई पटेल एवं अन्य बनाम पटेल रमनभाई माथुरभाई, सिविल अपील नं. 7528/2019, फैसले की तारीख 25.09.2019)

21. अपील के बाद वादी के शेष राशि जमा कराने मात्र से समझौते पर अमल (स्पेसिफिक परफॉर्मेंस) संबंधी आदेश निरस्त नहीं हो सकता

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एक फैसले में त्रुटि पायी है, जिसमें कहा गया था कि स्पेसिफिक परफॉर्मेंस संबंधी आदेश अमल योग्य नहीं होगा, क्योंकि वादी ने ट्रायल कोर्ट की ओर से निर्धारित अवधि से परे अपील दायर करने के बाद शेष राशि जमा करायी थी।

न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी की पीठ ने कहा था कि ट्रायल कोर्ट के आदेश को अपीलीय अदालत के आदेश के साथ जोड़ दिया गया था। इसलिए वादी की ओर से बिक्री राशि जमा कराने में वादी की ओर से विलम्ब नहीं हुआ था।

(मुकदमा : सुरिन्दर पाल सोनी बनाम सोहन लाल (मृत) /कानूनी प्रतिनिधियों के जरिये/, सिविल अपील नं. 5360/2019, फैसले की तारीख- 23.07.2019)

22. सीपीसी नियम 11(डी) आदेश-सात : वाद या तो पूरी तरह निरस्त होगा या बिल्कुल नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वाद या तो पूरी तरह निरस्त होगा या बिल्कुल नहीं। कोर्ट ने कहा कि इस बात की अनुमति नहीं दी जा सकती है कि याचिका आधी-अधूरी निरस्त हो। ऐसा नहीं हो सकता कि वाद का एक निश्चित हिस्सा कुछ प्रतिवादियों के लिए निष्प्रभावी कर दिया जाये और वहीं हिस्सा किसी अन्य के खिलाफ जारी रहे।

पीठ ने कहा कि यदि कोई मुकदमा निश्चित प्रतिवादि(यों) और/अथवा सम्पदाओं के खिलाफ जारी रहता है तो सीपीसी के नियम 11(डी) आदेश-सात बिल्कुल नहीं लागू होगा और मुकदमे की सुनवाई सम्पूर्ण रूप से होगी।"

(मुकदमा : माधव प्रसाद अग्रवाल बनाम एक्सिस बैंक, एसएलपी (सिविल) नं. 31579/2019, फैसले की तारीख : 01.07.2019)

23. आदेश की प्रमाणित प्रति के बिना भी दायर निष्पादन याचिका सुनवाई योग्य

न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्र और न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी की खंडपीठ ने एक अपील का निपटारा करते हुए कहा है कि निष्पादन याचिका दायर करते वक्त आदेश की प्रति देना आवश्यक नहीं है, जब तक कोर्ट आदेश की प्रमाणित प्रति दाखिल करने का आदेश नहीं देता।

(मुकदमा : सर सोभा सिंह एवं सन्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम शशि मोहन कपूर (मृत) /कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से/, सिविल अपील नं. 5534/2019, फैसले की तिथि : 15.07.2019)

24. अपील खारिज होने के बावजूद क्रॉस ऑब्जेक्शन का निपटारा मेरिट के आधार पर किया जाना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि अपील खारिज होने के बावजूद क्रॉस ऑब्जेक्शन को उसके मेरिट के आधार पर कारण बताते हुए निपटाया जाना चाहिए।

पीठ ने कहा, "क्रॉस ऑब्जेक्शन को बिना विमर्श किये और बगैर कारण बताये खारिज करने का समर्थन नहीं किया जा सकता।"

(मुकदमा : श्री बदरु (अब मृत) /कानूनी प्रतिनिधि हरिराम के जरिये/ बनाम एनटीपीसी, सिविल अपील नं: 5557-5559/2019, फैसले की तारीख 16.07.2019)

25. वादी को उस पक्षकार को शामिल करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, जिसके खिलाफ वह लड़ना नहीं चाहता

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कहा है कि किसी मुकदमे में वादी का प्रभुत्व होता है और उसे उन पक्षकारों को मुकदमे में जोड़ने के लिए बाध्य नहीं किया जाता, जिनके खिलाफ वह नहीं लड़ना चाहता, जब तक कि कानून के शासन के तहत ऐसा करना अनिवार्य न हो।

(मुकदमा – गुरमीत सिंह भाटिया बनाम किरण कांत रोबिन्सन एवं अन्य, सिविल अपील नं. 5522/2019, फैसले की तारीख:- 17.07.2019)

26. प्रतिनिधि-संबंधी मुकदमे में समझौता आदेश अमान्य हो जायेगा, यदि कोर्ट की अनुमति नहीं ली जाती है और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी नहीं किया जाता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि रिप्रेजेंटेटिव सूट में कोर्ट की अनुमति के बिना और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किये बगैर लिया गया समझौता आदेश आन्य हो जायेगा।

(मुकदमा : आलियाथम्मुडा बीथाथेबियाप्पुरा पुकोया बनाम पट्टाकल चेरियाकोया, सिविल अपील नं. 9586/2019, फैसले की तारीख : 01.08.2019)

27. निरस्त मुकदमे में विपरीत निष्कर्षों को लेकर बचाव पक्ष द्वारा प्रतिवाद करने के लिए क्रॉस ऑब्जेक्शन दाखिल करना जरूरी नहीं है

सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि निपटारा किये जा चुके अपीलों में कुछ प्रतिकूल निष्कर्षों को लेकर प्रतिवाद करने के लिए बचाव पक्ष द्वारा क्रॉस ऑब्जेक्शन दाखिल करना जरूरी नहीं है।

(मुकदमा : आंध्र प्रदेश सरकार एवं अन्य बनाम बी. रंगा रेड्डी (मृत) /कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से/, सिविल अपील सं. 17486/2017)

28. महज 'समवर्ती निष्कर्षों' के आधार पर ही दूसरी अपील खारिज नहीं की जा सकती

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कोई हाईकोर्ट केवल इस आधार पर दूसरी अपील खारिज नहीं कर सकता कि दो अदालतों ने समवर्ती निष्कर्ष दिये हैं (चाहे मुकदमा खारिज करने का हो या आदेश देने का) और इस तरह के निष्कर्ष अकाट्य होते हैं।

मुकदमा : राजस्थान सरकार बनाम शिव दयाल, सिविल अपील संख्या 7363/2000, फैसले की तारीख : 14.08.2019)

29. सीपीसी का नियम-11 आदेश-7 :- वाद को खारिज किया जा सकता है जब यह मुकदमा करने के अधिकार को स्पष्ट नहीं करता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सीपीसी के नियम-11, आदेश-7 के तहत कोई वाद खारिज किया जा सकता है, जब यह प्रकट तौर पर किसी को तंग करने के लिए हो, जिसमें मेरिट न हो और जो इस दृष्टि से निराधार हो कि उसमें मुकदमा का अधिकार स्पष्ट न हों।

न्यायमूर्ति मोहन एम. शांतनगौदर और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने कहा कि महज यह मान लेना या इसकी संभावना होना कि अधिकार का उल्लंघन हो सकता है, पर्याप्त नहीं होगा कि वादी कार्रवाई का कारण बताता है।

(मुकदमा:- कर्नल श्रवण कुमार जयपुरियार उर्फ सरवन कुमार जयपुरियार बनाम कृष्ण नंदन सिंह एवं अन्य, सिविल अपील संख्या 6760/2019, फैसले की तारीख – 07.09.2019)

30. सीपीसी नियम-9, आदेश-9 : वादी के खिलाफ फैसला उसके उत्तराधिकारी को पूर्व के आधार पर नया मुकदमा दायर करने की इजाजत नहीं देता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वादियों के खिलाफ आदेश के उपरांत स्वत्वाधिकार के मामले में उनके उत्तराधिकारियों को समान कारण को आधार बनाकर नये मुकदमे दायर नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने एक हाईकोर्ट के आदेश को इसी आधार पर निरस्त कर दिया कि वादी के वेंडरों द्वारा दायर की गयी पूर्व की याचिका में भी वही राहत मांगी गयी थी। उक्त मुकदमा सीपीसी के नियम आठ आदेश-नौ के प्रावधानों के तहत खारिज कर दिया गया था, क्योंकि प्रतिवादियों का वकील सुनवाई के दौरान मौजूद था, जबकि वादी के वकील गायब थे।

(मुकदमा : मायांडी बनाम पंडाराशामी एवं अन्य, सिविल अपील संख्या 6424/2019, फैसले की तारीख 09.09.2019)

31. निष्पादन अदालत, निष्पादन के अधीन आदेश या डिक्री से परे नहीं जा सकती

सुप्रीम कोर्ट ने पहले से तय एक आदेश को दोहराया है कि आदेश का अमल कराने वाली अदालत निष्पादन के दौरान आदेश या डिक्री से परे नहीं जा सकती।

(मुकदमा:- एस. भास्करन बनाम सेबस्तियां (मृत) कानूनी प्रतिनिधियों के जरिये, सिविल अपील संख्या 7800/2014, फैसले की तारीख 13.09.2019)

32. सीपीसी की धारा 9(ए) (महाराष्ट्र) :- लिमिटेशन का प्रश्न एक प्रारम्भिक मुद्दे के रूप में तय नहीं किया जा सकता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि महाराष्ट्र में लागू नागरिक प्रक्रिया संहिता की धारा-9(ए) के तहत लिमिटेशन का प्रश्न एक प्रारम्भिक मुद्दे के रूप में तय नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, न्यायमूर्ति एम आर शाह एवं न्यायमूर्ति बी आर गवई की खंडपीठ ने कहा कि धारा- 9(ए) तथा नियम-दो, आदेश-14 के प्रावधानों के तहत प्रारम्भिक मुद्दों का निर्धारण किया जा सकता है, बशर्ते यह पूरी तरह से कानून का प्रश्न हो, कानून का मिश्रित प्रश्न न हो तथा साक्ष्य दर्ज करने से संबंधित निष्कर्ष भी।

(मुकदमा : नुस्ली नेविले वाडिया बनाम आइवररी प्रॉपर्टीज एवं अन्य, सिविल अपील नं. 31982/2013, फैसले की तारीख 06.10.2019)

33. 'वापस' की गयी याचिका जिस नये कोर्ट में दायर होती है, क्या वहां सुनवाई नये सिरे से की जानी चाहिए? सुप्रीम कोर्ट ने मामला वृहद पीठ के सुपुर्द किया

जब नागरिक प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) नियम 10(ए) ऑर्डर-7 के परिप्रेक्ष्य में कोई याचिका लौटायी जाती है तो उसकी सुनवाई नये कोर्ट में नये सिरे से होगी या उस जगह से आगे जहां से याचिका लौटायी गयी थी? सुप्रीम कोर्ट ने यह मामला वृहद पीठ के सुपुर्द कर दिया है।

न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ ने मेसर्स एक्सेल कैरियर्स बनाम फ्रैंकफिन एविएशन सर्विसेजप प्राइवेट लिमिटेड मामले में इस मामले को वृहद पीठ को उस वक्त सुपुर्द किया जब उसे तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम लिमिटेड बनाम मॉडर्न कंस्ट्रक्शन तथा जोगिन्दर तुली बनाम एस एल भाटिया मामले के फैसलों में स्पष्ट अंतर देखने को मिला।

मुकदमा: मेसर्स एक्सेल कैरियर्स एवं अन्य बनाम फ्रैंकफिन एविएशन सर्विसेज, एसएलपी (सिविल) नं. 16893/2018, फैसले की तारीख:- 08.10.2019)

34. मुकदमा खारिज करने संबंधी याचिका पर विचार करते वक्त वाद के प्राकथनों की समग्रता को ध्यान में रखा जाना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कहा है कि मुकदमा खारिज करने संबंधी याचिका पर विचार करते वक्त वाद के प्राकथनों की समग्रता को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

(मुकदमा : शौकत हुसैन मोहम्मद पटेल बनाम खातूनबेन मोहम्मदभाई पोलारा, सिविल अपील संख्या 8197/2019, फैसले की तारीख:-29.10.2019)

35. विशेष राहत - डिपोजिट के लिए अतिरिक्त समय लेना वादी को करार की प्रतिबद्धता साबित करने के दायित्व से मुक्त नहीं करता

सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि करार की शेष राशि के भुगतान के लिए केवल अतिरिक्त समय लेना ही वादी को बिक्री समझौते के अनुपालन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता साबित करने के दायित्व से मुक्त नहीं करेगा।

न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी की पीठ ने कहा है कि अतिरिक्त मोहलत दिये जाने से वादी खुद से यह नहीं मान सकता कि इससे उसकी करार को लेकर प्रतिबद्धता साबित होती है।

मुकदमा : 'रवि सेतिया बनाम मदन लाल एवं अन्य' सिविल अपील सं. 2837/2011, फैसले की तारीख – 04.10.2019)

36. जब किसी आदेश या डिक्री में कोई बदलाव या उलटफेर न हो तो सीपीसी की धारा 144 (क्षतिपूर्ति) लागू नहीं होती

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब किसी आदेश या डिक्री में कोई बदलाव या उलटफेर नहीं है तो सीपीसी की धारा 144 के प्रावधान लागू नहीं होंगे।

बेंच ने कहा, "क्षतिपूर्ति का सिद्धांत है कि डिक्री से उलट होने की स्थिति में डिक्री से लाभान्वित होने वाले पक्ष पर यह कानूनी दायित्व होगा कि वह विपरीत पक्ष को हुए नुकसान की भरपाई करे।"

मुकदमा : बंसीधर शर्मा (मृत) बनाम राजस्थान सरकार, सिविल अपील संख्या 8400/2019, फैसले की तारीख – 05.11.2019)

37. सीपीसी नियम 6(ए), ऑर्डर-8 : लिखित बयान दाखिल करने के बाद काउंटर-क्लेम दाखिल करने के लिए कोई इम्बार्गो नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि एक कोर्ट अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर सकता है तथा लिखित बयान के बाद ट्रायल के लिए मामला तय होने के स्टेज तक काउंटर क्लेम दाखिल करने की अनुमति दे सकता है।

न्यायमूर्ति एन वी रमन की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने व्यवस्था दी है कि सीपीसी का नियम-6(ए) ऑर्डर-8 लिखित बयान दाखिल करने के बाद काउंटर-क्लेम दाखिल करने के लिए कोई समयसीमा निर्धारित नहीं करता।

(मुकदमा: अशोक कुमार कालरा बनाम विंग कमांडर सुरेन्द्र अग्निहोत्री एवं अन्य, एसएलपी(सी) 23599/2018, फैसले की तारीख 19.11.2019)

38. कानून के ठोस प्रश्न तय करने में त्रुटि मात्र से दूसरी अपील का फैसला निरस्त नहीं किया जायेगा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कानून के ठोस प्रश्न तय करने में त्रुटि मात्र से दूसरी अपील का फैसला निरस्त नहीं किया जायेगा, यदि यह पाया जाता है कि कानून का पर्याप्त प्रश्न मौजूद था और हाईकोर्ट ने इन प्रश्नों का हल पहले ही दे दिया है।

(मुकदमा : इल्लोह वालाप्पिल अम्बुन्ही (मृत) /कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से/ बनाम कुन्हाम्बु करनावन, सिविल अपील सं. 1429/20011, फैसले की तारीख 14.10.2019)

39. गोवा के निवासियों के उत्तराधिकार और विरासत का मामला पुर्तगाली ना�

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