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1984 सिख विरोधी दंगा : सज्जन कुमार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने CBI को नोटिस जारी कर जवाब मांगा

Rashid MA
14 Jan 2019 11:56 AM GMT
1984 सिख विरोधी दंगा : सज्जन कुमार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने CBI को नोटिस जारी कर जवाब मांगा
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वर्ष 1984 में हुए सिख विरोधी दंगे के मामले में आजीवन कारावास के सजायाफ्ता कांग्रेस नेता और पूर्व सांसद सज्जन कुमार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को नोटिस जारी कर उनकी ओर से जवाब मांगा है।

सज्जन कुमार ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है जिसमें उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की पीठ ने सज्जन कुमार की जमानत देने की अर्जी पर भी सीबीआई को नोटिस जारी कर 6 सप्ताह में जवाब मांगा है।

इससे पहले 31 दिसंबर 2018 को सज्जन कुमार ने दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत में सरेंडर कर दिया था। इसके बाद उन्हें मंडोली जेल भेजा दिया गया। वहीं इस दौरान सज्जन कुमार के वकीलों ने मांग की थी कि उन्हें तिहाड़ जेल भेजा जाए क्योंकि मामला दिल्ली कैंट थाने का है लेकिन नियमों के तहत सज्जन कुमार को अलग वैन में मंडोली जेल भेजा गया।

आपको बता दें, 21 दिसंबर को कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को दिल्ली हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली थी।

न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर और न्यायमूर्ति विनोद गोयल की पीठ ने सज्जन कुमार की उस अर्जी को ठुकरा दिया था जिसमें उनके द्वारा आत्मसमर्पण करने के लिए 30 दिन और देने की गुहार लगाई गयी थी।

सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा कि उनकी अर्जी में जो आधार दिए गए हैं वो सही नहीं हैं।

दरअसल सज्जन कुमार ने 20 दिसंबर को ही अर्जी देते हुए गुहार लगाई थी कि उन्हें आत्मसमर्पण करने के लिए 30 दिनों की मोहलत और दी जाए। इसके लिए आधार देते हुए उन्होंने कहा था कि उनका परिवार बड़ा है और उन्हें संपत्ति का सेटलमेंट करना है। ऐसे में उनको आत्मसमर्पण के लिए और वक्त चाहिए। अर्जी में संबंधियों व परिचितों से मिलने की बात कही गई थी। इसके बाद सज्जन कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी लेकिन वेकेशन में सुनवाई से इनकार कर दिया गया।

इससे पहले 17 दिसंबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगे में सज्जन कुमार को दोषी ठहराते हुए उन्हें उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई थी और 31 दिसम्बर 2018 तक उन्हें आत्मसमर्पण करने को कहा गया था।

न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर और न्यायमूर्ति विनोद गोयल की पीठ ने निचली अदालत के फ़ैसले को पलटते हुए कहा था, "पीड़ितों को यह आश्वासन देना जरूरी है कि चुनौतियों के बावजूद, सच जीत की होगी।"

गौरतलब है कि सज्जन कुमार को वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगों में पालम के राजनगर में एक ही परिवार के केहर सिंह, गुरप्रीत सिंह, रघुवेंद्र सिंह, नरेंद्र पाल सिंह और कुलदीप सिंह को जान से मारने का दोषी पाया गया है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 31 अक्टूबर 1984 को यह दंगा फैला था।

आरोपी के ख़िलाफ़ यह मामला न्यायमूर्ति जी. टी. नानावटी आयोग के सुझाव के आधार पर वर्ष 2005 में दायर हुआ था। निचली अदालत ने वर्ष 2013 में पाँच लोगों को इस मामले में दोषी पाया था, जिसमें बलवान खोखर, महेंद्र यादव, किशन खोखर, गिरधारीलाल और कैप्टन भागमल के नाम शामिल थे, जबकि सज्जन कुमार को इस मामले में बरी कर दिया गया था।

हालांकि सीबीआई ने सज्जन कुमार के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट में यह कहते हुए अपील की थी कि दंगे में भीड़ को उकसाने वाला व्यक्ति सज्जन कुमार ही था।

हाईकोर्ट ने सज्जन सिंह को उम्र कैद की सजा सुनाते हुए तीन अन्य दोषियों- कैप्टन भागमल, गिरधारी लाल और कांग्रेस के पार्षद बलवान खोखर की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा था। बाकी दो दोषियों - पूर्व विधायक महेंद्र यादव और किशन खोखर की सजा को 3 साल से बढ़ाकर 10 साल कर दिया गया था।

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