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राजनीतिक दलों को चंदे के लिए बॉन्ड को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 26 मार्च को सुनवाई करेगा SC

Live Law Hindi
12 March 2019 9:36 AM GMT
राजनीतिक दलों को चंदे के लिए बॉन्ड को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 26 मार्च को सुनवाई करेगा SC
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को राजनीतिक दलों को चंदे के लिए जारी चुनावी बॉन्ड की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को अपना जवाब दाखिल करने को कहा है।

एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के वकील प्रशांत भूषण की दलीलें सुनने के बाद चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 3 जजों की पीठ ने कहा कि वो इस मामले में अगली सुनवाई 26 मार्च को करेंगे।

दाखिल याचिका में केंद्र सरकार द्वारा वित्त अधिनियम 2017, कंपनी अधिनियम, विदेशी अंशदान विनियम अधिनियम और आयकर अधिनियम के माध्यम से पेश संशोधनों को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने राजनीतिक दलों से नकद चंदे को स्वीकार करने पर रोक लगाने के दिशानिर्देश जारी करने की भी मांग की है।

वित्त अधिनियम, 2017 को एक मनी बिल के रूप में लागू किया गया था। इसके तहत चुनावी फंडिंग के उद्देश्य से किसी भी अनुसूचित बैंक द्वारा जारी किए जाने वाले चुनावी बॉन्ड की प्रणाली शुरू की गई है। अधिनियम द्वारा राजनीतिक चंदे के लिए कंपनी के औसत 3 साल के शुद्ध लाभ की 7.5 प्रतिशत की पिछली सीमा को भी हटा दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप कंपनियों द्वारा राजनीतिक दलों को अब असीमित चंदा दिया जा सकता है।

यहां तर्क दिया गया है कि नए संशोधन राज्य सभा की मंजूरी को दरकिनार करने का एक कुत्सित प्रयास है जो कानून-निर्माण के संवैधानिक और लोकतांत्रिक ढांचे में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

इन संशोधनों का परिणाम यह है कि अब कॉरपोरेट, राजनीतिक दलों को असीमित दान कर सकते हैं और उन्हें ऐसे चंदे का विवरण देने की भी आवश्यकता नहीं है।

इसके अलावा अब भारत के चुनाव आयोग को दी जाने वाली राजनीतिक दलों की वार्षिक रिपोर्ट में चुनावी बॉन्ड के माध्यम से योगदान करने वालों के नाम और पते का उल्लेख करने की भी जरूरत नहीं रह गयी है। यह राजनीतिक दलों के अवैध और विदेशी धन के माध्यम से लोकतंत्र में भ्रष्टाचार और पारदर्शिता पर बड़ा प्रभाव डालता है।

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से उन संशोधनों के लिए भी दिशानिर्देश मांगे हैं जिसमें विदेशी कंपनियों से असीमित राजनीतिक चंदे के दरवाजे खुल गए हैं। उन्होंने कहा है कि इस तरह से चुनावी भ्रष्टाचार को बड़े पैमाने पर वैधता प्रदान की गई है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि इन संशोधनों ने देश की स्वायत्तता के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न किया है और चुनावी पारदर्शिता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करने, राजनीति में भ्रष्ट आचरण को प्रोत्साहित करने, राजनीति और कॉर्पोरेट घरानों के बीच अपवित्र सांठगांठ को और अधिक अपारदर्शी और विश्वासघाती भी बना दिया गया है।

याचिकाकर्ताओं ने ये भी कहा है कि इस बात की आशंका है कि अगर यह संशोधन रद्द नहीं किए गए तो इन कॉरपोरेट घरानों और अत्यंत धनी लॉबी के चलते चुनावी प्रक्रिया और शासन व्यवस्था में गड़बड़ी की जा सकती है। इस तरह की गतिविधियों को अगर अनुमति दी जाती है तो ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है कि देश के आम नागरिकों की कीमत पर इन कॉरपोरेट्स और लॉबी समूहों के पक्ष में कानून लाए जा सकते हैं।

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