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सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा में जूनियर सिविल जजों की नियुक्ति पर रोक लगाई, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को तलब किया [आर्डर पढ़े]

Live Law Hindi
30 April 2019 7:26 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा में जूनियर सिविल जजों की नियुक्ति पर रोक लगाई, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को तलब किया [आर्डर पढ़े]
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के बिना अदालत की अनुमति हरियाणा न्यायिक सेवा में जूनियर सिविल जजों की नियुक्ति करने पर रोक लगा दी है।

पीठ ने हरियाणा में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद के लिए मुख्य परीक्षा में अपनाई गई चयन प्रक्रिया और मूल्यांकन पद्धति को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस भी जारी किया है। उक्त परीक्षा के परिणाम 11 अप्रैल को घोषित किए गए थे।

3 मई को अदालत में उपस्थित होने के निर्देश
इसके अलावा मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को सभी उम्मीदवारों की उत्तर पुस्तिका के मूल्यांकन सहित चयन के रिकॉर्ड के साथ 3 मई को अदालत में उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं।

याचिका में लगाये गए आरोप
आरोप लगाया गया है कि हरियाणा सिविल सेवा (न्यायिक शाखा) परीक्षा- 2017 में भर्ती प्रक्रिया मनमानी और दुर्भावनापूर्ण रही है। यह बताया गया है कि कुल 107 रिक्त पदों के लिए केवल 9 छात्रों (सभी श्रेणियों में शामिल) को साक्षात्कार के लिए चुना गया है, जबकि इसके लिए नियम यह है कि अभ्यर्थियों की संख्या विज्ञापित पदों की संख्या के तीन गुना होनी चाहिए।

बताया गया है कि कम से कम 20-30 उम्मीदवार ऐसे भी थे, जो मुख्य परीक्षा के लिए उपस्थित हुए, पर वो साक्षात्कार के लिए चयनित नहीं हुए। गौरतलब है कि ये वो उम्मीदवार हैं जिन्होंने पहले से ही अन्य राज्यों की न्यायिक परीक्षाओं को पास कर लिया है, या इनमे से अधिकांश पहले से ही जज हैं। ये लोग साक्षात्कार के लिए उपयुक्त नहीं पाए गए, इनमें से कुछ उम्मीदवार प्रतिष्ठित लॉ कॉलेजों के टॉपर और स्वर्ण पदक विजेता हैं।

"आरटीआई अधिनियम के तहत प्राप्त जानकारी के माध्यम से यह स्पष्ट है कि अंतिम परीक्षा चक्र (2015 HCS न्यायिक शाखा भर्ती) में राज्य न्यायिक सेवाओं में सफल उम्मीदवारों की नियुक्ति के लिए, उत्तर लिपियों के मूल्यांकन के लिए कोई स्पष्ट मानदंड मौजूद नहीं था," प्रशांत भूषण की याचिका में कहा गया है। ये भी कहा गया है कि संबंधित मुख्य परीक्षा और लिखित परीक्षा में उम्मीदवार का प्रदर्शन पूरी तरह से परीक्षक के विवेक पर निर्भर करता है।
कहा गया है कि न्यायिक सेवा परीक्षाओं के उदाहरणों को देखें जो हरियाणा राज्य के समान ही पैटर्न पर आयोजित की गईं, में उत्तर पुस्तिकाओं के उचित और गहन मूल्यांकन के लिए समय निर्धारित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

"यह समझ से बाहर है कि केवल 24 दिनों की अवधि में उत्तरदाता ने यहाँ परीक्षा का आयोजन किया और जल्दबाज़ी में अंतिम परिणाम भी घोषित करदिया (जबकि यूपी के मामले में 80 दिन से अधिक समय हो गया है और दिल्ली के लिए 70 से अधिक दिन बीत चुके हैं और परिणाम जारी नहीं हो सके हैं)। यह अपने आप में, प्रथम दृष्टया साफ करता है कि मूल्यांकन मनमाने तरीके से किया गया।"

इसके अलावा पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का ध्यान आकर्षित किया गया और प्रारंभिक जांच के बाद जुलाई, 2017 में पहले से आयोजित प्रारंभिक परीक्षा को प्रश्नपत्र लीक होने के चलते रद्द कर दिया गया है। इसमें कहा गया है कि इसकी नियमित जांच और पूरे मामले की आगे की जांच के लिए निर्देश पारित किए गए थे और 2 उम्मीदवारों और रजिस्ट्रार (भर्ती) डॉ. बलविंदर शर्मा के खिलाफ FIR दर्ज करने का भी निर्देश दिया गया था।


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