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सुप्रीम कोर्ट ने सभी राजनीतिक दलों को चुनावी बॉन्ड के माध्यम से मिले चंदे का ब्योरा चुनाव आयोग को देने का निर्देश दिया [आर्डर पढ़े]

Live Law Hindi
12 April 2019 1:16 PM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राजनीतिक दलों को चुनावी बॉन्ड के माध्यम से मिले चंदे का ब्योरा चुनाव आयोग को देने का निर्देश दिया [आर्डर पढ़े]
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राजनीतिक दलों को चंदे की चुनावी बॉन्ड योजना में दखल न देने की केंद्र सरकार की दलीलों को दरकिनार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अंतरिम निर्देश पारित किया जिसमें सभी राजनीतिक दलों को यह निर्देश दिया गया कि वे 15 मई तक चुनावी बॉन्ड के माध्यम से प्राप्त योगदान का पूरा ब्योरा चुनाव आयोग को दें। हालांकि पीठ ने बॉन्ड पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली पीठ ने शुक्रवार को कहा कि चुनावी बॉन्ड और उनकी पारदर्शिता की कमी एक "वजनदार" मुद्दा है और इस मामले पर गहन सुनवाई की आवश्यकता है।

30 मई तक देना होगा दानकर्ता का ब्यौरा
इसके साथ ही अदालत ने सभी राजनीतिक दलों को प्रत्येक दान-दाता के विवरण, प्राप्त राशि के साथ चुनावी बॉन्ड का पूरा ब्योरा सीलबंद लिफाफे में 30 मई तक चुनाव आयोग को देने के निर्देश दिए हैं। चुनाव आयोग को भी कहा गया है कि वो इस ब्योरे को सुरक्षित रखे।

विस्तृत सुनवाई की जरूरत
पीठ ने कहा है कि फिलहाल दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने के लिए यह अंतरिम आदेश जारी किए गए हैं। पीठ इसके बाद इसकी विस्तृत सुनवाई की तारीख तय करेगी।

पीठ ने वित्त मंत्रालय को उसके हालिया नोटिफिकेशन को भी संशोधित करने को कहा जिसमें जनवरी में 10 दिनों के और अप्रैल में 10 दिनों के अतिरिक्त चुनावी बॉन्ड की खरीद की अनुमति दी गई थी।

भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल, चुनाव आयोग के लिए वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी और एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (ADR) की ओर से प्रशांत भूषण की दलीलों को सुनने के बाद फैसला गुरुवार को फैसला सुरक्षित रखा था।

चुनाव आयोग ने की पारदर्शिता की वकालत

इस दौरान चुनाव आयोग ने कहा कि आयोग चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करना चाहता है, जिसे वर्तमान में चुनावी बॉन्ड के रूप में सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है।

"चुनावी बॉन्ड योजना के जरिये काले धन पर अंकुश"- AG

शुरुआत में AG ने कहा कि चुनावी बॉन्ड की योजना का उद्देश्य चुनावों में काले धन पर अंकुश लगाना है। उन्होंने कहा कि काले धन के खात्मे के लिए चुनावी बॉन्ड की योजना शुरू की गई थी और यह पॉलिसी का विषय है। इसे लागू करने की कोशिश के लिए किसी भी सरकार को दोष नहीं दिया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि योजना के दुरुपयोग के खिलाफ पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं और ये बॉन्ड केवल भारतीय स्टेट बैंक के माध्यम से प्राप्त किए जाते हैं, जो बॉन्ड के खरीदार की पहचान बनाए रखेंगे। लेकिन जिस पार्टी को बॉन्ड प्राप्त हुआ, वह गोपनीय होगा।

उन्होंने कहा कि बैंक, बॉन्ड खरीदार का केवाईसी बनाए रखेगा। एक राजनीतिक दल चुनावी बॉन्ड के लिए केवल एक चालू खाता खोल सकता है। सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास किया है कि चुनावी बॉन्ड के माध्यम से चंदा देने वालों की पहचान का खुलासा न हो।

AG ने कहा कि हर चुनाव में भ्रष्टाचार और कदाचार हो रहा है और मतदाताओं को लुभाने के लिए हर गैरकानूनी तरीका अपनाया जा रहा है, यही जीवन का तरीका है। चुनावी बॉन्ड की योजना उसी पर अंकुश लगाने का एक प्रयोग है और न्यायालय को इस मामले में कम से कम इस लोकसभा चुनाव के अंत तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। नई सरकार के सत्ता में आने के बाद वह इस योजना की समीक्षा करेगी।

जस्टिस दीपक गुप्ता की टिप्पणी

जस्टिस दीपक गुप्ता ने AG का ध्यान आकर्षित किया कि यह प्रणाली अपारदर्शी है और इसमे पारदर्शिता की कमी है। इसके परिणामस्वरूप काले धन को सफेद में परिवर्तित किया जा सकता है। इसके अलावा लोकतंत्र में मतदाता को यह जानने का अधिकार है कि राजनीतिक दलों द्वारा किससे दान प्राप्त किया जा रहा है लेकिन "आप इसे रोक रहे हैं।"

"मतदाताओं को दान की जानकारी होना आवश्यक नहीं" - AG

AG ने कहा, "मतदाताओं को दान के बारे में जानने का अधिकार नहीं है। उन्हें केवल उम्मीदवारों के बारे में पता होना चाहिए।मतदाताओं को यह जानने की जरूरत नहीं है कि राजनीतिक दलों का पैसा कहां से आता है। इसके अलावा पुट्टस्वामी के फैसले के बाद निजता का अधिकार भी है।

CJI के AG से सवाल

CJI ने AG से पूछा "हम जानना चाहते हैं कि जब बैंक X या Y द्वारा आवेदन पर चुनावी बॉन्ड जारी करता है, तो क्या बैंक के पास यह विवरण होगा कि कौन सा बॉन्ड X को जारी किया गया है और कौनसा Y को?"

CJI ने आगे कहा, "यदि ऐसा है तो काले धन से लड़ने की कोशिश करने की आपकी पूरी कवायद बेकार हो जाती है।"

जस्टिस संजीव खन्ना की टिप्पणी

जस्टिस संजीव खन्ना ने AG को बताया कि आपने जिस केवाईसी का उल्लेख किया है वह केवल क्रेता की पहचान के बारे में है। यह धन की वास्तविकता का प्रमाण पत्र नहीं है - चाहे वह काला हो या सफेद। यदि कई शेल कंपनियों के माध्यम से पैसे का लेन-देन किया जाता है तो केवाईसी किसी भी उद्देश्य से कार्य नहीं करेगा।

क्या है यह पूरा मामला१

दरअसल 2 जनवरी, 2018 को केंद्र ने चुनावी बॉन्ड के लिए योजना को अधिसूचित किया था जो कि एक भारतीय नागरिक या भारत में निगमित निकाय द्वारा खरीदे जा सकते हैं। ये बॉन्ड एक अधिकृत बैंक से ही खरीदे जा सकते हैं और राजनीतिक पार्टी को ही जारी किए जा सकते हैं। पार्टी 15 दिनों के भीतर बॉन्ड को भुना सकती है। दान-दाता की पहचान केवल बैंक को होगी जिसे गुमनाम रखा जाएगा।

इसपर केंद्र का कहना है कि "यह योजना वैध केवाईसी और ऑडिट ट्रेल के साथ बॉन्ड प्राप्त करने की एक पारदर्शी प्रणाली बनाने की परिकल्पना करती है। जो इन बॉन्डों को खरीदते हैं, वे बैलेंस शीट में किए गए ऐसे दान के बारे में बताएंगे। चुनावी बॉन्ड दानकर्ताओं को बैंकिंग मार्ग से दान करने के लिए प्रेरित करेगा।यह पारदर्शिता, जवाबदेही और चुनावी सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम सुनिश्चित करेगा।

11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों को चंदे के लिए जारी चुनावी बॉन्ड की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को अपना-अपना जवाब दाखिल करने को कहा था।

यह कदम भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स व अन्य द्वारा दायर की गई याचिका पर उठाया गया है।


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