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सुप्रीम कोर्ट ने एडीईएल लैंड्मार्कस के निदेशक का अंतरिम ज़मानत रद्द कर उसे तत्काल सरेंडर करने को कहा [आर्डर पढ़े]

Rashid MA
19 Jan 2019 8:47 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने एडीईएल लैंड्मार्कस के निदेशक का अंतरिम ज़मानत रद्द कर उसे तत्काल सरेंडर करने को कहा [आर्डर पढ़े]
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सुप्रीम कोर्ट ने एक रीयल एस्टेट फ़र्म एडीईएल लैंड्मार्कस के एक निदेशक को कोर्ट में अविलंब सरेंडर करने को कहा है। निदेशक को दिल्ली हाईकोर्ट से मिली राहत को भी सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया। द्वारका एक्सप्रेसवे पर बन रहे कॉसमोसिटी परियोजना में पैसा लगाने वाले 400 से अधिक निवेशकों को इससे भारी राहत मिली है। इस परिरयोजना को बंद कर दिया गया है।

न्यायमूर्ति एनवी रमना और मोहन एम शांतनागौदर की पीठ ने एडीईएल लैंड्मार्कस के एक निदेशक सुमित भराना को तत्काल कोर्ट में सरेंडर करने को या फिर गिरफ़्तारी झेलने को कहा है। भराना और अन्य निदेशकों के ख़िलाफ़ बहुत ही सारे मामले दर्ज कराए गए हैं। मकान ख़रीदने वालों से पैसे ले लिया गया और इस परियोजना को बंद कर दिया।

इस बारे में घर ख़रीदने वाले कई सारे लोगों ने विशेष अनुमति याचिका दायर कर भराना को मिले अंतरिम संरक्षण को वापस लेने की माँग की थी।

इन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने उन्हें कोई नोटिस दिए बिना ही अपना आदेश पारित कर दिया।

इस बीच, भराना के वक़ील ने बहुत सारे ख़रीदारों के साथ मामले को सुलझाने की कोशिश की और उन्हें पैसे का भुगतान भी किया और कोर्ट से कहा कि उसे अन्य ख़रीदारों के साथ भी मामले को सुलझाने का मौक़ा दिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने ग़ौर किया कि आर्थिक अपराध शाखा ने आरोपी के ख़िलाफ़ आपराधिक षडयंत्र, धोखाधड़ी और क़रार तोड़ने के तहत 2015 में मामला दायर किया लेकिन उसने जाँच में सहयोग नहीं दिया और बाद में उन्हें भगोड़ा घोषित कर दिया गया।

भराना ने साकेत कोर्ट में अग्रिम ज़मानत के लिए आवेदन दिया था जिसे कोर्ट ने मान लिया जिसे बाद में 8 मार्च 2018 को रद्द कर दिया और तब से यह मामला लंबित है।

इसके बाद आरोपी ने अंतरिम ज़मानत को रद्द करने के आदेश को चुनौती दी और दिल्ली हाईकोर्ट ने इस आदेश को 16 मार्च 2018 को रद्द कर दिया और उसे घर के ख़रीदारों से मामले को सुलझाने के लिए गम्भीर प्रयास करने को कहा।

सुप्रीम कोर्ट ने हालाँकि, कहा, "इस आदेश पर ग़ौर करने के बाद स्पष्ट होता है कि हाईकोर्ट ने साकेत अदालत के अतिरिक्त सत्र जज के इस आदेश में दख़ल देने का कोई कारण नहीं बताया है…".

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाइकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और भराना को अविलंब सरेंडर करने को कहा। भराना ने 15 जनवरी तक सरेंडर नहीं किया था और पुलिस ने उसके ख़िलाफ़ ग़ैर-ज़मानती वारंट हासिल किया है।


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