भारत में महिलाओं के विधिक अधिकार: वास्तविकता और चुनौतियाँ
Justice Dwarka Dhish Bansal
10 Aug 2026 5:15 PM IST

भारत में स्वतंत्रता के 79 साल बाद महिलाओं ने कानूनी रूप से एक बड़ी शक्ति अर्जित की है और आज वे पुरुषों के बराबर मानी जाती हैं। उनकी स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए कानून में उन्हें कई अधिकार दिए गए हैं, जिनमें उनकी लाज (Modesty) और गरिमा (Dignity) भी शामिल है। यहाँ तक कि वे पुरुषों के साथ पूर्ण रूप से प्रतिस्पर्धा करने हेतु सक्षम हैं और कई क्षेत्रों में उन्हें पुरुषों से भी बेहतर माना जाने लगा है। समान स्वतंत्रता के अधिकार के साथ-साथ, उन्हें पारिवारिक संपत्ति में वे समस्त अधिकार दिए गए हैं जो एक पुत्र को प्राप्त हैं। समय-समय पर महिलाओं के हित में बहुत सारे कानूनी प्रावधान किए गए हैं। मगर प्रश्न यह उठता है कि क्या ये अधिकार एक महिला को वास्तव में प्राप्त हैं, या ये केवल कानूनी किताबों तक ही सीमित हैं?
एक कठोर सत्य यह है कि ये सभी अधिकार अक्सर मात्र दिखावा सिद्ध होते हैं। भारत में हिंदू पर्सनल लॉ में पिछले 70 सालों में कई संशोधन किए गए। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में एक महिला को को-पार्सनरी (Co-parcenary) संपत्ति में बराबर का अधिकार दिया गया। यानी अब एक महिला पुरुष के समान अधिकार प्राप्त करती है।
साथ ही, निम्नलिखित कानूनों में महिलाओं को भरण-पोषण (Maintenance) और निवास (Residence) का अधिकार दिया गया है:
1. घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005.
2. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 144 (पूर्ववर्ती CrPC की धारा 125).
3. हिंदू दत्तक एवं भरण पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 18 से 20.
4. हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13, 24, 25 एवं 27 के तहत तलाक, एलिमनी (Alimony) और स्त्रीधन की वापसी का अधिकार
हिंदू दत्तक एवं भरण पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 7 और 8 के तहत एक बच्चे को गोद लेने का अधिकार भी एक पुरुष और स्त्री को प्राप्त है। इन सब अधिकारों के बावजूद वास्तविक सामाजिक स्थिति यह है कि महिलाओं द्वारा अधिकारों की प्राप्ति के मार्ग में एक बहुत बड़ी खाई है। जिसे पाटने के लिए न तो न्यायिक व्याख्या और न ही संसदीय संशोधन काफी हैं।
महिला की एक ऐसी आवाज़, जो आज तक लोगों/कानून ने नहीं सुनी
जब-जब संपत्ति में अधिकारों की बात आती है, महिला का अस्तित्व हमेशा से नकारा जाता रहा है। बेटी, बहन, पत्नी और माँ के रूप में वो समाज का एक हिस्सा है। उसे 'घर की लक्ष्मी' भी कहा जाता है, लेकिन भरण-पोषण के अधिकार के अलावा उसका चल और अचल संपत्ति में कोई भी ठोस और सुलभ कानूनी अधिकार धरातल पर नहीं दिखता।
कई सरकारें आईं और गईं, बारंबार कानून में संशोधन किया गया। सन् 1956 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम आया, जिसकी धारा 8 के अनुसार किसी पुरुष सदस्य की मृत्यु के बाद एक पुत्री, पत्नी और माँ के रूप में उसे प्रथम वर्ग (Class-I) के उत्तराधिकारियों में रखा गया।
लगभग 50 वर्ष पश्चात, वर्ष 2005 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 को संशोधित किया गया, जिसके अनुसार उसे 'को-पार्सनर' (Co-parcener) की श्रेणी में रखा गया। जो उसके लिये काफी खुशी की बात थी।
परंतु इस संशोधन के पश्चात माननीय उच्चतम न्यायालय के एक निर्णय— प्रकाश बनाम फूलवती (2016) 2 SCC 36 , ने एक नए विवाद को जन्म दिया। इस निर्णय के अनुसार, संशोधन को भविष्यलक्षी (Prospective) प्रभाव से लागू होना था, जिसके अनुसार पिता का 9 सितंबर 2005 (संशोधन की तिथि) को जीवित होना आवश्यक था।
यद्यपि बाद में उपरोक्त निर्णय को माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) 9 SCC 1 के ऐतिहासिक फैसले से बदल दिया गया। इस निर्णय ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसे भूतलक्षी (Retrospective) प्रभाव से 'को-पार्सनरी' अधिकार प्राप्त हैं।
इन निर्णयों के बावजूद आज भी स्थितियां पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। वर्तमान कानूनी स्थिति के अनुसार, यदि महिला का जन्म 1956 से पहले हुआ है, तो 'जन्मजात अधिकार' का सिद्धांत (Doctrine of Pious Obligation/Birthright) उस पर उस तरह लागू होता है जैसे पुरुषों पर होता है। उसे अपने अधिकारों के लिए अक्सर पिता की मृत्यु का इंतजार करना होता है, वह भी तब जब संपत्ति को पूर्व में ही विक्रय, दान या वसीयत के द्वारा हस्तांतरित न कर दिया गया हो।
सामाजिक और भावनात्मक द्वंद्व
निश्चित रूप से, इन अधिकारों को मांगने के लिए उसे अपने पिता के घर के रिश्तों को दांव पर लगाना पड़ता है। जैसे ही वो अपने हक की बात करती है, माता-पिता, भाई-भाभी और भतीजों के साथ उसका रिश्ता खत्म होने की कगार पर आ जाता है।
एक कड़वा सच यह है कि हमारे पितृसत्तात्मक ढांचे (Patriarchy) में जो पुत्रियां अपने अधिकारों से दूर रहती हैं, उन्हें 'संस्कारी' माना जाता है। और जो अपना अधिकार मांगती हैं, उन्हें सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। यदि पिता बिना किसी वसीयत के मृत्यु को प्राप्त होते हैं, तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के तहत उसका निहित अधिकार है, फिर भी भाइयों के मन में उनका हिस्सा कम हो जाने की असुरक्षा पैदा हो जाती है।
महिला के अधिकारों पर प्रथाओं का प्रहार
कई मामलों में माता-पिता की मृत्यु के बाद बहनों से शपथ-पत्र (Affidavit) या अपंजीकृत सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर करवाकर संपत्ति भाइयों के नाम करवा ली जाती है। कहीं-कहीं तो झूठे शपथ-पत्र देकर बहन के अस्तित्व को ही नकार दिया जाता है या उसे मृत घोषित कर दिया जाता है, ताकि उसे संपत्ति में हिस्सा न देना पड़े।
यहाँ एक भिन्न और महत्वपूर्ण प्रश्न उत्पन्न होता है कि विवाह के पश्चात महिला का अधिकार केवल पैतृक संपत्ति में ही क्यों है? वो अपने पति के जीवित रहते उनकी संपत्ति मेंसह-अधिकार क्यों नहीं रख सकती?
एक पुत्री के रूप में वो अपने पिता की मृत्यु के बारे में सोच भी नहीं सकती। एक पत्नी के रूप में वो पति की लंबी आयु के लिए करवा चौथ का व्रत रखती है। एक माँ के रूप में पुत्र के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखती है। ऐसी स्थिति में, केवल संपत्ति के लिए, वो अपने प्रियजनों की मृत्यु की प्रतीक्षा कैसे कर सकती है ?
क्या यह संभव नहीं है कि वो संपत्ति में अपना अंतर्निहित अधिकार, बिना माँगे प्राप्त कर सके? यदि उस पर संपत्ति के हस्तांतरण के संबंध में कुछ शर्तें लगाई भी जाएँ, जैसे कि बिना न्यायालय की अनुमति के वो उसे बेच न सके, तो भी वह उसे स्वीकार्य है। वास्तव में, वो अपनी पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं माँगना चाहती, फिर भी कई बार ससुराल पक्ष द्वारा इसके लिए उसे बाध्य किया जाता है। वहीं दूसरी ओर, जब वो पिता की संपत्ति में अपना हक देखती है, तो उसके मायके वाले विरोध करते हैं। इस परिस्थिति में उसके सारे रिश्ते दम तोड़
देते हैं। जब कभी वो अपना अधिकार माँगती है, तो वास्तव में उसे तुरंत कुछ प्राप्त नहीं होता। लंबी कानूनी प्रक्रिया चलती रहती है, जिसमें कई बार उसकी यानी महिला की मृत्यु तक हो जाती है। उसके बाद वह संपत्ति उसके बच्चों में बंट जाती है, लेकिन इस कानूनी लड़ाई के कारण
भाई और मायके से संबंध हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं।
भरण-पोषण की विडंबना
वर्तमान कानून में महिला का अधिकार केवल भरण-पोषण और घर में रहने के अधिकार तक सीमित है, वह भी तब जब वो स्वयं को असमर्थ सिद्ध कर दे। यदि वो शिक्षित है, तो विपक्षी और न्यायालय द्वारा सवाल किया जाता है कि "जब आप पढ़ी-लिखी हैं, तो स्वयं कमा क्यों नहीं सकतीं?" ऐसी स्थिति में उसका शिक्षित होना ही भरण-पोषण प्राप्त करने में बाधक बन जाता है। उसे यह सिद्ध करना पड़ता है कि वो असमर्थ है, जबकि उसे समाज में 'घर की लक्ष्मी' माना जाता है।
कानूनी सुधारों की आवश्यकता
यदि महिला को पति की संपत्ति में कानूनी सह-अधिकार (Co-ownership) मिल जाए, तो मेरा मानना है कि ससुराल में होने वाले उत्पीड़न और क्रूरता की घटनाओं में भारी कमी आएगी।
इससे IPC की धारा 498A, 304B और वर्तमान भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत दर्ज होने वाले मुकदमों में कमी आएगी। साथ ही, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 और भारतीय नागरिक सुरक्षा
संहिता (BNSS), 2023 की धारा 144 (पूर्ववर्ती धारा 125 CrPC) के तहत चलने वाले तलाक और भरण-पोषण के केस भी कम होंगे।
एक महिला पुरुष की तुलना में शारीरिक रूप से शायद उतनी सुदृढ़ नहीं है, जिसका लाभ उठाकर कोई भी व्यक्ति उसकी गरिमा (Dignity) को ठेस पहुँचाने का साहस कर लेता है। अक्सर पुलिस और न्यायालय के सामने अपराधी साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त हो जाते हैं।
मेरा निवेदन है कि यदि कोई व्यक्ति किसी महिला की गरिमा को नुकसान पहुँचाता है, तो उसे जेल की सजा के साथ-साथ यह प्रावधान भी होना चाहिए कि पीड़िता को अभियुक्त और उसके परिवार की संपत्ति में हिस्सा मिले, ताकि संपत्ति जाने के डर से कोई ऐसा अपराध करने की सोच भी न सके।
संपत्ति और स्त्रीधन का संघर्ष
वर्तमान कानूनी ढांचे में जब तक माता-पिता जीवित हैं, तब तक संपत्ति पर महिला का पूर्ण अधिकार नहीं है। यदि संपत्ति हस्तांतरित की जा रही हो, तो भरण-पोषण के दावेदार (विशेष रूप से महिला) का उस संपत्ति पर चार्ज होना चाहिए, ताकि भरण-पोषण के दावेदार का भविष्य सुरक्षित रहे। यद्यपि दावेदार अपना दावा प्रस्तुत कर ऐसा अधिकार घोषित करा सकता है लेकिन यह भी आसानी से सम्भव नहीं है। 'स्त्रीधन' के अधिकार के बारे में भी बहुत कुछ कहा जाता है, लेकिन व्यवहार में वह ससुराल पक्ष के कब्जे में रहता है। चूंकि अधिकांश मामलों में 'स्त्रीधन' का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं होता, इसलिए इसकी वापसी एक 'कल्पना की उड़ान' मात्र रह जाती है।
जहाँ तक ससुराल में निवास के अधिकार की बात है, कानून ने ऐसा अधिकार तो दिया है, लेकिन जिस घर में जान का खतरा हो, वहाँ उस घर के एक कमरे में सुरक्षित रहने की क्या गारंटी है? तलाक की प्रक्रिया इतनी लंबी है कि महिला के जीवन का स्वर्णिम समय कानूनी लड़ाइयों में ही नष्ट हो जाता है।
निष्कर्ष
कानून ने महिला को आवाज दी है, लेकिन समाज आज भी उसे 'पराया धन' समझता है। वह एक ऐसा 'धन' है जिसे लगभग एक तिहाई उम्र पिता के घर और लगभग दो तिहाई उम्र पति के घर बितानी है, मानो उसे समय-समय पर हस्तांतरित किया जा सकता हो। अक्सर रिश्तों के टूटने के डर से एक महिला की खामोशी कायम रहती है उसे हमेशा 'रिश्तों' और 'अधिकार' के बीच चुनाव करने के लिए मजबूर किया जाता है।
उसका संघर्ष केवल संपत्ति के लिए नहीं है, बल्कि समाज में अपनी गरिमा (Dignity), पहचान (Recognition) और स्थान (Status) के लिए है। वास्तविक सुधार तब होगा जब महिला को अधिकार केवल कानूनी किताबों और अदालतों के फैसलों में नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से अथवा लोगों के हृदय में मिलेगा।
लेखक मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर के न्यायाधीश हैं।


