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साइबर प्रौद्योगिकी, अन्वेषण एवं मानवाधिकार का नवीनतम दृष्टांत - न्यायपालिका की नज़र से

LiveLaw News Network
30 March 2022 3:05 PM GMT
साइबर प्रौद्योगिकी, अन्वेषण एवं मानवाधिकार का नवीनतम दृष्टांत - न्यायपालिका की नज़र से
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हिमांशु दीक्षित, फाइनल ईयर लॉ स्टूडेंट, एनएलआईयू, भोपाल

तकनीकीकरण ने राजकीय सत्ता में अनेक परिवर्तन स्थापित कर दिए है, फिर वो चाहे नागरिक अधिकारों के विरोध में हो या फिर संपूर्ण समाज के हित में हो। अतः यह एक स्वीकारणीय तथ्य है कि तकनीकीकरण का मानव-स्वतंत्रता पर सदैव कोई न कोई प्रभाव निश्चित ही पड़ता है। साइबर अपराध का दिन-प्रतिदिन उजागर होना और इन पर अंकुश रखने वाली संस्थाओं का स्वयं में ही अवैधानिक तरीके से अधिकारों का दुरुपयोग करना यह दर्शाता है कि दोनों ही रूप में सामान्य नागरिक के ही मौलिक अधिकारों का हनन होता है।

वर्ष 2017 का ऐतिहासिक फैसला जिसको पुत्तुस्वामी केस (Justice K S Puttaswamy (Retd) v. Union of India (2017) 10 SCC 1) नाम से भी जाना जाता है ने सर्विलांस और साइबर स्पेस की दिशा और दशा दोनों ही बदल दी है। पिछले कुछ सालो में न्यायालय का साइबर फॉरेंसिक के क्षेत्र में कुछ अलग ही मिज़ाज रहा है फिर चाहे वो आधार एक्ट फैसला हो या हो वो पीयूसीएल केस (PUCL v. Union of India, (1997) 1 SCC 301) फैसला या चाहे फिर वो हो आरूषि हत्याकांड केस।

हर क्षेत्र में साइबर फॉरेंसिक के तत्व विद्यमान है। इस आलेख के माध्यम से लेखक विगत कई वर्षो से हुए साइबर प्रौद्योगिकी परिवर्तन को नज़र में रखते हुए उनसे उत्पन्न कानूनी चुनौतियां का विधिवत व्याख्यान और देश की न्यायालयों का इस क्षेत्र में बदलते हुए परिप्रेक्ष्य को उजागर करना चाहेगा और इन समस्याओं के निदान के लिए अतिआवश्यक उपचार इत्यादि का भी विवरण देने का प्रयास करेगा।

"यदि आधुनिक मीडिया प्लेटफॉर्म में की हुई अभिव्यक्ति को भी सरकारों द्वारा सर्विलांस किया जाने लगा तो वो दिन दूर नहीं होगा जब हमारा देश एक सर्विलांस देश के नाम से जाना जाएगा।" -

"महुआ मोइत्रा वनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया (SC) (2018)

I. प्रस्तावना

बिना साइबर फॉरेंसिक के 'साइबर क्राइम इन्वेस्टीगेशन' का सफल हो पाना एक असंभव बात है। साइबर फॉरेंसिक इन्वेस्टीगेशन के अंतर्गत अनेक शाखाएं विद्दामान है, जैसे कि क्लाउड कंप्यूटिंग, नेट्वर्क फोरेंसिक, मोबाइल फोरेंसिक, मेमोरी फोरेंसिक, ऑडियो फोरेंसिक, वीडियो फोरेंसिक, मीडिया फोरेंसिक, आदि। मोबाइल फॉरेंसिक इन्वेस्टीगेशन भी साइबर फॉरेंसिक का एक व्यापक रूप है, जिसका उपयोग इस युग में अपरिहार्य है क्यूंकि लगभग हर चौथे साइबर अपराध में मोबाइल का प्रयोग होना लाजमी हो गया है।

फ़ोन टैपिंग, कॉल लिसनिंग बिना संविधानिक अनुमति के भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1) और 21 का उलंघन करता है। ऐसे कानून विशिष्टरूप से सिर्फ भारत के द्वारा ही नहीं बल्कि अंतररास्ट्रीय स्तर तक के प्रावधानों में भी शुमार है- जैसे, ICCPR की धारा 17 एवं UNDHR की धारा 15 जो की निजता के अधिकारों का विधिवत संरक्षण करने हेतु राष्ट्रो को आदेशित करती है ।

II. सर्विलांस:- मूलभूत उद्विकास एवं व्याख्या

जिस समय औद्योगीकरण व् भूमंडलीकरण नामक इंजन भारत देश में प्रवेश कर रहे थे, उसी समय इन इंजनों को ईंधन प्राप्ति हेतु भारतीय टेलीकम्यूनिकेशन सेक्टर का विकास होना अपरिहार्य था। सर्विलांस शब्द का सम्बन्ध पुलिस से ही नहीं जुड़ा हुआ है, अपितु इस तकनीकी का प्रयोग अन्य क्षेत्रों में भी संभव है। सर्विलांस जैसी तकनीकी की उत्पत्ति अमेरिकन क्रांति के दौरान विशिष्ट रूप से हुई थी।

क्रिमिनोलॉजिस्ट जेरेमी बेन्थैम ने अपने भाई शमूएल बेन्थैम से रूस में मिलकर एक अनोखे विचार को जन्म दिया था, जिसका नाम बाद में "पनोप्टिकन" सिद्धान्त पड़ गया था। जेरेमी बेन्थैम ब्रिटिश जेल प्रणाली से अत्यंत परेशान थे क्योंकि वहां पर कैदियों की अवस्था बहुत ही जर्जर और निर्दयी थी।

अपने भाई की व्यवस्था संबंधी तकनीकी से प्रभावित होकर जेरेमी बेन्थैम ने जेल, हॉस्पिटल, स्कूल, फैक्ट्री जैसी संस्थानो में एक विशेष प्रकार का ढांचा बनाकर वहां की प्रतिक्रियाओं की सहज तरीके से निरीक्षण कर पाना एवं 24x7 घंटे निगरानी जैसी अनेक सुविधाओं का एक साथ हो पाना सुनिश्चित करवाया।

III. भारत में साइबर फॉरेंसिक की झलक

इस निगरानी की व्यवस्था को ही सर्विलांस के नाम से जाना जाता है। पुलिस का यताकथित अपराधियों की हरकतों का अन्वेक्षण करना, रात्रि निगरानी रखना, मोबाइल टैप करना, नंबर लिसनिंग पर लगाना, लोकेशन का पता लगाना, IMEI नंबर रन करवाना, कॉल रिकॉर्डिंग का संकलन करना, व्हाट्स एप्प जैसे अनेक उपकरणों में हैक करना, कॉल डिटेल रिपोर्ट का मंगवाना आदि जैसे अनेक टेक्नोलॉजिकल उपकरणों का प्रयोग कर लोगो की निजता पर से जानकारी निकालना ही सर्विलांस की परिभाषा में आता है।

सर्विलांस का प्रयोग आज की तिथि में ना केवल पुलिस के द्वारा ही होता है, बल्कि गैर-सरकारी संस्थाएं जैसे गूगल, जीमेल, फेसबुक, विशेष सर्वर आदि जैसे माध्यम भी लोगो के ऊपर प्रतिपल अपनी नज़र डटा कर रखते है। इसी समस्या को अत्यधिक उजागर करने वाला प्रथम व्यक्ति दार्शनिक मिचेल फ़ौकॉल्ट थे, जिन्होंने अपने कार्य में लोगो के ऊपर पड़ने वाली अनायाश सर्विलांस की समीक्षा की है।

भारत के इतिहास में साइबर टेक्नोलॉजी का दुरुपयोग बीसवीं शताब्दी में भी अत्यधिक प्रचलित था इसका दृष्टान्त हमें 1988 में देखने को मिल सकता है जब रामकृष्णा हेगड़े जो कि कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री थे के द्वारा साइबर टेक्नोलॉजी का दुरुप्रयोग कर विपक्ष के नेताओं की निजता को भंग किया गया । हालांकि, बाद में इसी के चलते उनको इस्तीफा भी देना पड़ा था।

IV. कानूनी चुनौतियां एवं उद्देश्य

अमेरिकन कोर्ट के एक केस (United States v Jones 565 US 400 (2012)) में, जहां पुलिस द्वारा साइबर प्रौद्योगिकी का प्रयोग करते हुए वादी की गाडी में GPS ट्रैकिंग डिवाइस को स्थापित कर उस व्यक्ति के गमनागमन पर निगरानी रखी जा रही थी, के मसले में कोर्ट ने इस प्रौद्योगिक प्रयोग की घोर निंदा की थी एवं गोपनीयता की भंगता हेतु इस सर्विलांस प्रक्रिया को अवैध घोषित भी कर दिया।

भारत देश की पुलिस यदि किसी व्यक्ति को डिटेंशन में लेती है तो सर्वप्रथम उसकी तलाशी लेकर उसके पास मिलने वाली सारी वस्तुओं को जब्त कर लेती है और मुश्किल से कुछ ही मामलों में ही दोषी या उसके परिवारवालों को सारी वस्तुएं वापस मिल पाती है । हालांकि परिचय/आधार/लाइसेंस पत्र इत्यादि तो सामन्यतयाः वापस मिल जाता है, लेकिन आपदा आती है तो मुख्यतयाः दो वस्तुओं पर "पैसे" और "महंगे मल्टीमीडिया फ़ोन/लैपटॉप" पर।

अभियुक्त की सारी निजी एवं व्यक्तिगत जानकारी जो कि उस इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में संचित होती है को पुलिस जांच रुपी परदे के पीछे से घुसपैठ कर निजता भंग करती है या कभी भी भविष्य में कर सकती है। अमेरिकन कोर्ट के एक और केस (Riley v. California 271 (2014)) में इस प्रक्रिया से बचने के हेतु यह स्पष्ट किया गया था कि बिना विशिष्ट जांच वारंट के पुलिस व्यक्ति के निजी इलक्ट्रोनिक डिवाइस में संकलित संग्रह को देख नहीं सकती है. चाहे भले ही आरोपी जेल या कस्टडी में ही क्यों न हो।

साइबर क्राइम्, साइबर फोरेंसिक, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, साइबर सिक्योरिटी इत्यादि का समावेश IT Act 2000 में विधिवत दिया हुआ है । हालांकि, यह बात अलग है कि अनेकानेक खोजो में यह पाया गया है कि भारतीय कानून संरक्षक संस्थाओं जैसे जिला पुलिस इत्यादि को विधिवत प्रशिक्षण एवं साइबर क्षेत्र के कानूनी दांव-पेंच में दक्षता प्राप्त न हो पाने के चलते क़ानून के लम्बे हाथ कसूरवार तक नहीं पहुंच पाते हैं।

साइबर क्राइम की बढ़ोत्तरी रोकने के लिए पुलिस को टेक्नोलॉजी की मदद लेनी पड़ती है, जिसमे कि मोबाइल फॉरेंसिक, डाटा फॉरेंसिकऔर कंप्यूटर फॉरेंसिक एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते है। ये टेक्नोलॉजी एक ओर तो अभीशासन करने में कार्यक्षमता को बढ़ाता है, लेकिन दूसरी ओर यही टेक्नोलॉजी मानव अधिकार के हनन में भी एक मुख्य कारण बनता हैं।

भारतीय संविधान में नागरिकों को कई मौलिक अधिकारों से नवाजा गया है, इन अधिकारों में से कुछ अधिकार बहुत ही मूलभूत हैं जिनका सीधा संबंध मनुष्य के मनुष्यता से जुड़ा हुआ है । कुछ अधिकार ऐसे भी होते है जो व्यक्ति से कभी प्रथक ही नहीं हो सकते, जिनमे से एक है 'निजता का अधिकार' । अनुच्छेद 21 के तहत माननीय सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा 'गोपनीयता का अधिकार' को मूलभूत मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया है।

"के० एस० पुत्तुस्वामी बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया (Justice K S Puttaswamy (Retd) v. Union of India (2017) 10 SCC 1)" ने देश में टेक्नोलॉजी और मानवाधिकार के सम्बन्ध में बृहद तरीके से तालमेल स्थापित कर दिया है, इसका प्रभाव पुलिस की सर्विलांस, डाटा फॉरेंसिक, साक्ष्य संकलन विधि इत्यादि पर मुख्य रूप से पड़ेगा। 'इंडियन टेलीग्राफ एक्ट 1885' इस क्षेत्र में एक ऐसा विधान है जिससे कि देश की संचार व्यवस्था को नियमित और नियंत्रित किया जा सके। इस विधान की धारा 5 भारत सरकार को एक अनियंत्रित शक्ति प्रदान करती है जिससे कि वो फ़ोन टैपिंग जैसी साइबर टेक्नोलॉजी का प्रयोग कर अपराध पर अंकुश स्थापित करती है।

भारत ही नहीं, अपितु यदि अमेरिका को ही देखा जाए तो उनके Stored Communications Act 18 U. S. C. §2703 के तहत सरकार को पूरा अधिकार है कि सर्विलांस और प्रौद्योगिकी की मदद से किसी भी प्रकार की संचार व्यवस्था की निगरानी रख सकते है और उन जानकारियों का प्रयोग कर अपराध पर लगाम लगा सकते है।

हालांकि गौरतलब कि बात यह है कि वर्ष 2018 में न केवल भारतीय न्यायालय ने साइबर टेक्नोलॉजी पर अहम् और विशिष्ट निर्णय लिए है, बल्कि अमेरिकन सर्वोच्च न्यायालय ने भी पुलिस द्वारा सर्विलांस का दुरुपयोग रोकने के लिए हाल ही में एक ऐतिहासिक फैसले (Timothy v. USA, 585 U. S. (2018)) में अमेरिकन चौथे संशोधन को वरीयता देते हुए कोर्ट ने पुलिस की इस अनियमित टेक्नोलॉजिकल शक्ति पर प्रतिरोध लगाने हेतु दिशा-निर्देशन जारी किया था।

V. साइबर फॉरेंसिक के ऐतिहासिक अभिनिर्णय

'इंडियन टेलीग्राफ एक्ट 1885' की धारा 5 स्वयं में ही एक बेलगाम प्रावधान है। ऐसा इसलिए क्यूंकि, इसके माध्यम से शासन एवं प्रशासन के प्रभावशाली व मुख्यदर्जा प्राप्त व्यक्ति या तो भ्रष्ट आचरण करते हुए उन जानकारियों का दुरुपयोग करते है, या तो स्वहित कार्य हेतु उसका प्रयोग करते है। एक अनुमान लगाया जाता है कि लगभग 4000 कॉल डिटेल्स रिपोर्ट (CDR) का लेन-देन पुलिस और निजी व्यक्तियों के बीच हर वर्ष अच्छी मूल्यों की दर में होता है।

खरक सिंह बनाम स्टेट ऑफ़ उ०प्र० (1963) AIR 1295, भारतीय न्यायशास्त्र में एक वो ऐतिहासिक फैसला था जिसने टेक्नोलॉजिकल (साइबर) फॉरेंसिक एवं पुलिस सर्विलांस को एक नयी दिशा प्रदान की थी। लेकिन 2017 के पुत्तुस्वामी केस में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने उस समय तक के पुलिस और साइबर फॉरेंसिक से जुड़े हुए दो आधारभूत निर्णय ["एम० पी० शर्मा बनाम सतीष चंद्र (1954 AIR 300)" व "खरक सिंह बनाम स्टेट ऑफ़ उ०प्र० (1963 AIR 1295)"] को पलट दिया, जिससे की यह साफ़ स्पष्ट होता है कि मौलिक अधिकार का जन्म किसी कानून या संविधान के जरिए नहीं हुआ है बल्कि उनका जन्म मनुष्य के मनुष्यता से ही जुड़ा हुआ है।

दूरसंचार मंत्रालय ने 2007 में इस 1885 विधान एवं नियमावली में कुछ संशोधन कर धारा 5 को तोड़ा और कठोर बनाया । हालांकि, यह प्रतिक्रिया भारत सरकार को सर्वोच्च न्यायालय के "पी०यू०सी०एल० बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया (1997 1 SCC 301)" केस में दिए हुए कड़क निर्देशन के बाद उठानी पड़ी थी ।

VI. निष्कर्ष एवं सुझाव

भारत में तकनीकी-कानूनी कुशलता का गंभीर अभाव है। इसका बात का पता हम लोगो को आरुषि हत्याकांड में हुई साइबर फॉरेंसिक की भूल-चूक से ही लग गया था। इस प्रख्यात केस में वादी सीबीआई के द्वारा circumstantial evidence के संकलन पर ही सिर्फ जोर दिया गया थाऔर साइबर फॉरेंसिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पर बिलकुल भी बल नहीं दिया गया था।

यदि सत्र न्यायालय में अभियुक्त से जुडी हुई तकनीकी जानकारी- जैसे कि, प्रवेश की हुई वेबसाइटों की जानकारी और डाटा, कंप्यूटर हार्ड-डिस्क की जानकारी और उसका डाटा, राऊटर का विवरण -इत्यादि का संज्ञान लिया गया होता, तो केस की दिशा और दशा दोनो ही और मजबूत और निर्विवादित होती।

जब हम साइबर फॉरेंसिक से जुडी हुई कोई टिप्पणी करते है तो हमारा ध्यान "व्यापम घोटाले " की ओर भी अग्रेषित होता है । व्यापम घोटाला मध्य प्रदेश प्रोफेशनल परीक्षा बोर्ड से जुड़ा हुआ शिक्षा के क्षेत्र में आज तक के इतिहास में किया हुआ सबसे बड़ा फर्जी डिग्री वितरण वाला भ्रष्टाचार है। इस केस में भी डिजिटल एविडेंस जो कि पैन ड्राइव से प्राप्त हुए थे और उन दस्तावेजों के सत्यापन हेतु भी साइबर टेक्नोलॉजी की पूरी मदद ली गयी थी।

विगत कई वर्षो से साइबर फॉरेंसिक की मदद लेते हुए पुलिस दिन-प्रतिदिन बड़े से बड़े केसों को आसानी से सुलझा दे रही है इनमे आईपीएल मैच फिक्सिंग, बिटकॉइन वेबसाइट केस, Nokia का टैक्स चोरी केस, अमृता रॉय के मेल का हैक होना जिसमे की पुलिस के द्वारा IP Address जांच की मदद लेना इत्यादि भी शामिल है।

पिछले कुछ वर्षो से हम इस योग्यता को बढ़ाने के लिए उच्च-स्तर के उपकरणों को खरीद रहे है, पुलिस ट्रेनिंग केंद्र/ अकादमियों में नए-नए साइबर कोर्सेज का आवाहन करने क साथ-साथ, अमेरिका जैसे देशों से प्रशिक्षण भी प्राप्त कर रहे है । CCTNS व्यस्वस्था साइबर फॉरेंसिक में एक अच्छे मुक़ाम को हासिल कर पाने का परिचायक है।

कुछ सुझाव:-

• भारतीय गुप्तचर एजेंसियों को भी e -सर्विलांस का सही पथ चुनना चाहिए क्योंकि हाल ही में वोडाफोन द्वारा एक रिपोर्ट में बताया गया है की भारत सरकार एक असंवैधानिक (secret wire) तरीके से e -सर्विलांस का प्रयोग कर रही है। भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे अनेक प्रोजेक्ट जैसे Central Monitoring System (CMS), Internet Spy System Network and Traffic Analysis System (NETRA) आदि द्वारा साइबर फॉरेंसिक को बढ़ावा दिया जा रहा है जो कि एक तरफ से अच्छा सुझाव है, लेकिन दूसरी तरफ से ये सारी परियोजना निजता जैसे मानवाधिकार का भी पूरी तरीके से हनन करती है । टेलीग्राफ 1885 अधिनियम के धारा 5 में कार्यपालिका को विवेकाधीन शक्ति दे रखी है जिसका दुरप्रयोग होना स्वाभाविक है।

• भारत सरकार को डिजिटल इंडिया और इ-सेवा के साथ-साथ e-discovery, e-evidence ,साइबर सिक्योरिटी, साइबर फॉरेंसिक, फेक न्यूज़ निवारण हेतु कानूनी प्रावधान बनाने चाहिए । इसके साथ ही साथ साइबर लॉ और टेलीग्राफ लॉ में जरूरी संशोधन कर माननीय सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा हाल ही में दिए गए ऐतिहासिक फैसलों के अनुरूप बनाना चाहिए । साइबर फॉरेंसिक 'तकनीकी' की एक आगामी शाखा है और भारत के तीनो स्तम्भों को इस आगामी शाखा में दक्षता प्राप्त करने की अत्यंत आवश्यकता है। "साइबर क्राइम इन्वेस्टीगेशन" टीम का गठन शहर के हर एक थाने में किया जाना चाहिए और समय-समय पर साइबर क्षेत्र से जुड़े कोर्ट के फैसले और विधेयक से टीम के सदस्यों को विधि संस्थानों जैसे NLUs आदि के माध्यम से विधिवत परिचित करवाया जाना चाहिए। ठीक इसी प्रकार इंजीनियरिंग संस्थान जैसे IITs आदि से संधि कर प्रौद्योगिक जगत में हुई खोज का नवीन विवरण इन टीम के प्रत्येक सदस्यों को देना चाहिए।

• वर्ष 2013 में भारत सरकार ने "नेशनल साइबर सिक्योरिटी पॉलिसी" का अनावरण किया था जिसमे कि प्रौद्दिकि-लीगल सम्बंधित सिद्धांतों का परस्पर मेल दिखता हुआ प्रतीत होता है, जो कि साइबर फॉरेंसिक के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि इस पॉलिसी में नागरिकों की गोपनीयता की सुरक्षा हेतु प्रावधानों की कमी दिखती है। इस "साइबर सिक्योरिटी पॉलिसी" का सम्बन्ध एवं प्रभाव भारत की "ईमेल-पॉलिसी" और "टेलीकॉम सिक्योरिटी पॉलिसी" पर भी पड़ना चाहिए, जो कि आज तक वांछित है।


नोट : ये लेखक के निजी विचार हैं

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