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समझिए उर्दू के कुछ ऐसे शब्द जिनका भारतीय कानून व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान है

Shadab Salim
25 Dec 2020 9:36 AM GMT
समझिए उर्दू के कुछ ऐसे शब्द जिनका भारतीय कानून व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान है
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भारत की न्यायलयीन प्रक्रिया मुगल काल से प्रचलित चली आ रही है। ताज़िराते हिन्द भारत का दंड विधान रहा है। इस दंड विधान के माध्यम से ही मध्य काल में भारत में किए जाने वाले अपराधों के लिए दंडित किया जाता था। लंबी अवधि तक उर्दू भारत के न्यायलयों की भाषा रही है। मुगलकाल में न्यायालय की भाषा उर्दू ही रही है। समय और शासन के साथ भाषा बदल गई परंतु कुछ शब्द सुविधा के अनुसार शेष रह गए।

वर्तमान की हिंदी, हिंदी पट्टी भारतीय न्यायालय में उत्कृष्ट कार्य कर रही है और निरंतर उन्नत हो रही है। उर्दू के कुछ शब्द है जिन्हें न्यायलय और पुलिस द्वारा वर्तमान युग में भी उपयोग किया जा रहा है।

इस आलेख में उर्दू भाषा के कुछ विशेष ऐसे शब्दों का उल्लेख किया जा रहा है जो न्यायलयीन और पुलिस कार्यवाही से जुड़े हुए है। यह शब्द न्यायालय हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण शब्द है तथा अभिलेख पर भी इन शब्दों का उपयोग किया जाता है। अब इन शब्दों का उपयोग किसी विशेष उद्देश्य हेतु नहीं अपितु केवल सुविधा की दृष्टि से किया जा रहा है।

अदालत- अदालत का सामान्य अर्थ न्यायालय है।

गुनाह- अपराध, अंग्रेज़ी भाषा में इसे क्राइम कहा जाता है।

मुकदमा- अभियोजन या वाद को मुकदमा कहा जाता है। आपराधिक मामले में इसे अभियोजन कहा जायेगा तथा सिविल मामले में वाद कहा जाएगा। प्रकरण के लिए भी मुकदमा शब्द उपयोग किया जाता है।

गवाह- साक्षी, जो किसी मामले के संदर्भ में न्यायालय के समक्ष हाज़िर होकर साक्ष्य देतें हैं।

रोजनामचा- पुलिस थाने में एक विशेष रजिस्टर होता है जिसमे अपराधों से संबंधित रोज़ की जानकारियां लिखी जाती है। रोजनामचा का शाब्दिक अर्थ रोज़ किसी तथ्य को लिखना होता है। पुलिस द्वारा किसी भी अपराध से संबंधित जानकारी इस रजिस्टर में आवश्यक रूप से दैनिक अंकित की जाती है।

देहाती नालसी- किसी भी थाना क्षेत्र के अंतर्गत जब कोई अपराध घटित होता है तब उस घटना स्थल पर पहुंच कर अनुसंधान अधिकारी द्वारा प्रथम पत्र तैयार किया जाता है तथा उस अपराध के संबंध में स्पष्ट तथ्यों को लेखबद्ध किया जाता है। उस प्रथम पत्र को देहाती नालसी कहतें है।

खात्मा- जब भी पुलिस द्वारा दंड प्रक्रिया सहिंता 1973 की धारा 154 के अंतर्गत कोई एफआईआर दर्ज की जाती है तो उसे न्यायालय में पेश किया जाता है तथा अंत में उसके संबंध में सहिंता की धारा 173 के अंतर्गत चालान/अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जाता है। चालान जब पेश किया जाता है जब पुलिस को प्रकरण में अपराध के होने के संबंध में साक्ष्य उपलब्ध होते है पर यदि साक्ष्य उपलब्ध नहीं होते है तो इस स्थिति में पुलिस द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 169 के अंतर्गत खात्मा पेश किया जाता है।

खारिजी- जब चालान की फाइनल रिपोर्ट में यह साबित होता है कि रिपोर्ट झूठी है, तो खारिजी हो जाती है। इसमें झूठी रिपोर्ट करने वाले पर भारतीय दंड सहिंता, 1860 की धारा 182 और 211 के तहत प्रकरण दर्ज होता है। भारतीय दंड संहिता की यह धारा मिथ्या साक्ष्य पर दंड का निर्धारण करती है।

हवाले साना- संदर्भित प्रविष्टि इसका प्रयोग रोजनामचा में किया जाता है। जब भी पुलिस किसी कार्यवाही के लिए जाती है, तो उसकी रवानगी डालने को हवाले साना लिखा जाता है। पुलिस को अपनी कार्यवाही की गतिविधियों को लेखबद्ध करना होता है।

माल वाजयाफ्ता- अपराधी से माल जप्त होने को माल वाजयाफ्ता कहा जाता है। किसी भी अपराध में उस अपराध से संबंधित अनेक वस्तुएं जप्त की जाती है, ऐसी जप्ती के अंतर्गत आए माल को माल वाजयाफ्ता कहा जाता है।

मुचलका- बंधपत्र, इसे अंग्रेजी में बांड कहा जाता है। जब आरोपी को किसी प्रकरण में जमानत दी जाती है तो न्यायालय द्वारा ऐसे अपराधी के लिए किसी अन्य व्यक्ति से शपथ पर उस व्यक्ति को पेश करने हेतु बंधपत्र लिया जाता है। ऐसा बंधपत्र केवल घोषणा भी हो सकता है या प्रतिभूति सहित भी हो सकता है।

जमानत- प्रतिभूति, इसे अंग्रेजी में बेल कहा जाता है। यह अत्यंत सामान्य शब्द है। जब भी किसी अपराध में राज्य द्वारा किसी व्यक्ति को अभियोजित किया जाता है तब न्यायालय ऐसे आरोपी को दोषमुक्त या दोषसिद्ध होने तक प्रकरण में विचारण के मध्य जमानत पर रिहा करती है, जमानत का अर्थ दोषमुक्ति नहीं होता है। इस शब्द का उल्लेख दंड प्रक्रिया सहिंता के अध्याय 33 के अंतर्गत किया गया है। सहिंता में इस शब्द के प्रावधानों से संबंधित संपूर्ण अध्याय है।

बरी- दंड प्रक्रिया सहिंता के अंतर्गत दोषमुक्त को बरी कहा जाता है। विचारण के पश्चात अभियोजन यदि प्रकरण को सिद्ध नहीं कर पाता है तो न्यायालय द्वारा दोषमुक्ति का आदेश पारित कर दिया जाता है, ऐसी स्थिति में मुल्ज़िम को बरी कहा जाता है।

हवालाती- ऐसे आरोपी जिन्हें विचाराधीन कारावास में रखा जाता है तथा जिन पर विचारण की कार्यवाही चल रही होती है तथा वह न्यायालय की अभिरक्षा में होतें हैं तथा तब तक अपराध सिद्ध नहीं होता है, अर्थात आरोपी न तो दोषमुक्त होता है और न ही दोषसिद्ध।

कैदी- निरुद्ध किया जाने वाला कोई भी व्यक्ति कैदी कहलाता है।

इश्तिहार- उद्घोषणा, इसे अंग्रेजी में डिक्लेयरेशन कहा जाता है। जब आरोपी फरार हो जाता है तब उसकी संपत्ति के राजसात किये जाने की घोषणा की जाती है तब इस शब्द का प्रयोग राज्य पुलिस द्वारा किया जाता है। सामान्य उर्दू में इश्तिहार का शाब्दिक हिंदी अर्थ विज्ञापन होता है।

तहरीर- न्यायालय की प्रक्रिया में तहरीर से अर्थ पत्र से लगाया जाता है। किसी सम्मन में लिखे गए शब्दों को भी तहरीर कहा जाता है। तहरीर का शाब्दिक अर्थ लेखन है जो किसी प्रारूप में लिखा होता है।

गिरफ्तारी- इसे अंग्रेजी में अरेस्ट कहा जाता है। भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत पुलिस द्वारा गिरफ्तारी से संबंधित संपूर्ण अध्याय दिया गया है तथा गिरफ्तारी के नियमों का विस्तारपूर्वक उल्लेख है।

हिरासत- इसे हिंदी में अभिरक्षा कहा जाता है। सामान्य रूप से पुलिस हिरासत शब्द उपयोग किया जाता है। पुलिस जब किसी प्रकरण में किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करती है तब ऐसा व्यक्ति पुलिस हिरासत में कहलाता है। जब उसे न्यायालय में पेश कर दिया जाता है तब वह न्यायालय की हिरासत में कहा जाता है अर्थात न्यायालय की अभिरक्षा में।

फरियादी- प्रार्थी जिसे अंग्रेजी में कंपलेंटेंट कहा जाता है अर्थात जो न्यायालय के समक्ष फरियाद लेकर जाता है।

मुलज़िम- आरोपी जिसे अंग्रेजी में एक्यूज्ड कहा जाता है। ऐसा व्यक्ति जो किसी अपराध के संबंध में अभियुक्त बनाकर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया है जिस पर अभियोजन चलाया जा रहा है।

मुज़रिम- जब आरोपी विचारण कार्यवाही के अंतर्गत दोषसिद्ध कर दिया जाता है तब वह मुल्ज़िम से मुज़रिम हो जाता है।

इस्तगासा- परिवाद पत्र को इस्तगासा कहा जाता है। सामान्य रूप से पुलिस द्वारा जब अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जाता है तब उसके साथ वह अपना इस्तगासा अर्थात परिवाद भी प्रस्तुत करती है, सिविल प्रकरण में उसे परिवाद तथा आपराधिक मामले में इस्तगासा कहा जाता है। यह संपूर्ण प्रकरण का सारगर्भित उल्लेख होता है। इस पत्र में अभियोजन पक्ष द्वारा अपने समस्त तथ्य रख दिए जातें हैं।

मुल्तवी- कोर्ट की किसी कार्यवाही को किसी दिन स्थगित करके किसी अन्य दिवस पर रख दिया जाना।

जिरह- इसका अर्थ बहस होता है परंतु प्रति परीक्षण हेतु भी जिरह को उपयोग किया जाता है।

इजरा- न्यायालय में कार्यपालन के लिए इजरा का उपयोग किया जाता है या फिर आरंभ के लिए भी इजरा उपयोग किया जाता है। उर्दू में इजरा का उपयोग विमोचन शब्द के लिए किया जाता है।

तलवी- सूचना प्रेषित को तलवी कहा जाता है। सिविल प्रकरण में किसी वाद के आने पर पक्षकारों को उपस्थित होने हेतु सम्मन भेजें जातें है या फिर साक्षी को बुलाने हेतु सम्मन प्रेषित किये जातें हैं, ऐसी नोटिस की न्यायालय की प्रक्रिया को तलवी कहा जाता है। न्यायालय में इसका अलग से विभाग होता है जिसे तलवाना कहा जाता है।

प्यादा- सूचना कर्मचारी जो किसी प्रकार का सम्मन या नोटिस लेकर जाता है।

मुंशी- पुलिस थाने और अधिवक्ताओ के ऐसे अधीनस्थ जो कागज़ी खानापूर्ति तथा दस्तावेज के आदान प्रदान के कार्य करतें हैं। इन्हें क्लर्क कहा जाता है।

हाज़िर- उपस्थित, किसी व्यक्ति को पेश करने हेतु न्यायालय के समक्ष उपस्थित या हाज़िर कहा जाता है।

मुंसिफ- न्यायधीश या मजिस्ट्रेट।

दीवानी - सिविल।

आपराधिक- आपराधिक।

जाहिर सूचना- खुली सूचना जिसे न्यायालय या किसी अधिवक्ता द्वारा किसी अखबार में प्रकाशित किया जाता है या सार्वजनिक स्थान पर चिपकाया जाता है। ऐसी सूचना किसी प्रकरण या व्यक्ति से संबंधित होती है।

दरख्वास्त- आवेदन या निवेदन को दरख्वास्त कहा जाता है। जब किसी कार्य जो न्यायालय के विवेकाधिकार के अंतर्गत है करने हेतु कहा जाता है तब उसके साथ दरख्वास्त शब्द उपयोग किया जाता है।

पतारसी- अपराध की विवेचना में इस शब्द का उपयोग होता है। इसका मतलब है कि अपराध को ज्ञात करने के प्रयास जारी हैं। चालान पेश करने के पूर्व की प्रक्रिया को पतारसी कहा जाता है।

वकील- वकील उर्दू तथा फारसी के मेल से आया शब्द है। वकील का सामान्य अर्थ किसी व्यक्ति की ओर से पक्ष रखने वाला व्यक्ति होता है। जब भारत में ब्रिटिश शासन नहीं था तथा राजाओं का शासन हुआ करता था तब न्याय व्यवस्था का थोड़ा अलग प्रारूप था। राजा का मुख्य मंत्री मुल्ज़िम पर अभियोजन पक्ष रखता था तथा नगर का विद्वान व्यक्ति अभियुक्त का पक्ष न्यायालय के समक्ष रखता था। संभ्रांत और शिक्षित लोग इस प्रकार का वकील का काम किया करते थें।

समय के साथ वकील का अर्थ बदल गया परंतु मूल दृश्य वही है। अधिवक्ता अधिनियम के पूर्व लीगल प्रेक्टिशनर एक्ट काम करता था तथा उसके पहले भी अन्य नियम थे। भारत में वकीलों से संबंधित नियम लगभग तीन सौ वर्ष प्राचीन नियम है। ब्रिटिश शासन के समय वकील का प्रारूप बदल गया परंतु ब्रिटेन में भी संभ्रांत घरों के लोग ही सेवाभाव से वकील का कार्य किया करते थे।

वर्तमान में संपूर्ण भारत में अधिवक्ता अधिनियम, 1961 प्रचलित है। इस अधिनियम के अंतर्गत अधिवक्ता नामावली में अधिवक्ता के तौर पर दर्ज़ व्यक्ति को अधिवक्ता कहा जाता है। आज भी सामान्य भाव बोध में अधिवक्ता के लिए वकील शब्द ही उच्चारित किया जाता है।

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