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सलाम बॉम्बे : सामूहिक हिंसा के दौर में चाइल्ड इन नीड ऑफ़ केयर एंड प्रोटेक्शन की कहानी

सुरभि करवा
22 Feb 2020 5:45 AM GMT
सलाम बॉम्बे :  सामूहिक हिंसा के दौर में चाइल्ड इन नीड ऑफ़ केयर एंड प्रोटेक्शन की कहानी
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"क्यों एक व्यक्ति जिसने एक अमानवीय जघन्य अपराध किया है, उसे एक वयस्क व्यक्ति से कम सजा दी जाये, मात्र इसलिए कि वह अभी तक 18 साल का नहीं हुआ है?"

यह सवाल मैंने पहली बार लॉ स्कूल के दौरान जेजे एक्ट (जुवेनाइल जस्टिस एक्ट) पर एक ट्रेनिंग प्रोग्राम में एक पब्लिक प्रासिक्यूटर द्वारा सुना। तब से यह सवाल मैंने बार-बार सुना है। क्यों 18 साल से कम उम्र के बाल अपराधियों को वयस्कों की तरह न माना जाए और उसी मुताबिक़ सजा न दी जाए?

ये आवाज बार-बार उठी है और इसीलिए सरकार ने भी जेजे एक्ट की मूल भावना को समझे बिना कानून में 2015 में परिवर्तन किये और कुछ स्थितियों में 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति का वयस्क की तरह ट्रायल को कानूनी मान्यता दी है।

बाल अपराधियों के सन्दर्भ में जिस जिम्मेदारी और जवाबदेही की उम्मीद कानून से की जाती है, उसी जवाबदेही और जिम्मेदारी की उम्मीद देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों (चाइल्ड इन नीड ऑफ़ केयर एंड प्रोटेक्शन) के सन्दर्भ में बराबरी से नहीं की जाती। हाल ही में मृत्यु दंड पर एक चर्चा में डॉक्टर उषा रामानाथन ने भी यही सवाल उठाया कि स्टेट का हस्तक्षेप तब क्यों होता है, जब अपराधी किशोर है या नहीं, इस बात की जांच करनी होती है। इससे पहले क्यों स्टेट का हस्तक्षेप बमुश्किल नज़र आता है।

चाइल्ड इन नीड ऑफ़ केयर एंड प्रोटेक्शन हम सब के लिए एक पहचाना हुआ चेहरा है। सड़कों, बसों, चौराहों, ट्रेनों में - लेकिन शायद इसी वजह से हम उनके शोषण को नहीं समझ पाते। कानून की बहस में भी चाइल्ड इन नीड ऑफ़ केयर एंड प्रोटेक्शन एक हाशिये पर ढ़केला जा रहा है।

इस सन्दर्भ में आयी मीरा नायर की फिल्म सलाम बॉम्बे चाइल्ड इन नीड ऑफ़ केयर एंड प्रोटेक्शन के अधिकारों के संरक्षण में कानून की असफलता पर एक मुख्य टिप्पणी है। सलाम बॉम्बे कृष्णा उर्फ़ चाय-पाव की कहानी है। पिता की कम उम्र में मृत्यु के बाद चाय-पाव को उसकी मां एक सर्कस मंडली में छोड़ देती है।

जल्द ही कृष्णा स्वयं को बॉम्बे की सडकों पर पाता है जहां वह एक चाय के ठेले पर काम करता है, सड़क पर सोता है और अपना गुजारा करने की कोशिश करता है। कृष्णा अपनी मां और परिवार को याद करता है और घर लौट जाना चाहता है, लेकिन वह घर से इतना दूर है कि यहां लोग उसे कृष्णा के नाम से जानते भी नहीं। वह चाय- पाव है, एक लड़का जो चाय और पाव बेचता है। उसके नाम की तरह, उसकी पहचान और उसके बाल-अधिकार भी भुला दिए गए हैं।

रघुवीर यादव (चिल्लम), नाना पाटेकर (बाबा), कृष्णा (शफ़ीक़ सईद), हंसा विट्ठल (मंजू), चंदा शर्मा ( साल) फिल्म के मुख्य पात्र हैं।

चिल्ड्रन ऑफ़ स्ट्रीट

मीरा नायर ने यह फिल्म बॉम्बे की सड़कों पर रहने वाले बच्चों को समर्पित की है लेकिन यह फिल्म सड़क पर रहने वाले बच्चों की सर्वव्यापी कहानी है। स्ट्रीट चिल्ड्रन हमारे समाज के सबसे असुरक्षित, संवेदनशील समूह हैं। शहरी गरीबी के आंकड़ों के मुताबिक़ 90% से अधिक बच्चे जो सडकों पर रहते हैं, किसी न किसी तरह की हिंसा का शिकार होते हैं। गरीबी, बाल श्रम, ड्रग एब्यूज आदि कई कारण मिलकर शोषण का एक पेचीदा सिस्टम बना देते हैं।

फिल्म में कृष्णा, बाल श्रम में झोंक दिया गया है। वह चाय के ठेले पर काम करता है, मुर्गियों के बंद पिजरें साफ़ करता है, शादियों में वेटर का काम करता है। चिल्लम ड्रग एडिक्शन का शिकार है और एक लड़की है, जिसे वेश्यावृति में बेच दिया गया है। पूरी फिल्म में हमें इस लड़की का नाम पता नहीं चलता। उसकी उम्र और वर्जिनिटी के आधार पर उसे 16 साल कहा जाता है। (इस लेख में मैं उस लड़की का ज़िक्र 'अ' कह कर करूंगी। किसी व्यक्ति को उम्र और वर्जिनिटी के आधार पर 16 साल कहना अमानवीय है।)

फिल्म चाइल्ड इन नीड ऑफ़ केयर एंड प्रोटेक्शन के सन्दर्भ में उपस्थित सभी कानून पर सवाल उठाती है। गरीबी को व्यापक सामाजिक और आर्थिक मुद्दा मानने के बजाए कानून गरीबी को अपराध बनाता है और इस कानून में कई गरीब स्ट्रीट चिल्ड्रन भी अपराधी की श्रेणी में आ जाते हैं।

ड्रग एब्यूज के मुद्दे को पब्लिक हेल्थ का मुद्दा मानकर एक पुनर्वास की एप्रोच रखने के बजाये कानून उसे भी बलपूर्वक अपराध के श्रेणी में रखता है। बाल श्रम पर कानून बेहद छोटे हिस्से को बाल श्रम मानते हैं और नियमन और खात्मे की बीच उलझे हुए महसूस होते हैं। कानून की इस बहुमुखी असफलता ने स्ट्रीट चिल्ड्रन को और अधिक कमजोर किया है।

चाइल्ड केयर संस्थाओं के हालात

कृष्णा और मंजू को देर रात एक शादी में वेटर का काम करके लौटते हैं और रास्ते में पुलिस उठा लेती है। फिल्म में यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि ये दोनों बाल अपराधी की श्रेणी में ले जाए गए हैं या चाइल्ड इन नीड ऑफ़ केयर एंड प्रोटेक्शन के तौर पर। चाहे दोनों में से कोई भी स्थिति हो, कृष्णा उस संस्था को जेल सा पाता है, उसे बताया जाता है कि कोर्ट में उसकी तारीख महीने बाद है। अंतत: कृष्णा वहां से भाग जाता है।

दूसरी ओर मंजू की कस्टडी उसकी मां को इस आधार पर नहीं दी जाती है कि वह एक सेक्स वर्कर है। मंजू की मां के उससे मिलने और उसे घर वापस लाने के सभी प्रयास असफल हो जाते हैं। उसे बताया जाता है कि मंजू के 18 साल की हो जाने तक वह सरकारी संस्था में रहेगी, घर नहीं लौटेगी। मंजू की मां सवाल करती है कि सरकार मां कैसे हो सकती है? मंजू की मां का यह सवाल जेजे एक्ट के सम्पूर्ण संस्थागत ढांचे पर सवाल उठाता है।

स्ट्रीट चिल्ड्रन के मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी अधिकार

आत्महत्या की प्रवृति, ड्रग एब्यूज, नशा आदि स्ट्रीट चिल्ड्रन के गिरते मानसिक स्वास्थ्य के कुछ उदाहरण मात्र हैं। हर जगह से धुत्कार, डांट, परिवार का न होना, जिन्दा रहने के लिए हर दिन का संघर्ष इन बच्चों को अकेलापन, डिप्रेशन, भय, आत्महत्या आदि की और ढकेलता है। फिल्म में चिल्लम आत्महत्या करना चाहता है। कृष्णा और 'अ' भी आत्महत्या की योजना बनाते हैं। फिल्म स्ट्रीट चिल्ड्रन के मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी अधिकारों पर गहरा प्रकाश डालती है।

बाल अपराध की ओर ?

फिल्म चाइल्ड इन नीड ऑफ़ केयर एंड प्रोटेक्शन से चाइल्ड इन कनफ्लिक्ट विथ लॉ की एक संवेदनशील और पेचीदा कहानी बताती है। छोटी-मोटी चोरी से लेकर कृष्णा द्वारा बाबा की हत्या किये जाने की कहानी और उसके मनोवैज्ञानिक कारणों के फिल्म में सूक्ष्म चित्रण है।

कृष्णा एक ऐसा किशोर जो घर से दूर है, घर को याद करता है, वह चिल्लम और 'अ' से मित्रता करता है और उनकी हर कदम पर मदद करने को तैयार रहता है। चिल्लम की दवाई के लिए कृष्णा पैसे उपलब्ध करवाता है, उसे खिलाता है, उसका ख्याल रखता है. 'अ' के लिए चिल्लम बिस्किट, चाय आदि लाता है, उससे वहां से दूर भागने में मदद करने की कोशिश करता है, लेकिन वह दोनों को ही खो देता है।

कृष्णा की नज़र में बाबा चिल्लम और 'अ' के दुखों के लिए जिम्मेदार है। वह बाबा ही था जिसने चिल्लम को ड्रग एडिक्शन में लगाया और वह बाबा ही था जिसने 'अ' वेश्यावृति में ढकेला। अंतत: चिल्लम बाबा की हत्या कर देता है।

यही वह सबसे बड़ा सवाल है जिसके साथ यह फिल्म हमें छोड़ती है- एक समाज के तौर पर हमारा कृष्णा के प्रति क्या रवैया होना चाहिए? 'Collective conscience' के नाम पर क्या हमें कठिन से कठिन सजा, मृत्य दंड मांगना चाहिए या कृष्णा के प्रति हमारे 'collective failure' को स्वीकार करना चाहिए?

हर वह बच्चा जो बाल अपराधी है, एक समय पर चाइल्ड इन नीड और केयर एंड पप्रोटेक्शन रहा होगा पर जिसे हमारे कानून ने नज़रअंदाज़ कर दिया।

रिवेंज और रेट्रिब्यूशन आधारित हमारी तथाकथित 'collective conscience' हमे और हमारे लीगल सिस्टम को किस दिशा में ले जा रहा है- यही यह फिल्म हमें सोचने पर मजबूर करती है।

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