Begin typing your search above and press return to search.
स्तंभ

आरटीआई की धारा-2(h) के अंतर्गत लोक प्राधिकारी : एक अवलोकन

राकेश मिश्रा
7 Dec 2021 12:14 PM GMT
आरटीआई की धारा-2(h) के अंतर्गत लोक प्राधिकारी : एक अवलोकन
x

जीवन कहां है, हमने जीने में खो दिया ?

प्रज्ञा कहां है, हमने ज्ञान में खो दिया ?

ज्ञान कहां है, हमने सूचना में खो दिया ?

साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता थामस स्टर्न्स एलियट के इन्हीं पंक्तियों को आगे बढ़ाते हुए न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर ने लिखा :

सूचना कहां है, हमने दमन में खो दिया ?

कहने का तात्पर्य यह है कि थोड़ी सी सूचना से प्रज्ञा नहीं आ सकती। सूचना तो एक साधन है, साध्य तो जीवन है अत: सूचना का निर्विघ्न रूप से प्रसारित होना आवश्यक है। सूचना, ज्ञान का आधार है, जो विचारों को जगाता है और बिना विचार के अभिव्यक्ति संभव नहीं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आज के लोकतांत्रिक देशों का गतिमान मुद्दा है।

अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थॉमस जैफरसन के अनुसार,

"सूचना लोकतंत्र की मुद्रा होती है एवं किसी भी जीवंत सभ्य समाज के उद्भव और विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।"

अतः सूचना को लोकतांत्रिक समाज के लिए ऑक्सीजन की संज्ञा दी जा सकती है। भारतीय लोकतंत्र को मज़बूत करने और शासन में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से भारतीय संसद ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 लागू किया।

सूचना का अधिकार अधिनियम लोक सूचना प्राधिकारी को अधिनियम के क्रियान्वयन की धूरी बनाते हुए, उसके पास उपलब्ध सूचना तक पहुँच का अधिकार प्रदान करता है। यह अधिनियम केवल लोक प्राधिकारी पर लागू होता है इसलिए लोक प्राधिकारी की अवधारणा को समझना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 2(h) के अनुसार :

"लोक प्राधिकारी" से, –

(a) संविधान द्वारा या उसके अधीन ;

(b) संसद द्वारा बनाई गई किसी अन्य विधि द्वारा ;

(c) राज्य विधान-मंडल द्वारा बनाई गई किसी अन्य विधि द्वारा ;

(d) समुचित सरकार द्वारा जारी की गई अधिसूचना या किये गए आदेश द्वारा, स्थापित या गठित कोई प्राधिकारी या निकाय या स्वायत सरकारी संस्था अभिप्रेत है, और इसके अंतर्गत, –

(i) कोई ऐसा निकाय है जो समुचित सरकार के स्वामित्वाधीन, नियंत्रणाधीन, या उसके द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध कराई गई निधियों द्वारा सारभूत रूप से वित्तपोषित है ;

(ii) कोई ऐसा गैर सरकारी संगठन है जो समुचित सरकार द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध कराई गई निधियों द्वारा सारभूत रूप से वित्तपोषित है ;

आरटीआई अधिनियम के अधिनियमित होने से पहले राज्य को संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत परिभाषित किया गया,जो कि भाग तीन (मौलिक अधिकार ) का हिस्सा है। मौलिक अधिकारों की प्रयोज्यता के लिए राज्य को परिभाषित करना आवश्यक था, जिससे अनुच्छेद 32 के तहत उच्चतम न्यायालय का क्षेत्राधिकार तय किया जा सके। अब मुख्य प्रश्न यह उठता है कि क्या संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य' और आरटीआई अधिनियम के तहत परिभाषित 'लोक प्राधिकारी' समानार्थी है ?

प्रदीप कुमार विश्वास बनाम् इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ केमिकल बायोलोजी (सीएसआईआर केस) के मामले में सात न्यायाधीशों की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 12 के अंतर्गत राज्य की परिभाषा कैसे तय हो का अभिनिश्चय किया ।

यह अभिनिर्धारित किया गया कि प्रत्येक मामले में यह सवाल किया जाना चाहिए कि क्या संचयी तथ्यों के प्रकाश में, यह स्थापित होता है कि निकाय :

• आर्थिक रूप से

• कार्यात्मक रूप से

• प्रशासनिक रूप से

सरकार के नियंत्रण में या उसके प्रभुत्व में है | इस तरह का नियंत्रण प्रश्नोत्तर निकाय के विषय में होना चाहिए और व्यापक होना चाहिएं। यदि ऐसा पाया जाता है तो निकाय अनुच्छेद 12 के अंतर्गत राज्य की श्रेणी में आएगा । दूसरी ओर जब नियंत्रण केवल विनियामक है, चाहे वह कानून के तहत हो या अन्यथा, तब निकाय राज्य के अंतर्गत नहीं आएगा।

माननीय केरल उच्च न्यायालय ने एम॰ पी॰ वर्गीस बनाम् महात्मा गाँधी यूनिवर्सिटी मामले में अभिनिर्धारित किया कि आरटीआई अधिनियम की प्रयोज्यता भारत के संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत राज्य की परिभाषा के अंतर्गत आने वाले निकायों तक ही सीमित नहीं है।

लोक प्राधिकारी की परिभाषा अनुच्छेद 12 की तुलना में अत्यंत व्यापक अर्थ लिए हुए हैं। अनुच्छेद 12 के तहत राज्य की परिभाषा मुख्य रूप से अदालतों के माध्यम से मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के संबंध में है जबकि आरटीआई अधिनियम का उद्देश्य भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 में तहत मान्यता प्राप्त सूचना के अधिकार को प्रभावी बनाने हेतु युक्तियुक्त ढांचा प्रदान करना है।

कृषक भारती कोऑपरेटिव लिमिटेड बनाम रमेशचन्द्र के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि एक निकाय जो न तो अनुच्छेद 12 के प्रयोजनों के लिए राज्य है और न ही संविधान के अनुच्छेद 226 के प्रयोजन के लिए सार्वजनिक कार्यों का निर्वहन करता है, वह भी आरटीआई अधिनियम की धारा 2(h)(d)(i) के अंतर्गत लोक प्राधिकरण के अर्थ में हो सकता है।

विचारण करने योग्य यह बात भी है कि जैसे अनुच्छेद 12 के अंतर्गत राज्य शब्द के निर्वचन हेतु प्रमुख कसौटियों में गहन और व्यापक नियंत्रण को देखा जाता है जबकि आरटीआई अधिनियम के संदर्भ में ऐसी कोई योग्यता नहीं है।

कहने का तात्पर्य यह है कि गहन और व्यापक शब्द के स्थान पर नियंत्रित शब्द प्रयुक्त है। व्यापकता के अर्थ को इन उदाहरणों से भी समझा जा सकता है कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ऑफ इंडिया और इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन 'राज्य' की परिभाषा में नहीं आते जबकि उन्हें 'लोक प्राधिकारी' के अंतर्गत माना जाता है।

थलप्पलम एस. को-आपरेटिव बैंक लिमिटेड और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य वाले मामले में उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह था कि क्या केरल को-आपरेटिव सोसायटीज़ ऐक्ट के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई सहकारी सोसायटी सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 2(h) के अधीन "लोक प्राधिकारी" की परिभाषा के अन्तर्गत आती है और क्या सूचना का अधिकार अधिनियम के अधीन किसी नागरिक द्वारा मांगी सूचना को प्रदान करने के लिए कर्तव्याबद्ध है।

उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों पर विचार करने के पश्चात् यह अभिनिर्धारित किया कि ऐसी सोसायटियां लोक प्राधिकारी नहीं हैं और इसलिए किसी नागरिक द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम के अधीन मांगी गई सूचना प्रदान करने के लिए विधित आबद्ध नहीं हैं। तथापि, राज्य सूचना आयुक्त इस बारे में परीक्षा कर सकता है और यह पता लगा सकता है कि क्या प्रश्नगत सोसायटी नियंत्रण की परीक्षा को पूरा करती है अथवा क्या राज्य सरकार द्वारा निधियां प्रदत्त की गई हैं ।

यह स्पष्ट है कि "लोक प्राधिकारी" शब्द को विस्तृत और व्यापक अर्थ दिया गया है | यह न केवल उन निकायों को शामिल करता है, जो समुचित सरकार द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वामित्वाधीन, नियंत्रणाधीन या सारभूत रूप से वित्तपोषित है, बल्कि यह गैर-सरकारी संगठन को भी शामिल करता है, जो समुचित सरकार द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध कराई गई निधियों द्वारा सारभूत रूप से वित्त पोषित है |

केरल उच्च न्यायालय ने सटीक अवलोकन करते हुए कहा है कि धारा 2(h) के लोक प्राधिकरण की व्याख्या के लिए धारा 2(a) में प्रयुक्त समुचित सरकार की परिभाषा को कुंजी के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

इस हितकारी विधान को लागू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यह था कि नागरिकों को उन संगठनों के संबंध में जानकारी उपलब्ध कराई जाए, जो समुचित सार्वजनिक धन का उपयोग करके लाभ कमाते हैं| यह विधान जवाबदेहिता,पारदर्शिता और खुलापन सुनिश्चित करता है ताकि नागरिक पूछ सके, जान सके और सूचना प्राप्त कर सके कि सार्वजनिक धन का उपयोग कैसे और कहाँ किया जा रहा है। यहां तक कि निजी संगठन जो सरकार से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समुचित धन का लाभ उठा रहे हैं, अधिनियम के तहत लोक प्राधिकारी की परिभाषा के अंतर्गत आते हैं।

निजी निकाय सीधे अधिनियम के दायरे में नहीं हैं। तथापि ऐसी जानकारी जिसे कोई लोक प्राधिकारी तत्समय लागू किसी अन्य कानून के तहत प्राप्त कर सकता है, उसे प्राप्त करने के लिए नागरिक भी अनुरोध कर सकते हैं। केंद्रीय सूचना आयोग ने आलोकित किया कि निजी सार्वजनिक उपयोगिता की कंपनियां भी आरटीआई अधिनियम के दायरे में आती हैं।

"एक कंपनी जिसे समुचित सरकार द्वारा जारी अधिसूचना या आदेश द्वारा मान्यता प्राप्त या स्थापित किया गया है, सूचना का अधिकार अधिनियम , 2005 की धारा 2(h) के अंतर्गत एक लोक प्राधिकरण है।"

अत: अधिनियम के प्रावधानों को उसके उद्देश्यों के अनुरूप सुसंगत रूप से पढ़ा जाना चाहिए और इसे सुनिश्चित करने के लिए व्यापक अर्थ दिया जाना चाहिए।

भोपाल गैस त्रासदी जैसी घटनाओं ने लोगों को बता दिया है कि कैसे अपने आस-पास के वातावरण की जानकारी के अभाव में मानव जीवन बर्बाद हो सकता है। यह अधिनियम सरकार को एक उपयुक्त मौका प्रदान करता है, जो कॉर्पोरेट के साथ-साथ अन्य गैर-सरकारी निकायों पर जिम्मेदारियाँ डाल सकता है कि वह जनता को ऐसी जानकारी प्रदान करें, जो उनके मानवीय जीवन से जुड़ी हैं।

ऋग्वेद में भी कहा गया है कि :

"आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत:"

अर्थात "हर तरफ से महान विचारों को हमारे पास आने दो।" इसी प्रकार न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर के शब्दों में "जो कुछ भी हम सभी से जुड़ा हैं, उसे हम सभी द्वारा तय किया जाना चाहिए।"

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद-12 के तहत परिभाषित 'राज्य' और आरटीआई अधिनियम की धारा-2(h) के तहत परिभाषित 'लोक प्राधिकारी' समानार्थी नहीं हैं। 'लोक प्राधिकारी' शब्द अधिनियम के लक्ष्य और उद्देश्यो को पूरा करने हेतु विस्तृत अर्थ लिए हुए है। अतः इसकी व्याख्या कठोर नहीं बल्कि उदार रूप में करनी चाहिए।

राकेश मिश्रा

(एलएलबी छात्र, तृतीय वर्ष)

कैंपस लॉ सेंटर, दिल्ली विश्वविद्यालय

Next Story