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क्या भारत में निरक्षरों को वास्तव में सूचना का अधिकार उपलब्ध है?

Aseer Jamal
9 Nov 2021 1:27 PM GMT
क्या भारत में निरक्षरों को वास्तव में सूचना का अधिकार उपलब्ध है?
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अक्सर आप ऐसा समाचार पढ़ते हैं, जिसमें एक कार्यकर्ता आरटीआई (Right To Information) आवेदन दाखिल करके लोगों की मदद करता है, हालाँकि आपने इसे कई बार पढ़ा है, लेकिन क्या आपके सामने कभी एक प्रश्न खड़ा हुआ - यदि सूचना का अधिकार एक मौलिक अधिकार (Fundamental Right) है तो निरक्षर स्वयं इस अधिकार का इस्तेमाल क्यों नहीं कर सकते? इस लेख में, मैं उन सभी प्रासंगिक (Relevant) प्रावधानों का विश्लेषण (Analysis) करूंगा जो निरक्षरों के सूचना के अधिकार की सुविधा प्रदान करते हैं।

हालांकि यह कहा जाता है कि आरटीआई गरीबों तक पहुंचने में विफल रहा है, अधिकांश मौजूदा साहित्य या रिसर्च इस कानून के बारे में जागरूकता की कमी को प्राथमिक कारण के रूप में दोषी ठहराते हैं, हालांकि मेरा मानना है कि कानून ही इनके हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त उपाय प्रदान नहीं करता है। अनपढ़ लोग इस देश की बड़ी आबादी का गठन करते हैं, इसके अलावा ये वे लोग हैं जो भ्रष्ट प्रथाओं से बुरी तरह प्रभावित हैं और नीतिगत निर्णयों का इन पर ही ज़्यादा प्रभाव पड़ता है क्योंकि यह आमतौर पर इन लोगों के अधिकारों की पूरी तरह अवहेलना करके होता है। इसलिए, ऐसे कानून के लिए यह अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि पर्याप्त सुरक्षा प्रदान की जाए, हालाँकि हम देखते हैं कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के मामले में बिलकुल विपरीत स्थिति है।

सूचना का अधिकार

आरटीआई अधिनियम (Right To Information Act) को भारत में क्रांतिकारी कानून का दर्जा प्राप्त है। यह अधिनियम भारत के प्रत्येक नागरिक को सूचना प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करता है। एक नागरिक जो कोई भी "सूचना" प्राप्त करना चाहता है, वह संबंधित पीआईओ (Public Information Officer) को आवेदन शुल्क के साथ लिखित रूप में अनुरोध प्रस्तुत कर सकता है। अधिनियम अपीलीय तंत्र के दो स्तर प्रदान करता है - पहला अपीलीय मंच एक ही विभाग में पीआईओ के रैंक से एक वरिष्ठ अधिकारी और दूसरा केंद्रीय/राज्य सूचना आयोग है। यदि किसी दावेदार को 30 दिनों के भीतर जानकारी प्रदान नहीं की जाती है या वह दी गई जानकारी से संतुष्ट नहीं है, तो वह प्रथम अपीलीय प्राधिकारी को अपील कर सकता है अगर वह फिर भी संतुष्ट नहीं है तो केंद्रीय सूचना आयोग/राज्य सूचना आयोग के पास दूसरी अपील दायर कर सकता है।

जब अपील या शिकायत पर निर्णय लेते समय सूचना आयोग की यह राय हो कि पीआईओ ने बिना किसी उचित कारण के सूचना का अनुरोध प्राप्त करने से इनकार कर दिया है या निर्दिष्ट (Specified) समय के भीतर प्रस्तुत नहीं किया है या सूचना के लिए अनुरोध को अस्वीकार कर दिया है या जानबूझकर अपूर्ण (Incomplete), या भ्रामक (Misleading) या विकृत (Distorted ) या गलत जानकारी दिया है, यह आवेदन प्राप्त होने तक या जानकारी प्रस्तुत किए जाने तक प्रत्येक दिन 250 रुपये का जुर्माना लगाएगा, इस शर्त के अधीन कि इस तरह के दंड की कुल राशि 25000/- रुपये से अधिक नहीं होगी।

सूचना का अधिकार अधिनियम में निरक्षरों के लिए निम्नलिखित प्रावधान है:

सूचना प्राप्त करने के लिए अनुरोध [धारा 6(1)] - कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन कोई सूचना प्राप्त करना चाहता है, लिखित में या इलेक्ट्रॉनिक युक्ति के माध्यम से अंग्रेज़ी या हिंदी में या उस क्षेत्र की राजभाषा में आवेदन लोक सूचना अधिकारी को दे सकता है परन्तु जहां ऐसे अनुरोध लिखित रूप में नहीं दर्ज किये जा सकते हैं, केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसा भी मामला हो, अनुरोध को लेखबद्ध करने के लिए मौखिक रूप में अनुरोध करने वाले व्यक्ति को सभी उचित सहायता प्रदान करेगा।

विश्लेषण

एक आरटीआई आवेदन ऑनलाइन, डाक द्वारा या व्यक्तिगत रूप से (In Person) दायर किया जा सकता है। पहले मोड के लिए डिजिटल साक्षरता की आवश्यकता होती है, और दूसरे मोड में औपचारिक साक्षरता की आवश्यकता होती है, और इन दोनों की कमी के कारण निरक्षर के पास व्यक्तिगत रूप से दाखिल करने का एकमात्र विकल्प बचता है।

अधिनियम द्वारा प्रदान किया गया एकमात्र उपाय यह है कि अनुरोध मौखिक रूप से दायर किया जा सकता है और संबंधित पीआईओ अनुरोध को मौखिक रूप से स्वीकार करेगा और इसे लिखित रूप में दर्ज कर देगा। इस प्रकार कानून निरक्षरों की सहायता करने के लिए पीआईओ पर दायित्व बनाता है और चूंकि निरक्षर लोग केवल अपनी समस्याओं को जानते हैं और आरटीआई आवेदन दाखिल करना नहीं जानते, इस प्रावधान की दक्षता की जांच करना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है चूँकि केवल सहायता से इनकार करना उनके सूचना के अधिकार का उल्लंघन होगा।

जबकि अधिकांश अध्ययन या मौजूदा साहित्य कहता है कि पीआईओ द्वारा यह सहायता उपलब्ध नहीं है, फिर भी अगर यह मान लिया जाये कि ऐसी सहायता प्रदान की जाती है तो ऐसी कई बाधाएं हैं जो इस अधिकार को भ्रामक (Illusory) बनाती हैं।

सबसे बड़ी कठिनाई संबंधित पीआईओ को जानना है। हालाँकि एक्ट कहता है कि यदि आवेदन ग़लत पीआईओ को दिया गया है तो उस पीआईओ को सम्बंधित (Concerned) पीआईओ को 5 दिनों के भीतर RTI आवेदन को स्थान्तरित करना चाहिए लेकिन आवेदन के हस्तांतरण (Transfer) का उपाय निरक्षरों की मदद नहीं करेगा क्योंकि आवेदन को स्थानांतरित करने के लिए पीआईओ का दायित्व केवल तभी उत्पन्न होता है जब पीआईओ को उचित (Proper) आवेदन दिया गया हो, और इस तरह यह निरक्षरों का यह अधिकार पूरी तरह से पीआईओ की दया पर छोड़ दिया गया है।

दूसरी कठिनाई यह है कि इस तरह की मैनुअल फाइलिंग इस अधिकार को समय और संसाधनों से प्रतिबंधित करती है क्योंकि उनमें से अधिकांश के लिए समय की हानि आजीविका के नुकसान के बराबर होती है। यह प्रतिबंध उस स्थिति में और बढ़ जाता है जब केंद्रीय लोक प्राधिकरणों (Central Public Authority) को अनुरोध दायर करना पड़ता है, जिनमें से अधिकांश दिल्ली में स्थित हैं। हालांकि केंद्र सरकार डाकघरों के माध्यम से आरटीआई आवेदन प्राप्त करती है लेकिन ऐसे नामित डाकघरों की संख्या काफी कम है, सभी डाकघरों में यह सुविधा नहीं है।

फिर भी, केवल यह तथ्य कि एक आवेदक को सूचना का अनुरोध करने के लिए संबंधित लोक प्राधिकरण से बार बार व्यक्तिगत रूप से संपर्क करना पड़ता है, इस तरह का अक्षम तंत्र सूचना के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।

और यदि हम अध्ययनों के निष्कर्षों को स्वीकार करते हैं कि ऐसी सहायता उपलब्ध नहीं है, तो उस स्थिति में आवेदक के लिए किस प्रकार का उपाय उपलब्ध है? अपील करने का अधिकार तो उसको उपलब्ध नहीं है क्योंकि इनकार या निर्णय के लिए एक आदेश होना चाहिए और यह बहुत ही काल्पनिक और हास्यपूर्ण बात होगी कि जिस पीआईओ ने मौखिक आवेदन को लेखबद्ध करने में सहायता करने से इनकार कर दिया था, वह लिखित रूप में ऐसे इनकार करने के लिए अपना कारण आवेदक को देगा। आवेदक के लिए उपलब्ध एकमात्र उपाय केंद्रीय सूचना आयोग/राज्य सूचना आयोग को शिकायत दर्ज करना है। हालाँकि, शिकायतों की सुनवाई की प्रक्रिया,शिकायत के निपटारे में लगने वाला समय, इस उपाय को असंभव बनाती है।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई अनपढ़ कितनी बार कार्यालय का दौरा करता है और सूचना का अनुरोध करता है, कानून के तहत ऐसे अनुरोधों पर तब तक विचार नहीं किया जाएगा जब तक कि पीआईओ इसे लिखित रूप में दर्ज करने में सहायता नहीं करता है। यह तब और खतरनाक हो जाता है जब कोई अनपढ़ व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित जानकारी मांग रहा हो।

इसलिए पीआईओ द्वारा सहायता से इनकार करने की स्थिति में कानून के तहत कुशल (Effective) तंत्र (Mechanism) की कमी निरक्षरों के सूचना के इस मौलिक अधिकार का हनन करती है।

सुप्रीम कोर्ट के कुछ महत्वपूर्ण फैसले

स्टेट ऑफ़ उत्तर प्रदेश बनाम राज नारायण में शीर्ष अदालत ने माना कि इस देश के लोगों को हर सार्वजनिक कार्य, सब कुछ, जो सार्वजनिक रूप से उनके लोक पदाधिकारियों द्वारा किया जाता है, जानने का अधिकार है।

रिलायंस पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड बनाम इंडियन एक्सप्रेस न्यूजपेपर्स में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सूचना का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और हमें यह याद रखना चाहिए कि बड़े पैमाने पर लोगों को यह जानने का अधिकार है कि वे औद्योगिक जीवन (Industrial Life) और लोकतंत्र में भागीदारी विकास (Participatory Development) में भाग लेने में सक्षम हैं।

असीर जमाल बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया में देश की सर्वोच्च अदालत ने सूचना प्राप्त करने और प्रसारित करने के अधिकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक आंतरिक घटक माना है और कहा कि इस अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत मौलिक अधिकार का दर्जा प्राप्त है।

तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर की पीठ ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6(1) पर कहा की मौखिक रूप से अनुरोध करने वाले व्यक्तियों को लिखित रूप में दर्ज करने के लिए सभी उचित सहायता प्रदान करना केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी पर अनिवार्य है।

हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय ने उस स्थति के बारे में कोई चर्चा नहीं की जब ऐसी कोई सहायता लोक सूचना अधिकारी द्वारा एक अनपढ़ व्यक्ति को प्रदान न की जाए। तब ऐसे व्यक्ति के पास क्या उपाय होगा?

भारतीय संविधान ने नागरिकों को कई मौलिक अधिकार प्रदान किये हैं न्यायपालिका को इन अधिकारों की सुरक्षा के लिए संरक्षक बनाया है| न्यायपालिका की भूमिका यह सुनिश्चित करने की है कि विधायिका (Legislature) और कार्यपालिका (Executive) अपनी शक्तियों के दुरूपयोग से इन मौलिक अधिकारों का हनन नहीं करें। न्यायपालिका ने संविधान के अनुछेद 21 में दी गयी जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की विस्तृत व्याख्या कर बहुत सारे अधिकारों को इस अनुच्छेद के अंदर लाया है।

लेकिन अधिकारों पर चर्चा करना और अधिकारों को लोगों के लिए वास्तव में प्रदान करना जहाँ पर वह अधिकारों का इस्तेमाल कर सके दोनों अलग अलग बातें हैं। सरल शब्दों में, कल न्यायपलिका फिर किसी और अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा दे सकती है पर इसका मतलब ये नही है के वह अधिकार लोगों के पास वास्तव में उपलब्ध होंगे।

बहुत सारे क़ानून हैं जो कहने सुनने में तो बहुत अच्छे लगते हैं लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनका कोई इस्तेमाल नहीं है जैसे की बाल विवाह, दहेज़ हेतु रोकने वाले क़ानून क्योंकि उनको लागु करने के लिए कोई मज़बूत, प्रभावी तंत्र नही है।

1975 में सुप्रीम कोर्ट ने सूचना का अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार का दर्जा दिया। जिसके फलस्वरूप 2005 में संसद ने सूचना का अधिकार अधिनियम पारित किया जिसमें नागरिकों को किसी भी लोक प्राधिकरण से सूचना मांगने के अधिकार दिया गया परन्तु डेढ़ दशक गुजरने के बाद भी इस अधिकार का इस्तेमाल देश की बड़ी जनसंख्या जैसे की अनपढ़ लोग नहीं कर पा रहे हैं। इस क़ानून के प्रावधान का अध्यन करने पर ऐसा लगता है के यह अधिकार देश के हर नागरिक के पास है ख़्वाह वो अनपढ़' हो या पढ़ा लिखा। पर क्या वास्तव में यह अधिकार हर नागरिक के पास है?

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