भारत को एक एंटी-सैंक्शन कानून की ज़रूरत है, वह भी अभी
LiveLaw Network
29 May 2026 10:24 AM IST

क्षेत्रातीत प्रतिबंधों का बढ़ता इस्तेमाल भारत की संविदात्मक संप्रभुता और रणनीतिक स्वायत्तता के लिए चुनौती बन रहा है। हाल की एक रिपोर्ट के अनुसार, 'भारत EU जैसा एक एंटी-सैंक्शन कानून बनाने पर विचार कर रहा है', जिसे 'ब्लॉकिंग स्टैच्यूट' (अवरोधक कानून) कहा जाता है। एंटी-सैंक्शन कानून पर भारत सरकार के विचार-विमर्श की शुरुआत पिछले जुलाई में Microsoft द्वारा Nayara की आईटी सेवाओं को एकतरफा रूप से निलंबित किए जाने के बाद हुई थी।
हालांकि यह निलंबन थोड़े समय के लिए ही था, लेकिन इसने भारत सरकार के लिए एक बड़ी खतरे की घंटी बजा दी। Nayara द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट में अंतरिम निषेधाज्ञा के लिए अपील किए जाने के बाद Microsoft द्वारा Nayara की आईटी सर्विसेज को बहाल कर दिए जाने से भी सरकार की चिंता कम नहीं हुई। इसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि एक साल बाद भी इस विषय पर विचार-विमर्श जारी रहा।
Nayara के लिए Microsoft की सेवाओं के निलंबन का संभावित कानूनी आधार US OFAC का अप्रैल, 2021 का कार्यकारी आदेश 14024 था। यह कोई अकेली घटना नहीं थी; बल्कि, अक्टूबर 2024 में OFAC ने 17 अलग-अलग क्षेत्राधिकारों (जिनमें भारत स्थित 15 कंपनियां भी शामिल थीं) में 275 व्यक्तियों और संस्थाओं पर प्रतिबंध लगा दिए, जो रूस के सैन्य उद्योग के साथ व्यापार करने में शामिल थे।
किसी अन्य देश द्वारा 'लॉन्ग-आर्म ज्यूरिस्डिक्शन' (दूरगामी क्षेत्राधिकार) की शक्ति का उपयोग करते हुए किसी अनुबंध को एकतरफा रूप से समाप्त करना, भारत की सार्वजनिक नीति और भारत के अनुबंध कानून की मूल भावना के अनुरूप नहीं है। Subodh Kumar Singh Rathour बनाम Kolkata Metropolitan Development Authority (2024) INSC 486 मामले में जस्टिस धनजंय वाई चंद्रचूड़ की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अनुबंधों की पवित्रता एक ऐसा मूलभूत सिद्धांत है, जो कानूनी और वाणिज्यिक संबंधों में स्थिरता और पूर्वानुमान सुनिश्चित करता है।
EU के 'ब्लॉकिंग स्टैच्यूट' की संरचना:
'ब्लॉकिंग स्टैच्यूट' एक ऐसा कानून है, जिसे किसी एक क्षेत्राधिकार द्वारा इसलिए बनाया जाता है, ताकि किसी दूसरे क्षेत्राधिकार (जिसके पास 'लॉन्ग-आर्म ज्यूरिस्डिक्शन' की शक्ति हो) द्वारा बनाए गए कानून के प्रवर्तन को सीमित किया जा सके। सबसे पहले, यूरोपीय संघ ने Council Regulation (EC) No. 2271/96 (ब्लॉकिंग स्टैच्यूट) पारित किया था, जिसका उद्देश्य USA के Helms-Burton Act (1996) के "Traffic" Clause (अनुच्छेद III) के प्रभाव को सीमित करना था।
"Traffic" क्लॉज़ ने अमेरिकी नागरिकों को अमेरिकी फ़ेडरल कोर्ट में उन व्यक्तियों या व्यावसायिक संस्थाओं (चाहे वे विदेशी हों या अमेरिकी) पर मुक़दमा करने की अनुमति दी, जो क्यूबा सरकार द्वारा ज़ब्त की गई संपत्ति में 'Traffic' करते हैं। यहां Traffic का मतलब है, जान-बूझकर या इरादतन उस संपत्ति के व्यावसायिक इस्तेमाल से फ़ायदा उठाना।
EU ब्लॉकिंग क़ानून दो मुख्य तंत्रों के ज़रिए काम करता है:
मान्यता से इनकार और Claw-Back प्रावधान। यूरोपीय संघ के बाहर से कोई भी न्यायिक फ़ैसला या प्रशासनिक कार्रवाई, जो प्रतिबंधों को लागू करती हो, उसे EU क्षेत्र के भीतर न तो मान्यता दी जाती है और न ही लागू किया जा सकता है। "Claw-Back" तंत्र (अनुच्छेद 6) यूरोपीय संघ के ऑपरेटरों को विदेशी क़ानूनों के बाहरी क्षेत्र में लागू होने से हुए नुक़सान की भरपाई के लिए अदालतों में मुक़दमा करने की अनुमति देता है।
Bank Melli Iran V Telekom Deutschland GmbH (Case C-124/20) मामले में CJUE ने EU के Anti-Sanctions क़ानून के इस्तेमाल और उद्देश्य को विस्तार से स्पष्ट करते हुए कहा कि ब्लॉकिंग क़ानून संविदात्मक प्रतिपक्ष के ख़िलाफ़ कार्रवाई का संभावित आधार प्रदान करता है, जब कोई EU ऑपरेटर कुछ अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन करने के लिए अनुबंध को समाप्त कर देता है।
इसके बाद अदालत ने क़ानून की उस आवश्यकता के बारे में बताया जिसमें सबूत का बोझ (burden of proof) उलटा कर दिया जाता है; अदालत ने कहा कि यदि शुरुआती सबूत यह संकेत देते हैं कि EU ऑपरेटर ने अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन किया है तो 'EU ऑपरेटर को आवश्यक कानूनी मानक के अनुसार यह साबित करना पड़ सकता है कि उसका आचरण उन क़ानूनों का पालन करने के उद्देश्य से नहीं था।' इसके अलावा, राष्ट्रीय अदालत के पास इस बात का संतुलन बनाने का अधिकार है कि क्या EU ऑपरेटर को अनुबंध बहाल करने के लिए मजबूर किए जाने पर उसे असमानुपातिक नुक़सान होगा, और क्या EU ऑपरेटर ने ब्लॉकिंग क़ानून से छूट पाने के लिए यूरोपीय आयोग से अनुमति मांगी थी।
Anti-Sanction क़ानून एक जान-बूझकर पैदा किया गया कानूनी गतिरोध बनाते हैं, जिसमें निगमन वाले देश (Country of Incorporation) के प्रावधानों का पालन करना, संचालन वाले क्षेत्र (Operating Jurisdiction) के क़ानूनों का उल्लंघन माना जा सकता है। यह कानूनी गतिरोध में फंसी कंपनियों को बातचीत करने के लिए मजबूर करता है, न कि चुपचाप मान लेने के लिए। भारत को यह समझने में देर हुई है, लेकिन कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, फ़्रांस, मेक्सिको और चीन पहले से ही इस तर्क के साथ तालमेल बिठा चुके हैं।
रक्षात्मक कानूनी दांव-पेच से परे
अमेरिकी कानून का 'लॉन्ग-आर्म ज्यूरिस्डिक्शन' (दूर तक पहुंचने वाला क्षेत्राधिकार) इस तरह से बनाया गया कि यह अमेरिकी घरेलू सीमा से बहुत दूर स्थित संस्थाओं को भी अपने दायरे में ले सके। अमेरिका के प्रतिबंधों को लागू करने की शक्ति इतनी व्यापक है कि इसमें न केवल अमेरिकी कंपनियां, बल्कि अमेरिकी कंपनियों की भारतीय सहायक कंपनियां भी शामिल हो जाती हैं। 'ब्लॉकिंग क़ानून' (Blocking Statute) कंपनियों को इस बात के लिए मजबूर करेगा कि वे किसी विदेशी क्षेत्राधिकार के प्रतिबंधों और भारतीय कानून के पालन में से किसी एक को चुनें।
यह अंतरराष्ट्रीय आर्थिक वार्ताओं में ब्लॉकिंग क़ानूनों की रणनीतिक उपयोगिता को दर्शाता है। 1996 से 2019 तक हर अमेरिकी राष्ट्रपति ने 'हेल्म्स-बर्टन एक्ट' के अनुच्छेद III को निलंबित रखा। इसकी वजह थी EU, कनाडा और मेक्सिको द्वारा लागू किया गया ब्लॉकिंग क़ानून। यह ब्लॉकिंग क़ानून की विश्वसनीयता को एक 'मोल-भाव के हथियार' (Bargaining Chip) के रूप में स्थापित करता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने क्यूबा पर अधिकतम दबाव बनाने के अपने अभियान के तहत 'हेल्म्स-बर्टन एक्ट' के अनुच्छेद III को सक्रिय कर दिया; यह भू-राजनीति के प्रति उनके टकराव वाले रवैये को दर्शाता है। इस सक्रियता से कोई बड़ा भूचाल तो नहीं आया, बल्कि यह अपने वांछित लक्ष्य को पाने में विफलता को ही दर्शाता है, जिसका कारण था कई क्षेत्राधिकारों द्वारा ब्लॉकिंग क़ानूनों को लागू किया जाना; परिणामस्वरूप, इस एक्ट के अनुच्छेद III को लागू करने की लागत काफी बढ़ गई।
एक सुविचारित भारतीय ब्लॉकिंग क़ानून एक साथ तीन उद्देश्यों को पूरा करेगा। पहला, यह कंपनियों को विदेशी प्रतिबंधों का विरोध करने के लिए एक कानूनी सुरक्षा कवच प्रदान करेगा। दूसरा, यह दुनिया को एक स्पष्ट संदेश देगा कि भारत प्रतिबंधों को एक 'संप्रभु मामला' मानता है। इसका जवाब केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि कानूनी भी होगा। तीसरा, यह भारत को 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों के समूह) के एक नेता के रूप में स्थापित करेगा, जो उन कानूनी ढांचों का विरोध करता है, जो एकतरफ़ा, ज़बरदस्ती वाले आर्थिक प्रतिबंधों को संभव बनाते हैं।
साथ ही, जो अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को सुरक्षित रखता है। भारत के दृष्टिकोण से प्रतिबंध-विरोधी कानूनों को लागू करना उन आर्थिक प्रतिबंधों के विरुद्ध भारत की 'राज्य संप्रभुता' के प्रति उसकी प्रतिबद्धता की एक विधायी अभिव्यक्ति होगी, जो अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करते हैं।
सिद्धांतों में दृढ़, स्वरूप में लचीला
हालांकि भारत के अपने ब्लॉकिंग क़ानून को लागू करने में कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां मौजूद हैं। फिर भी यह बयान देना आवश्यक है कि भारत अपनी कानूनी व्यवस्था की 'क्षेत्राधिकार-बाह्य अधीनता' (Extraterritorial Subordination) को निष्क्रिय होकर स्वीकार नहीं करेगा। ट्रंप के दौर की आक्रामक कूटनीति के माहौल में भारत द्वारा लागू किए जाने वाले इस प्रतिबंध-विरोधी क़ानून को वाशिंगटन में एक 'शत्रुतापूर्ण कृत्य' के रूप में देखे जाने का जोखिम बना रहेगा।
हालांकि, यह अनिश्चित काल तक निष्क्रिय बने रहने का कोई कारण नहीं हो सकता। प्रतिबंध-विरोधी कानूनों को लागू करने को भारत की संप्रभुता के संदेश के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, न कि उसके किसी भी रणनीतिक सहयोगी के प्रति शत्रुता के बयान के रूप में; विशेष रूप से तब, जब यूरोपीय संघ, चीन, रूस और कनाडा पहले ही इसी तरह के कानून लागू कर चुके हैं।
किसी सरकारी अधिकारी द्वारा की गई घोषणा का कानून में न बदलना, केवल एक 'ट्रायल बैलून' (जांच का एक प्रारंभिक कदम) बनकर रह जाएगा। यूरोपीय संघ ने अपने आर्थिक संचालकों को सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक 'ब्लॉकिंग कानून' लागू किया। चीन ने नीतिगत स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए अवरोधक उपाय लागू किए। कनाडा ने अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए उपाय लागू किए।
ऊपर बताए गए कारणों के साथ-साथ भारत के लिए भी बाहरी-क्षेत्रीय प्रतिबंधों (Extraterritorial Sanctions) के इस दौर में संविदात्मक निश्चितता, विनियामक स्वायत्तता और संप्रभु निर्णय-निर्माण सुनिश्चित करने के लिए यह 'ब्लॉकिंग कानून' आवश्यक है।
लेखिका- सुहासिनी बेनेट यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ लॉ में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और प्रांजल बेनेट यूनिवर्सिटी में डॉक्टोरल रिसर्च फेलो हैं। ये विचार उनके व्यक्तिगत हैं।

