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हिंदी भाषा : राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय विषय बनने तक का सफ़र

हिमांशु दीक्षित
14 Sep 2020 4:35 AM GMT
हिंदी भाषा : राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय विषय बनने तक का सफ़र
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किसी भी विषय पर मंथन करने से पूर्व उस विषय के गर्भ तक जाना सदैव प्रशंसनीय रहता है | हिंदी भाषा के अंतरराष्ट्रीय संवर्धन पर जाने से पूर्व हमारा यह देखना बेहद जरूरी है कि हिंदी का भारत देश में ही राष्ट्रीय संवर्धन किस स्तर तक हो रखा है |

आम जनमानस के लिए हमेशा से ही भ्रमित करने वाला सबसे बड़ा प्रश्न यही रहा है कि,"क्या हिंदी 'राष्ट्रभाषा' है" ? हममें से कई लोगों मानते है "हाँ" और कई लोगों कहते है "न" | व्यवहारतः, हिंदी भाषा भारत देश कि मात्र एक औपचारिक भाषा ही है और जिस प्रकार से भारत का एक राष्ट्रीय पशु, राष्ट्रीय पक्षी और राष्ट्रीय प्रतीक-चिन्ह दर्ज है, उस प्रकार से भारत की आज तक कोई भी राष्ट्रीय भाषा चयनित नहीं की गयी है |

हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने वर्ष 1917 के गुजरात शिक्षा सम्मेलन के एक संबोधन में राष्ट्रभाषा की जरूरत पर बल दिया था और दृढ़ता से कहा था कि हिंदी ही एकमात्र भाषा है, जिसे 'राष्ट्रीय भाषा' के रूप में अपनाया जा सकता, क्योंकि यह अधिकांश भारतीयों द्वारा बोली जाने वाली एकमात्र भाषा है |

भले ही बापू जी को भारत के राष्ट्र-पिता का दर्ज़ा दे रखा है, लेकिन ये दर्ज़ा उनकी बातों और सिद्धांतों से हमेशा कोसों दूर ही रखा जाता है | हमारी सरकारें जब महान और दिग्गज सेनानियों द्वारा बताए हुए संस्कारों और सिद्धांतों पर नहीं चल पाती है, तो उनके नाम पर मार्ग ही बना कर काम चला लेती हैं (जैसे, दिल्ली की महात्मा गाँधी (एम० जी०) रोड)|

संविधान निर्माताओं द्वारा जब राष्ट्र भाषा के मुद्दे पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया था, तब कई प्रकार के वाद-विवाद के बाद यह निर्णय लिया गया था कि देवनागरी लिपि में हिंदी को अनुच्छेद 343 (1) के तहत राष्ट्र भाषा को अपनाया जाना चाहिए । हालाँकि देश के दक्षिणी राज्यों से उठाये गए विद्रोह के कारण यह प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया, लेकिन फिर भी, संविधान में अनुच्छेद 351 जैसे कई विशेष प्रावधान डाल दिए गए जिसके तहत केंद्र सरकार हिंदी भाषा के बढ़ावे और प्रचार-प्रसार करने के लिए बाध्य है |

चूंकि हमारा संविधान राष्ट्रभाषा को पहचाने में थोड़ा मौन ही रहा है, इसलिए इस बात का निर्धारण करने का कार्य हमारी न्यायालयों द्वारा ही कर दिया गया है। इस विवाद में दो प्रतिस्पर्धी तर्क उठाए जाते हैं,पहला एकता का तर्क और दूसरा अल्पसंख्यकों को नुकसान पहुंचाने का तर्क। हिंदी के पक्ष में कहा गया है कि राष्ट्रभाषा होने से पूरा देश एकजुट होगा, जबकि दूसरे पक्ष का मानना है कि हिंदी थोपने से गैर हिंदी भाषी लोगों को बड़ा नुकसान होगा।

इसके अतिरिक्त, आलोचक भारत की विविधताओं का हवाला देते हैं कि भारत में बहुमत से बोली जाने वाली कोई एक भाषा नहीं है, फिर एक भाषा एकजुट कारक कैसे हो सकती है । लेकिन कुछ न्ययालयों जैसे बॉम्बे हाईकोर्ट , कलकत्ता और मध्य प्रदेश ने एकता के तर्क के साथ एकतरफा फैसला दिया है और अप्रतक्ष्य रूप से यह टिप्पणी की है कि हिंदी को ही भारत की राष्ट्र भाषा समझा जाना चाहिए । हालांकि, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि इस तरह की टिप्पणियों को कई अन्य न्यायालयों ने अस्वीकार भी किया है, जिसके चलते कोई ठोस निष्कर्ष तक न्यायतंत्र कभी भी नहीं पहुंचा पाया ।

हिंदी और उसका अंतरराष्ट्रीय विकास

हिंदी, जिसका उद्गम देव-वाणी संस्कृत से देख जा सकता है, भारत देश की एक अनोखी धरोहर है | संस्कृत दुनिया की सबसे पुरानी भाषा है और अन्य कई और भाषाएं भी संस्कृत से ही सम्बद्ध है। हमxने यह भी देखा है कि पश्चिमी ज्ञान भी कई हद तक संस्कृत- हिंदी व उससे जुड़े लेखों से ही उधार लिया गया है ।हिंदी भारत में ही नहीं, अपितु और भी कई देश जैसे-फिजी,नेपाल,सूरीनाम, मॉरीशस, त्रिनिदाद, टोबैगो और गुयाना इत्यादि में भी काफ़ी प्रचलन में है ।

अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में हिन्दी संवर्धन में यदि कोई ऐतिहासिक कदम हो सकता है तो वह है- संयुक्त राज्य संघ द्वारा हिंदी को एक औपचारिक दर्जा दिया जाना |शुरुआत में संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाओं में चीनी, फ्रेंच, अंग्रेजी, रूसी और स्पेनिशही शुमार थी लेकिन बाद के कुछ वर्षों में ही संयुक्त राष्ट्र के दो-तिहाई प्रस्ताव से वर्ष 1973 में अरबी को भी एक औपचारिक भाषा का स्थान मिल गया । अपनी कूटनीतिज्ञ और सामरिक बुद्धि का प्रयोग करते हुए भारत सरकार के अधिकारियों को भी ठीक इसी तरह संयुक्त राष्ट्र में हिंदी के आधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त हेतु दो-तिहाई सदस्यों के वोटों को सुरक्षित करने का तीव्रता से प्रयास करना चाहिए |

भारत सरकार द्वारा हिंदीके वैश्विक संवर्धन हेतु पूर्व में हुए महत्वपूर्ण प्रयास

भारत सरकार ने दुनिया भर में हिंदी भाषा के दर्शकों की सेवा के लिए संयुक्त राष्ट्र (यू०एन०) द्वारा उत्पादित हिंदी सामग्री की मात्रा और आवृत्ति बढ़ाने के लिए दो साल की प्रारंभिक अवधि के लिए मार्च 2018 में संयुक्त राष्ट्र सचिवालय के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया था, जिसके चलते जुलाई 2018 में यू०एन० के आदेश के चलते ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर अपने सोशल मीडिया कंटेंट के हिंदी संस्करण लॉन्च किए गए थे। जनवरी 2019 में विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर यू०एन समाचार की हिंदी वेबसाइट को भी शुरू की गया था | इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र समाचार ऑडियो बुलेटिन (यू०एन० रेडियो) को भी हिंदी भाषा में साप्ताहिक आधार पर जारी किया जा रहा हैं | अगर इतिहास के पन्ने पलटे जाए तो देखा जा सकता है की भारतीय नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र में कई बार हिंदी में भी बयान दिए हैं, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का 1977 में पहली बार संयुक्त राष्ट्र में हिंदी भाषा में भाषण दिया जाना, सितंबर 2014 में 69वें संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रधानमंत्री मोदी जी का बयान और सितंबर 2015 में संयुक्त राष्ट्र सतत विकास शिखर सम्मेलन में दिया हुआ भाषण इत्यादि शामिल है।

निष्कर्ष और सुझाव

समय-समय पर कई प्रकार की समितियों द्वारा हिंदी के संवर्धन हेतु काफ़ी प्रयास किये जा चुके है,लेकिन हिंदी के वैश्विक उत्थान पर कभी ज्यादा जोर नहीं दिया गया है |अतः लेखक उक्तलिखित सुझावों को प्रस्तुत करना चाहता है :

1. वर्ष 2019 में अरब देश 'अबू धाबी' ने न्याय की पहुंच में सुधार लाने के प्रयास में अरबी और अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी को भी तीसरी आधिकारिक अदालत की भाषा के रूप में शामिल किया है । यह सब कुछ इसलिए संभव हो पाया क्यूंकि हम भारतीयों का संयुक्त अरब अमीरात में एक सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय रहता है जिसमें सिर्फ अमीरात में ही 3 करोड़ से अधिकलोग रह रहे हैं । ठीक इसी प्रकार से, हमारेसभी प्रवासी भाई-बहन भी, जिसभी देश में वो रह रहे है वहाँ की प्रशासनिक, सांस्कृतिक और मनोरंजक क्रिया-कलापों में हिंदी के प्रभामंडल की व्यापकता कोऔर भी बढ़ा सकतेहैं।

2. सरकारों द्वारा विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीयस्तर पर आयोजित होने वाली प्रतियोगिताएं/सम्मेलनों/सेमिनारों में हिंदी भाषा का उपयोगसुनिश्चित किया जाना चाहिए।

3. पूरे देश-प्रदेश में चल रहे हिंदी प्रोत्साहन योजनाओं के प्रभाव का मूल्यांकन करना भी आवश्यक है ताकि यह सुनिश्चित किया जाए कि हज़ारों करोड़ के सरकारी कोष का सही ढंग से प्रयोग किया जा सके ।

4. यहां यह उल्लेख करना भी प्रासंगिक है कि आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के वर्तमान परिदृश्य मेंकई कार्यालय/उपक्रम/बैंक अपनी गतिविधियों का विस्तार विदेशी तक कर रहे हैं | इसके साथ-ही-साथ देशों-दुनिया के प्रमुख शहरों में 175 भारतीय सरकारी कार्यालय/दूतावास स्थित हैं । यदि इन तमाम कार्यालयों में हिंदी भाषा नीति के कार्यान्वयन को सुनिश्चित किया जाए तो हिंदी के वैश्वीकरण में ज्यादा देर नहीं लगेगी |

5. हमारे जिला एवं राज्य स्तरीय कोर्टों मेंभी हिंदी भाषा के प्रचलन को बढ़ावा देना चाहिए | अभी हाल ही में, हरियाणा राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2020 में जिला-स्तरीय न्यायिक कार्यों में हिंदी भाषा के प्रयोग को अनुमति दे दी गयी है |

6. सरकार को देशी निर्मित वस्तुओं की तारीख, मूल्य आदि सहित उत्पादों के पैकेटों में हिंदी या अन्य कोई क्षेत्रीय भाषा को अनिवार्य बनाना चाहिए । इसके साथ ही साथ प्रौद्दोगिक उद्द्योगपतियों को मोबाइल-कंप्यूटर आदि में हिंदी सॉफ्टवेयर को अवश्य ही उपलब्ध करना चाहिए ताकि हिंदी भाषा का प्रचार पूरे विश्व में तकनीक के माध्यम से भी हो सके |

7. 14 सितंबर को हम हर साल हिंदी दिवस मनाते हैं ताकि हमारी जड़े भाषा से सदैव ही जुडी रहे | गांधी जी जानते थे कि भारत बिना एक भाषा के सहारे स्वराज कभी हांसिल नहीं हासिल कर सकता है। वह दक्षिण भारत में हिंदी को बढ़ावा देना चाहते थे इसलिए वह हिंदी मिशनरियों को वहां भेजते हैं । उन्होंने 1923 में दक्षिण भारत हिंदी महासभा की स्थापना भी कीथी । ठीक इसी प्रकार से ही अब केंद्र सरकार और निजी संस्थानों को भी बढ़-चढ़ कर आगे आना चाहिए और हिंदी मिशनरियों को विश्व के सारे देशों में कूट-नीति शास्त्र की मदद से भेजना चाहिए |

8. इस विशाल बहुभाषी देश के लिए एक राष्ट्रभाषा के चिन्हित करने पर अब पुरजोर प्रयास करना चाहिए तथा यह तर्क अब शिरे से नकार देना चाहिए कि चूँकि भारत के पास क्षेत्रीय भाषाओं का दुनिया का सबसे विशाल संग्रह है, इसलिए कोई एक भाषा नहीं चुनी जा सकती है । गांधी जी ने भी इस संबंध में अपने विचार व्यक्त करते हुए एक बार कहा था कि, जब तक हम हिंदी को अपना प्राकृतिक दर्जा नहीं देंगे और प्रांतीय भाषाएं लोगों के जीवन में उनका उचित स्थान नहीं देतीं, तब तक स्वराज की सारी बातें बेकार हैं । अतः अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में हिन्दी के संवर्धन के साथ ही साथ भारत राष्ट्र में भी हिंदी का समुचित संवर्धन करवाना सुनिश्चितकिया जाना चाहिए |

9. यह सही कहा गया है कि भारत एक सुंदर कालीन की तरह है जो एक ऐसी डिजाइन में बुना गया है जिसमें राष्ट्र के पूरे ताने-बाने को कसकर पकड़े हुए समुद्री मील द्वारा बुनी गई विविध सांस्कृतिक अभ्यावेदनों की भाषाएं है । अगर किसी एक संस्कृति या भाषा को दूसरे से ज्यादा महत्व दिया जाए तो इस कालीन की खूबसूरती पर शायद निशान भी पड़ सकते हैं । अतः इसके बजाय हमे सभी भाषाओं के प्रति सम्मान का भाव रखना चाहिए और उन्हें बढ़ावा भी देना चाहिए । इन क्षेत्रीय भाषाओं को और विकसित किया जाना चाहिए ताकि ये भाषाएं देश के भविष्य में सार्थक भूमिका निभा सकें । अल्पसंख्यकभाषाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संविधान संशोधन अधिनियम 1956 द्वारा अनुच्छेद 350 (ए) और 350 (बी) डाला गया था ।हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इसकी दिशा में एक कदम भी उठाया है, जहां कोर्ट ने अपने फैसले न केवल हिंदी में बल्कि अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी उपलब्ध कराए ।

सारांश

हमारे भारत देश में हिंदी दिवस का पर्व न केवल एक कविता, वाद-विवाद, निबंध लेखन और विचार आदान-प्रदान की जश्न प्रदर्शनी है, बल्कि इस पर्व का जश्न भारत एवं राज्य सरकारों के साथ-साथ स्कूलों, निजी संस्थानों और तमाम कार्यालयों द्वारा भी मनाया जाता है । इस शोध-पत्रिका के माध्यम से लेखक हिंदी भाषा की मातृत्व स्तर से वैश्विक स्तर तक के सफ़र के कई महत्वपूर्ण पहलुओं का वर्णन करेगा| भारतीय संविधान, विधान और न्यायतंत्र का हिंदी भाषा के प्रति क्या मत रहा है और यह मत किस प्रकार से हिंदी को अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में एक विशेष स्थान दिला सकता है, इस बात की भी समीक्षा इस शोध-पत्रिका में देखने को मिलेगी | अंत में, उपसंहार लिखने से पूर्व लेखक द्वारा हिंदी भाषा के अंतर्राष्ट्रीय पोषण में आने वाली चुनौतियों पर भी एक बृहद मंथन किया जाएगा, जिसके बाद कई ऐसे युक्तियुक्त सुझावों को भी प्रस्तावित किया जाएगा जिसको जमीनीस्तर पर उतारना काफ़ी सरल और सहज हो |

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

ये लेखक के निजी विचार हैं

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