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स्वतंत्रता को सांस लेने की जगह देना: विशेष विवाह अधिनियम के तहत नोटिस पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय

Gautam Bhatia
14 Jan 2021 12:27 PM GMT
स्वतंत्रता को सांस लेने की जगह देना: विशेष विवाह अधिनियम के तहत नोटिस पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक एकल न्यायाधीश ने कल विशेष विवाह अधिनियम की धारा 4 और 5, जिसमें जोड़ों को अपनी शादी से एक महीने पहले विवाह अधिकारियों को सूचित करने और विवाह अधिकारियों को इस प्रकार की सूचना को प्रचारित करने की आवश्यकता होती है, की व्याख्या करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।

विशेष विवाह अधिनियम किसी भी व्यक्ति को इस आधार पर विवाह पर "आपत्त‌ि" करने की अनुमति देता है कि यह (कथित रूप से) अधिनियम के प्रावधानों (धारा 7) का उल्लंघन करता है। सफिया सुल्ताना बनाम यूपी राज्य का मामला कोर्ट के समक्ष एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के रूप में आया था, हालांकि युगल ने याचिका में विशेष विवाह अधिनियम की धारा 4 और 5 की जांच के लिए भी कहा था।

उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश, 2020 के बाद उक्त प्रावधानों की व्याख्या महत्वपूर्ण हो गई थी। उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश सरकार के उक्त अध्यादेश को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई है।

प्रावधानों को चुनौती देने का कारण यह था कि, "... युवा जोड़े व‌िवाह से पहले इन मुद्दों को उठाने की स्थिति में नहीं होते हैं, क्योंकि किसी भी मुकदमेबाजी से अनावश्यक ध्यान आकर्षित होता है, जो उनकी ‌निजता पर हमला करता है और जीवन साथी की पसंद के संबंध में उन पर अनावश्यक सामाजिक दबाव भी पैदा करता है। "

जस्टिस विवेक चौधरी इस तर्क से सहमत‌ थे, और संवैधानिकता के आधार पर विशेष विवाह अधिनियम की जांच करने के लिए आगे बढ़े। उन्होंने यह कहते हुए शुरुआत की विशेष विवाह अधिनियम, 1954 में पारित हो गया था, इसलिए न्यायालय के समक्ष इस बात की जांच करने का कार्य है कि क्या इस बीच, सामाजिक और कानूनी परिदृश्य में इस हद तक बदलाव आया है कि अधिनियम के प्रावधानों की अलग व्याख्या आवश्यक हो जाए।

जस्टिस चौधरी ने कहा कि विधि आयोग (2012) की 242 वीं रिपोर्ट ने विशेष रूप से नोटिस की आवश्यकता को हटाने की सिफारिश की थी, यह देखते हुए कि यह "मनमानी या अनुचित हस्तक्षेप" पर रोक लगाएगा, जिसने सामाजिक बहिष्कार, उत्पीड़न आदि का रूप ले लिया है।

इसके बाद जस्टिस चौधरी ने कहा कि 2006 के बाद से - उच्चतम न्यायालय ने कई फैसलों में शादी के सवालों में व्यक्तिगत स्वायत्तता की भूमिका पर जोर दिया और इसे संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 में निहित माना। निजता के अधिकार के दायरे पर विस्तार से चर्चा के लिए उन्होंने पुट्टास्वामी मामले में निजता के फैसले का उल्लेख किया।

न्यायालय महत्वपूर्ण रूप से ने ध्यान दिया कि नवतेज जोहर में, यह स्पष्ट किया गया था कि, जब संवैधानिकता के लिए कानून की जांच की जाती है कि रूप नहीं बल्‍कि उद्देश्य महत्वपूर्ण होता है।

एक साथ मिसाल पेश करते हुए जस्टिस चौधरी ने कहा कि, "लता सिंह मामले के बाद से नवतेज सिंह जौहर के फैसला तक, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता के मौलिक अधिकारों को परिभाषित करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून लंबी यात्रा तय कर चुका है। एक व्यक्ति जब वयस्‍क हो जाता है, वह पुरुष हो या स्‍त्री, जिसे भी पसंद करता है, उससे विवाह कर सकता है।"(लता सिंह);"

जीवन साथी चुनने की महिला की पसंद एक वैध संवैधानिक अधिकार है। यह व्यक्तिगत पसंद पर आधारित है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मान्यता दी गई है।"(आशा रंजन)

जब दो वयस्क विवाह के लिए सहमत होते हैं तो परिवार या समुदाय या कबीले की सहमति आवश्यक नहीं है। यह उनकी पसंद की अभिव्यक्ति है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत मान्यता प्राप्त है।" (शक्ति वाहिनी);

न तो राज्य और न ही कानून साथी का विकल्प निर्धारित कर सकते हैं या इन पर निर्णय लेने के लिए हर व्यक्ति की स्वतंत्र क्षमता को सीमित कर सकते हैं। अंतरंग व्यक्तिगत फैसलों के लिए सामाजिक अनुमोदन, उन्हें मान्यता देने का का आधार नहीं है।" (शफीन जहान)

और अंत में नौ न्यायाधीशों की पीठ का फैसला, जिसमें कहा गया है, "निजता व्यक्ति की पवित्रता की अंतिम अभिव्यक्ति है। यह एक संवैधानिक मूल्य है, जो मौलिक अधिकारों के स्पेक्ट्रम के पार जाता है और व्यक्ति की पसंद और आत्मनिर्णय के क्षेत्र के लिए रक्षा करता है ……। निजता राज्य और गैर-राज्य कारकों, दोनों के खिलाफ संरक्षित किए जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण अधिकारों में से एक है और एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त है।" (पुत्तुस्वामी) समय के साथ मजबूत होने वाले फैसलों की एक लंबी श्रृंखला है और राज्य, परिवार या समाज के हस्तक्षेप के बिना साथी चुनने के अधिकार सहित व्यक्तिगत अधिकारों की स्वतंत्रता और निजता को स्थापित करता है।" (पैरा 40)

इस प्रकार, प्रस्ताव का संयोजन कि (a) अंतरंग मामलों में किसी व्यक्ति की स्वायत्त पसंद को संवैधानिक रूप से संरक्षित किया गया है, और (b) संवैधानिकता पर कानून के प्रभाव द्वारा विचार किया जाना है; यह जस्टिस चौधरी को इस निष्कर्ष पर लाया कि विशेष विवाह अधिनियम की इस प्रकार विवाह की व्याख्या हो कि रिपोर्टिंग आवश्यकताओं को स्वैच्छिक रहे, अनिवार्य नहीं:

"धारा 6 और 7 की व्याख्या, धारा 46 के साथ पढ़ें, भावी विवाह के नोटिस के प्रकाशन और उस पर आपत्तियां आमंत्रित कराने की प्रक्रिया से संबंधित है और इसलिए यह ऐसा होना चाहिए जो मौलिक अधिकारों को बनाए रखे और उसका उल्लंघन ना करे। यदि, बहुत सरल पठन के अनुसार, उपरोक्त को अन‌िवार्य किया जाता है, आज घोषित कानून के अनुसार, तो यह स्वतंत्रता और निजता के मौलिक अधिकारों पर हमला करेगा, जिनके तहत संबंधित व्यक्ति द्वारा, राज्य और गैर-राज्य कारकों के हस्तक्षेप के बिना, विवाह के लिए चयन की स्वतंत्रता भी शामिल है।" (पैरा 45)

जस्टिस चौधरी ने इस निष्कर्ष पर विचार किया कि कई व्यक्तिगत कानूनों के तहत रिपोर्टिंग की समान आवश्यकताएं नहीं थीं, और इसलिए, विशेष विवाह अधिनियम के तहत प्रक्रिया को और अधिक कष्टदायक बनाने का कोई कारण नहीं है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय सामाजिक और सतर्क समूहों को ताकतवर बनाने सहित विवाह के सवालों पर राज्य के हस्तक्षेप के खिलाफ एक महत्वपूर्ण न्यायिक टकराव का प्रतिनिधित्व करता है।

विशेष विवाह अधिनियम के नोटिस की आवश्यकताएं निश्चित रूप से नई नहीं हैं: जैसा कि न्यायालय ने देखा था, वे शुरुआत से मौजूद रही हैं, जब 1872 में मूल कानून पेश किया गया है। हालांकि, यकीनन, यह नोटिस की आवश्यकताएं हैं, जिन्होंने आगे की घुसपैठ की आधार रेखा बनाई है, (यूपी अध्यादेश की भी ऐसी ही आवश्यकता है) सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वे क्या संकेत देते हैं: नोटिस और रिपोर्टिंग आवश्यकताओं ने दुनिया को संदेश दिया है कि अंतरंग निर्णय भी व्यक्ति नहीं ले सकता है,बल्‍कि समाज द्वारा इसकी पुष्टि की जानी चाहिए ( जिसका व्यावहारिक रूप से मतलब समाज के प्रमुख सदस्यों से है।)

व्यवहार में, वे व्यक्तियों और युगलों को सामाजिक उत्पीड़न और हिंसा के विकल्प के साथ छोड़ देते हैं, या स्वतंत्रता को त्याग देते हैं। एक संवैधानिक लोकतंत्र को अपने नागरिकों को ऐसे विकल्प देने चाहिए। यह देखते हुए जस्टिस चौधरी का निर्णय भारतीय संविधान के तहत स्वतंत्रता की प्रामाणिक अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है।

लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

यह लेख पहली बार यहां प्रकाशित किया गया था।

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