Explained | यूपी जज रवि कुमार दिवाकर से जुड़े विवादों पर एक नज़र

LiveLaw Network

12 Sept 2026 12:47 PM IST

  • Explained | यूपी जज रवि कुमार दिवाकर से जुड़े विवादों पर एक नज़र

    उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले में तैनात एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज रवि कुमार दिवाकर 7 सितंबर, 2026 को दिए गए फ़ैसले के बाद फिर से चर्चा में हैं। इस फ़ैसले में उन्होंने कहा कि "कायर जज कहलाने से बेहतर है कि मैं मर जाऊँ"।

    38 पेज के इस फ़ैसले में मुज़फ़्फ़रनगर के शाहपुर के रहने वाले नदीम को मौत की सज़ा सुनाई गई। नदीम पर अपनी 23 साल की पत्नी शहज़ादी पर केरोसिन डालकर उसे आग लगाने और उसकी हत्या करने का आरोप था। फ़ैसले में दर्ज है कि महिला का शरीर 98 प्रतिशत तक जल गया था।

    जज दिवाकर की ये बातें उनकी अदालत से हत्या और दूसरे गंभीर अपराधों के 97 लंबित मामलों को वापस लेने की प्रशासनिक कार्रवाई का जवाब मानी जा रही हैं। 7 सितंबर को सुनाई गई सज़ा, लगभग पाँच महीनों में उनकी 23वीं मौत की सज़ा थी: उन्होंने अप्रैल और अगस्त 2026 के बीच 10 मामलों में 22 बार मौत की सज़ा सुनाई थी।

    माना जाता है कि कई मामलों को वापस लेने का फ़ैसला जज दिवाकर द्वारा लगातार सुनाई जा रही मौत की सज़ाओं से जुड़ा था।

    इन घटनाओं ने एक ऐसे जज की ओर फिर से ध्यान खींचा है, जिनके आदेश हाल के वर्षों में कई बार सुर्खियों में रहे हैं।

    जज दिवाकर पहली बार 2022 में चर्चा में आए थे, जब वाराणसी में सिविल जज के तौर पर उन्होंने ज्ञानवापी मस्जिद मामले में उस जगह को सील करने का आदेश दिया, जहां कमीशन सर्वे के दौरान शिवलिंग मिलने का दावा किया गया।

    ज्ञानवापी मामले में उनकी भूमिका ने लोगों का काफ़ी ध्यान खींचा। बाद के अपने न्यायिक आदेशों में उन्होंने उस दबाव और धमकियों का भी ज़िक्र किया, जिनका सामना उन्हें और उनके परिवार को उस मामले में आदेश जारी करने के बाद करना पड़ा था।

    उन्होंने कहा था,

    "मेरे और मेरे परिवार में डर का ऐसा माहौल है जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। परिवार में हर कोई एक-दूसरे की सुरक्षा को लेकर चिंतित है। घर से निकलने से पहले कई बार सोचना पड़ता है। खासकर मेरी माँ मेरी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहती हैं।"

    उनके हालिया फ़ैसले में यह भी दर्ज है कि उत्तर प्रदेश एंटी-टेररिज्म स्क्वाड ने 2025 में एक व्यक्ति के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया। उस व्यक्ति पर ज्ञानवापी मामले की कार्यवाही के सिलसिले में सोशल मीडिया पर उन्हें धमकी देने का आरोप है।

    इससे पहले, मार्च 2024 में बरेली में तैनात रहते हुए भी जज दिवाकर चर्चा में आए थे। 2010 के बरेली दंगों के मामले में मौलाना तौकीर रज़ा खान को ट्रायल का सामना करने के लिए समन जारी करते हुए उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तारीफ़ की थी। उन्होंने योगी को सत्ता के लिए ज़रूरी "धार्मिक व्यक्ति" का उदाहरण बताया था।

    मुख्यमंत्री की तुलना प्लेटो के 'फिलॉसफर किंग' (दार्शनिक राजा) के कॉन्सेप्ट से करते हुए जज दिवाकर ने कहा था:

    "...सत्ता के प्रमुख को एक धार्मिक व्यक्ति होना चाहिए, क्योंकि धार्मिक व्यक्ति का जीवन मौज-मस्ती का नहीं, बल्कि त्याग और समर्पण का होता है। इसका एक उदाहरण महान सिद्धपीठ गोरखनाथ मंदिर के पीठाधीश्वर, महंत बाबा श्री योगी आदित्यनाथ जी हैं, जो उत्तर प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री हैं और जिन्होंने इस कॉन्सेप्ट को सच साबित किया... अगर कोई धार्मिक व्यक्ति सत्ता की कुर्सी पर बैठता है तो इसके बहुत अच्छे नतीजे मिलते हैं, जैसा कि दार्शनिक प्लेटो ने अपनी किताब 'रिपब्लिक' में 'फिलॉसफर किंग' के कॉन्सेप्ट में बताया। प्लेटो ने कहा था कि हमारे शहर-राज्य में दुखों का अंत तब तक नहीं होगा, जब तक वहां कोई फिलॉसफर किंग नहीं होगा"।

    इस आदेश में एक बार फिर जज दिवाकर के ज्ञानवापी से जुड़े पुराने आदेशों और उस समय से उनके परिवार को मिली धमकियों का ज़िक्र किया गया।

    19 मार्च 2024 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री के बारे में जज दिवाकर की टिप्पणियों को हटा दिया। कोर्ट ने इन टिप्पणियों को "राजनीतिक रंग और निजी विचारों वाली अनावश्यक बात" बताया।

    मौत की सज़ाओं का सिलसिला

    जज दिवाकर के हालिया फैसले और उनके पहले के कई फैसलों ने उनके न्यायिक काम के एक अलग पहलू को उजागर किया - उनकी अदालत द्वारा सुनाई गई मौत की सज़ाओं की संख्या और बार-बार सज़ा सुनाने की घटनाएं।

    अप्रैल और अगस्त 2026 के बीच, उन्होंने 10 मामलों में 22 लोगों को मौत की सज़ा सुनाई। 7 सितंबर को, उन्होंने नदीम को 23वीं मौत की सज़ा सुनाई।

    नदीम मामले में, जज दिवाकर ने मौत की सज़ा से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का सहारा लिया, जिनमें 'मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य' और 'बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य' शामिल हैं। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यह मामला "दुर्लभतम से दुर्लभ" (Rarest of Rare) श्रेणी में आता है और उम्रकैद की सज़ा न्याय के उद्देश्यों को पूरा नहीं करेगी।

    फैसले में, जज दिवाकर ने अपना निर्णय समझाते हुए जनता से एक सीधा सवाल भी पूछा। उन्होंने लिखा कि वह "भारत के महान लोगों" से पूछना चाहते हैं कि अदालत को उस व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, जिसने एक महिला को ज़िंदा जला दिया हो, और क्या ऐसा व्यक्ति सहानुभूति का हकदार है।

    फिर उन्होंने जवाब दिया कि उनकी नज़र में ऐसा व्यक्ति सहानुभूति का हकदार नहीं है और सबसे बड़ी सज़ा, यानी मौत की सज़ा, ही उचित है।

    फैसले में मुज़फ़्फ़रनगर में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर अभियोजन पक्ष की दलीलों का भी ज़िक्र है।

    सरकारी वकील ने कहा कि अपराधियों के खिलाफ़ सख़्त कार्रवाई करने की उत्तर प्रदेश सरकार की नीति - जिसमें पुलिस एनकाउंटर, अपराधियों की संपत्ति ज़ब्त करना और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में लेना शामिल है - ने ज़िले में अपराध कम करने में योगदान दिया। जज दिवाकर ने दर्ज किया कि अदालत ने इस दलील को "सही" पाया।

    हालांकि, यूपी सरकार की इन नीतियों पर उनकी टिप्पणियां इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिकॉर्ड से मेल नहीं खातीं। पिछले कुछ महीनों में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस के एनकाउंटर और NSA के तहत हिरासत में लेने की घटनाओं की आलोचना की।

    अपने फैसले में, जज दिवाकर ने अपनी अदालत से 97 मामलों को वापस बुलाए जाने की भी आलोचना की।

    जज दिवाकर ने लिखा कि उन्हें पता है कि फाइलें क्यों वापस बुलाई गई थीं, लेकिन उन्होंने इस पर विस्तार से बात न करने का फैसला किया और कहा कि "कार्यालय की भी अपनी गरिमा होती है"। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इस फैसले का मकसद माफिया/गैंगस्टरों को राहत देना था। अपने फ़ैसले में उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें एक ऐसे व्यक्ति का मैसेज मिला था जिसने खुद को "पश्चिमी यूपी का माफिया या गैंगस्टर" बताया था।

    फ़ैसले के मुताबिक, उस व्यक्ति ने कहा कि अभी तो सिर्फ़ फ़ाइलें हटाई गईं और चेतावनी दी कि अगर जज दिवाकर ने इस मामले को आगे बढ़ाया या इस पर कोई टिप्पणी की तो उनकी कोर्ट बदली जा सकती है या उनका ज़िले से बाहर तबादला किया जा सकता है, क्योंकि उनकी "पहुंच बहुत ऊंचे स्तर तक है"।

    फ़ैसले में जज दिवाकर ने कहा कि ऐसी धमकियां उन्हें रोक नहीं पाएँगी और लिखा कि वे "कायर जज कहलाने के बजाय मरना पसंद करेंगे"।

    उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि फ़ैसले की एक कॉपी उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को भेजी जाए। उन्होंने कहा कि भविष्य में, जब गंभीर आपराधिक मामलों को एक कोर्ट से दूसरी कोर्ट में ट्रांसफ़र किया जाए तो ट्रांसफ़र से पहले ज़िला सरकारी वकील को राज्य का पक्ष रखने का मौका दिया जाना चाहिए।

    फ़ैसले में मामलों को वापस बुलाने और उससे जुड़े मुद्दों पर कई पन्ने हैं। साथ ही धर्म, नैतिकता और साहित्य पर भी चर्चा की गई, जिसमें आदम और हव्वा के वृत्तांत और लैला-मजनूँ और शीरीं-फ़रहाद की कहानियाँ शामिल हैं।

    7 सितंबर को सुनाई गई उनकी मौत की सज़ा इस चरण में अंतिम नहीं है। BNSS की धाराओं 407-412 के अनुसार, सेशंस कोर्ट द्वारा सुनाई गई मौत की सज़ा को अमल में लाने से पहले पुष्टि के लिए हाई कोर्ट में भेजना ज़रूरी है।

    जज दिवाकर नवंबर 2025 से मुज़फ़्फ़रनगर में तैनात हैं।

    इससे पहले, दिसंबर 2024 में बरेली में तैनात रहते हुए जज दिवाकर ने हिंदू महाकाव्य रामायण में भगवान राम और भरत के बीच निस्वार्थ प्रेम का ज़िक्र करते हुए संपत्ति के विवाद में एक पिता और उसके बेटे को पिता के भाई की हत्या के लिए मौत की सज़ा सुनाई थी।

    जज दिवाकर ने कहा था कि जहां भगवान राम के भाइयों लक्ष्मण और भरत ने महान त्याग और समर्पण की मिसाल पेश करते हुए भाई के तौर पर अपने फ़र्ज़ निभाए, वहीं दूसरी ओर आरोपियों के काम इस आदर्श के बिल्कुल विपरीत हैं।

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