तीसरे बच्चे के लिए माँ को मैटरनिटी लीव देने से इनकार करने पर मद्रास हाईकोर्ट ने क्या कहा?
LiveLaw Network
12 Jun 2026 9:00 AM IST

शाय निशा तमिलनाडु के विल्लुपुरम में ज़िला न्यायपालिका में काम करती हैं। जनवरी 2026 में उन्होंने अपनी तीसरी प्रेग्नेंसी के लिए मैटरनिटी लीव के लिए आवेदन किया। प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज ने उनका आवेदन खारिज कर दिया। इसका कारण 13 मार्च 2026 को तमिलनाडु मानव संसाधन प्रबंधन विभाग द्वारा जारी एक सरकारी आदेश था, जिसमें तीसरी प्रेग्नेंसी के लिए मैटरनिटी लीव को 12 हफ़्ते तक सीमित कर दिया गया। अपने पहले और दूसरे बच्चे के लिए उन्हें पूरी मैटरनिटी लीव मिलती। तीसरे बच्चे के लिए राज्य ने तय किया कि वह आधी छुट्टी की हकदार हैं।
28 अप्रैल 2026 को मद्रास हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच (जस्टिस आर. सुरेश कुमार और एन. सेंथिलकुमार) ने सरकारी आदेश रद्द किया, प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज को शाय निशा को पहली और दूसरी प्रेग्नेंसी की तरह ही मैटरनिटी लीव देने का निर्देश दिया और एक ऐसी बात कही, जो सामान्य परिस्थितियों में तो मामूली होती, लेकिन मौजूदा हालात में ज़रूरी थी: राज्य किसी महिला के बच्चों की गिनती करके मैटरनिटी सुरक्षा को सीमित नहीं कर सकता।
यह फ़ैसला अपने आप में महत्वपूर्ण होता, जो बात इसे खास बनाती है, वह है वह संस्थागत संदर्भ जिसमें यह आया।
राज्य को पता था। फिर भी उसने ऐसा किया।
जनवरी 2026 में उसी मद्रास हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच ने मैटरनिटी लीव से इनकार करने के ऐसे ही एक मामले को गलत ठहराया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि उसके आदेश को तमिलनाडु के सभी न्यायिक अधिकारियों के बीच प्रसारित किया जाए। दो महीने बाद मार्च 2026 में राज्य सरकार ने वही सरकारी आदेश जारी किया, जिसे कोर्ट ने समस्याग्रस्त बताया। इस सरकारी आदेश (GO) ने तीसरी प्रेग्नेंसी की मैटरनिटी लीव को 12 हफ़्ते तक सीमित कर दिया, जो सीधे तौर पर कोर्ट के जनवरी के निर्देश के विपरीत है।
मद्रास हाईकोर्ट ने अपने 28 अप्रैल के आदेश में इस घटनाक्रम का ज़िक्र किया। राज्य कानूनी स्थिति से अनजान नहीं था। उसने इसे नज़रअंदाज़ करने का फ़ैसला किया। सरकारी आदेश कोर्ट के फ़ैसले के बाद जारी किया गया, पहले नहीं। यह किसी अनजान नौकरशाही द्वारा पुराने नियम को लागू करने का मामला नहीं है। यह राज्य सरकार द्वारा एक नया आदेश जारी करने का मामला है, जिसके बारे में उसे पता था कि यह हाईकोर्ट के पुराने फ़ैसलों और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के खिलाफ़ है।
वह कानून, जिसे सरकारी आदेश ने नज़रअंदाज़ किया
मैटरनिटी बेनिफिट्स (प्रसूति लाभ) पर कानूनी स्थिति स्पष्ट है। कानून के तीन स्रोत एक ही नतीजे पर पहुंचते हैं। पहला, मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट, 1961 (जिसमें 2017 में संशोधन किया गया) के तहत पहले दो बच्चों के लिए 26 हफ़्ते की पेड मैटरनिटी लीव (सवैतनिक मातृत्व अवकाश) और उसके बाद के बच्चों के लिए 12 हफ़्ते की छुट्टी मिलती है। यह नियम उन संस्थानों पर लागू होता है, जो इस एक्ट के दायरे में आते हैं। सरकारी कर्मचारियों के मामले में सर्विस रूल्स (सेवा नियमों) में आमतौर पर दो बच्चों की कोई शर्त नहीं होती, क्योंकि सरकारी नौकरी की शर्तें उनके अपने नियमों से तय होती हैं, न कि मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट के खास प्रावधानों से।
दूसरा, 'सेक्रेटरी, स्टेट ऑफ़ कर्नाटक बनाम उमादेवी' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने सर्विस की शर्तों में भेदभाव न करने के सिद्धांत तय किए। मद्रास हाईकोर्ट ने 'शायी निशा' मामले में इसी फ़ैसले का सहारा लिया। साथ ही 'बी. रंजीता' और 'पी. मंगैयारकरासी' मामलों में डिवीज़न बेंच के दो पुराने फ़ैसलों का भी हवाला दिया। इन दोनों फ़ैसलों में कहा गया कि सरकारी कर्मचारियों के लिए मैटरनिटी लीव को प्रेग्नेंसी की संख्या के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।
तीसरा, संविधान के आर्टिकल 14, 21 और 42। आर्टिकल 14 भेदभाव को रोकता है। आर्टिकल 21 जीवन और सम्मान के अधिकार की रक्षा करता है और सुप्रीम कोर्ट ने लगातार माना है कि इसमें रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी (प्रजनन संबंधी स्वायत्तता) भी शामिल है। आर्टिकल 42 राज्य को निर्देश देता है कि वह काम के लिए उचित और मानवीय स्थितियां और मातृत्व राहत के प्रावधान करे।
तमिलनाडु सरकार के आदेश (GO) ने इन तीनों का उल्लंघन किया।
बड़ा पैटर्न: भारत का मैटरनिटी इंफ्रास्ट्रक्चर मातृत्व को सज़ा की तरह देखता है
शायी निशा का मामला कोई अकेला मामला नहीं है। यह एक ऐसे पैटर्न का हिस्सा है जिसमें भारतीय कानून और भारतीय संस्थान मातृत्व को अधिकार के बजाय एक रियायत (concession) मानते हैं। फिर उस रियायत को इस आधार पर सीमित करते हैं कि कोई महिला कितनी बार इसका इस्तेमाल करती है।
मद्रास हाईकोर्ट के फ़ैसले से छह हफ़्ते पहले सुप्रीम कोर्ट ने मातृत्व से जुड़ा एक और फ़ैसला सुनाया, जिस पर कम ध्यान दिया गया लेकिन जिसका महत्व उतना ही है। 17 मार्च, 2026 को जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की बेंच ने सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020 की धारा 60(4) रद्द की। इस धारा के तहत गोद लेने वाली माताओं को 12 हफ़्ते की मैटरनिटी लीव तभी मिलती थी जब गोद लिया गया बच्चा तीन महीने से कम उम्र का हो।
कोर्ट ने कहा कि मातृत्व सुरक्षा को बच्चे की उम्र से नहीं जोड़ा जा सकता। कोर्ट ने माना कि गोद लेने वाली माँ के भी वही अधिकार और ज़िम्मेदारियां होती हैं, जो एक बायोलॉजिकल माँ (जन्म देने वाली माँ) की होती हैं। इसी फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह पैटरनिटी लीव (पिता बनने पर मिलने वाली छुट्टी) को सोशल सिक्योरिटी बेनिफ़िट के तौर पर मान्यता देने का प्रावधान लाए। भारत में पैटरनिटी लीव के लिए कोई क़ानून नहीं है। सेंट्रल सिविल सर्विस रूल्स के तहत सरकारी कर्मचारियों को 15 दिन की पैटरनिटी लीव मिलती है। प्राइवेट सेक्टर पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। पैटरनिटी लीव न होने से यह धारणा और मज़बूत होती है कि बच्चों की देखभाल सिर्फ़ माँ की ज़िम्मेदारी है। इससे करियर के बीच में नौकरी छोड़ने का चलन बढ़ता है, जिसका नुकसान हर पेशे को उठाना पड़ता है, जिसमें वकालत का पेशा भी शामिल है, क्योंकि इससे महिलाएँ काम छोड़ देती हैं।
दो-बच्चों का नियम और उससे जुड़े संवैधानिक सवाल
तमिलनाडु सरकार का आदेश (GO) भारतीय राज्यों में नौकरी की शर्तों के ज़रिए दो-बच्चों का नियम लागू करने की एक व्यापक नीतिगत प्रवृत्ति को दिखाता है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में ऐसे कानून या नियम हैं, जो दो से ज़्यादा बच्चे वाले लोगों को पंचायत चुनाव लड़ने या कुछ सरकारी पदों पर रहने से रोकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 'जावेद बनाम हरियाणा राज्य' (2003) मामले में ऐसी पाबंदियों को सही ठहराया और माना कि ये राज्य की जनसंख्या नीति के अनुरूप हैं।
लेकिन सरकारी पद के लिए पात्रता की शर्तों और पहले से काम कर रही महिला कर्मचारी को मैटरनिटी बेनिफिट (मातृत्व लाभ) से वंचित करने के बीच एक संवैधानिक अंतर है। पहली बात उम्मीदवारी की एक शर्त है। दूसरी बात पहले से काम कर रही महिला से कार्यस्थल पर मिलने वाले अधिकार को छीनना है। मद्रास हाईकोर्ट ने यह अंतर अप्रत्यक्ष रूप से स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण पर राज्य के नीतिगत लक्ष्यों के बावजूद, यह सरकारी आदेश (GO) मैटरनिटी लीव (मातृत्व अवकाश) पर स्थापित कानूनी स्थिति को नहीं बदल सकता।
इस फैसले से यह सवाल उठता है कि क्या कोई राज्य मैटरनिटी बेनिफिट का इस्तेमाल जनसंख्या नीति के एक साधन के तौर पर कर सकता है। मद्रास हाईकोर्ट का जवाब है - नहीं। सुप्रीम कोर्ट इस सवाल पर सीधे तौर पर विचार करेगा या नहीं, यह देखना बाकी है, लेकिन दिशा साफ है: 2026 में न्यायपालिका मातृत्व को एक संवैधानिक अधिकार मान रही है, न कि नीतिगत साधन।
सरकारी नौकरी के दायरे से बाहर काम करने वाली महिलाओं के लिए इसका क्या मतलब?
शाय निशा एक सरकारी कर्मचारी हैं। उनके पास रिट याचिका दायर करने की संस्थागत हैसियत थी। वे मद्रास हाईकोर्ट तक पहुंच सकती थीं। वे जीत गईं।
ज़्यादातर भारतीय महिलाओं को ये सुविधाएं नहीं मिलतीं। मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट खुद ही दायरे में आने वाले संस्थानों में काम करने वाली महिलाओं के लिए तीसरे बच्चे के मामले में छुट्टी को 12 हफ़्ते तक सीमित करता है। असंगठित क्षेत्र की महिलाओं को, जो भारत की महिला कार्यबल का बड़ा हिस्सा हैं, मातृत्व से जुड़ी कोई सुरक्षा नहीं मिलती। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत हर माँ को 6,000 रुपये मिलते हैं। यह राशि 2013 में तय की गई थी और तब से इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है; असल में अब इसकी कीमत लगभग 3,400 रुपये है।
मद्रास हाईकोर्ट का फैसला शाय निशा को सुरक्षा देता है। यह तिरुपुर में गारमेंट वर्कर, चेन्नई में घरेलू कामगार या तंजावुर में खेतिहर मज़दूर को सुरक्षा नहीं देता। कोर्ट ने जो संवैधानिक सिद्धांत बताया कि बच्चों की संख्या के आधार पर मैटरनिटी प्रोटेक्शन (मातृत्व सुरक्षा) को सीमित नहीं किया जा सकता, उसे उन महिलाओं तक पहुंचाने का कोई संस्थागत तरीका नहीं है, जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।
जैसा कि मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है, हर प्रेग्नेंसी में तकलीफ़ एक जैसी ही होती है। इसलिए कानून भी सबके लिए एक जैसा होना चाहिए।
लेखक- भव्य राजश्री दिल्ली हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाली वकील और LawSarathi.in की को-फ़ाउंडर हैं। आदित्य अशोक गवर्नमेंट एडवाइज़री में पब्लिक पॉलिसी कंसल्टेंट हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

