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कोर्ट रूल्स एवं आरटीआई : सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सूचना का अधिकार कमजोर हुआ

LiveLaw News Network
14 March 2020 4:00 AM GMT
कोर्ट रूल्स एवं आरटीआई : सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सूचना का अधिकार कमजोर हुआ
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शैलेष गांधी

आरटीआई कानून पर कोर्ट रूल्स को अधिक महत्व दिये जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सूचना के अधिकार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने 'मुख्य सूचना आयुक्त बनाम गुजरात हाईकोर्ट' के मामले में चार मार्च 2020 को एक फैसला सुनाया है। इसका नागरिकों के सूचना के अधिकार (आरटीआई) के मौलिक अधिकार पर बहुत बुरा असर होगा। कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि यदि कोई नागरिक न्यायिक कार्यवाही से संबंधित कोई दस्तावेज हासिल करना चाहता है तो वह आरटीआई के जरिये इसे हासिल नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट और सभी हाईकोर्ट के लिए कार्यवाही से संबंधित कुछ नियम हैं। ज्यादातर न्यायालयों में एक नियम है जिसके तहत किसी मुकदमे के पक्षकार उस मुकदमे से संबंधित प्रतियां हासिल कर सकते हैं। कोई व्यक्ति उस मुकदमे से जुड़ा नहीं भी है, फिर भी उसे उस मुकदमे से संबंधित प्रतियां मुहैया करायी जा सकती है, बशर्ते वह एक हलफनामा दायर करके सूचना प्राप्त करने की वजह बताये। यदि कोर्ट उन वजहों से संतुष्ट होता है तो गैर-पक्षकार को भी जानकारियां उपलब्ध करायी जाती हैं।

यह उस मूल प्रस्तावना का उल्लंघन है जिनके अनुसार सरकार में सभी जानकारियां नागरिकों की होती हैं और उनतक पहुंचना उनका अधिकार होता है।

सूचना का अधिकार अर्थात आरटीआई को संविधान के अनुच्छेद 19(एक)(ए) के तहत नागरिकों के मौलिक अधिकार के रूप में मंजूर किया गया है। इसके तहत अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार, सूचना का प्रसार और सूचना का अधिकार शामिल है। एक नागरिक को इन अधिकारों के इस्तेमाल के लिए कोई कारण बताने की जरूरत नहीं होती है और संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत इन पर कुछ तार्किक प्रतिबंध लगाये जा सकते हैं। इसी के मद्देनजर, आरटीआई एक्ट की धारा आठ में कुछ खास मामलों में जानकारी उपलब्ध न कराने की छूट दी गयी है और केवल इन्ही अपवादों के आधार पर ही नागरिकों को सूचना देने से इन्कार किया जा सकता है।

यह सुनिश्चित करने के लिए कि जनता को सूचना देने से इन्कार करने के लिए अन्य कानूनों एवं अवरोधों का इस्तेमाल न किया जा सके, संसद ने खुद कानून की धारा 22 में गैर-अवरोधक व्यवस्था की है :-

"भले ही सरकारी गोपनीयता कानून, 1923 और कुछ समय के लिए लागू कोई अन्य कानून या आरटीआई अधिनियम से इतर किसी भी कानून में कुछ असंगत भी होता है फिर भी आरटीआई अधिनियम के प्रावधान प्रभावी होंगे।"

इसका साफ अर्थ है कि जहां तक आरटीआई से सूचना उपलब्ध कराने की बात है तो आरटीआई कानून सरकारी गोपनीयता कानून सहित सभी कानूनों एवं नियमों से ऊपर होगा। इसका मतलब यह नहीं है कि सरकारी गोपनीयता कानून या अन्य अधिनियम समाप्त हो चुके हैं। आरटीआई एक्ट के तहत जब कोई सूचना मांगी जाती है तो इसे तभी उपलब्ध कराने से मना किया जा सकता है जब ऐसा करना इस कानून में छूट के प्रावधानों के तहत उचित हो। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में स्पष्ट तौर पर यह नहीं बताया गया है कि उसने यह कैसे निष्कर्ष निकाल लिया कि सुप्रीम कोर्ट एवं हाईकोर्ट के फैसले आरटीआई एक्ट के असंगत नहीं हैं। इसके बजाय, कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला है कि यदि कोई कानून या नियम सूचना उपलब्ध कराने का प्रावधान करता है तो उसे आरटीआई कानून के अनुरूप माना जायेगा।

यह स्पष्ट तौर पर त्रुटिपूर्ण है। कोर्ट को अदालती नियमों से संबंधित निम्नलिखित विसंगतियां पर ध्यान देना चाहिए था:-

आरटीआई एक्ट में जानकारी हासिल करने वाले के 'लोकस' की आवश्यकता नहीं होती, जबकि कोर्ट रूल्स 'लोकस' के मामले में भेदभाव करते हैं।

आरटीआई में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सूचना मांगने के लिए कोई कारण बताने की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन कोर्ट रूल्स में गैर-पक्षकार को जानकारी हासिल करने की वजह बताने के लिए हलफनामा दायर करने की आवश्यकता होती है।

यदि जानकारी हासिल करने के लिए उचित कारण नहीं बताया जाता है तो जानकारी नहीं उपलब्ध करायी जा सकती है। आरटीआई के तहत जानकारी देने से तभी इन्कार किया जा सकता है जब वह जानकारी धारा आठ या नौ की छूट के तहत आती हो।

कोर्ट रूल्स के मामले में स्वतंत्र सूचना आयोग के समक्ष अपील के प्रावधान नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय आरटीआई एक्ट को बुरी तरह से नष्ट कर सकता है। विभिन्न सरकारी प्राधिकरण जानकारी उपलब्ध कराने को लेकर खुद के रूल्स बनाकर आरटीआई एक्ट को अप्रासंगिक बना सकते हैं। इस निर्णय से एक और मूल प्रस्तावना का उल्लंघन होता है कि यदि किसी कार्य के लिए एक से अधिक उपाय हैं तो यह नागरिक की इच्छा पर निर्भर करेगा कि वह कौन सा उपाय इस्तेमाल करना चाहेगा।

यह ध्यान देने योग्य बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने 'सीआईटी बनाम ए. रमण एंड कंपनी (1968) 67आईटीआर 11 (एससी)' मामले में निम्न टिप्पणी की थी, जिसे बाद में 'सीआईटी बनाम कलकत्ता डिस्काउंट कंपनी लिमिटेड (1973) 91 आईटीआर 8 (एससी)' तथा बाद में 'भारत सरकार बनाम आजादी बचाओ आंदोलन (2003) 263 आईटीआर 706 (एससी)' मामले में भी बरकरार रखा गया था :-

"कर प्रभार को कम करने वाले वाणिज्यिक उपयों को सुव्यवस्थित करके करदेयता से बचना निषिद्ध नहीं है। एक करदाता अपनी आय के सकल निर्धारण से पहले उस आय को डायवर्ट करने के लिए कोई उपाय कर सकता है। उस उपाय की प्रभाविता नैतिकता पर नहीं, बल्कि आयकर कानून के अमल पर निर्भर करती है। अर्थदंड के जोखिम के अलावा, कर कानूनों में विधायी निषेधाज्ञा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता, लेकिन उसे कानूनी रूप से नाकाम बनाया जा सकता है।"

इसलिए, भले ही सरकार को राजस्व घाटा क्यों न हो, तब भी सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि व्यक्तिगत करदाता को अपनी कर देयता कम करने के लिए उस हद तक वाणिज्यिक उपाय करने की आजादी है जहां तक वह उपाय कानून के दायरे में हो। तुलनात्मक व्याख्या से निश्चित तौर पर यह निष्कर्ष निकलता है कि नागरिक को वह तरीका अपनाने की आजादी दी जानी चाहिए जिसके जरिये वह आसानी से एवं त्वरित जानकारी हासिल कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कई मौकों पर व्यवस्था दी है कि सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों का दायित्व है कि वह सभी कानूनों का अक्षरश: पालन करते हुए आदर्श नियोक्ता बने। सुप्रीम कोर्ट से विनम्र अपील है कि उसे आरटीआई कानून 2005 के प्रावधानों का सही मायनों में अक्षरश: पालन करने में रोल मॉडल बनकर दिखाना चाहिए तथा पादर्शिता के मामले में अपने नक्शे कदम पर चलने के लिए सार्वजनिक प्राधिकरणों को प्रेरित करना चाहिए। यह निश्चित तौर पर नागरिकों के सूचना के मौलिक अधिकार की बेहतर डिलीवरी सक्षम करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति और प्रकाशन की आजादी के लिए अनुच्छेद 19(1)(a) के दायरे को लगातार व्यापक बनाया है। हमें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट आरटीआई को असंगत नहीं बनायेगा।

(लेखक पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त हैं। ये विचार उनके निजी हैं)

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