न्यायिक सुधारों से लुप्त होता कोर्ट कल्चर

  • न्यायिक सुधारों से लुप्त होता कोर्ट कल्चर

    भारत में न्यायिक सुधार को सिर्फ़ खाली पदों, इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी तक सीमित नहीं किया जा सकता। ये चीज़ें ज़रूरी हैं, लेकिन अदालतों की रोज़मर्रा की संस्कृति ही यह तय करती है कि औपचारिक सुधारों से लोगों की पहुँच, काम की गुणवत्ता और भरोसे में असल में सुधार होता है या नहीं।

    भारत में न्यायिक सुधार पर बहस की शुरुआत आम तौर पर लंबित मामलों से होती है। यह बात समझ में आती है। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड से पता चलता है कि ज़िला और तालुका अदालतों पर काम का बहुत ज़्यादा बोझ है, जहां लाखों मामले 10 साल से भी ज़्यादा समय से लंबित पड़े हैं। इससे यह भी पता चलता है कि मामलों के मासिक निपटारे के दौरान नए मामलों के आने और उनके निपटारे के बीच लगातार एक बड़ा अंतर बना रहता है।

    इसका आम स्पष्टीकरण वही पुराना है: जजों, कोर्टरूम, कर्मचारियों, पैसों या डिजिटल सिस्टम की कमी है। ये सभी असल बाधाएं हैं। ई-कोर्ट्स चरण III परियोजना, जिसे 7,210 करोड़ रुपये के बजट वाली चार साल की 'केंद्रीय क्षेत्र योजना' के तौर पर मंज़ूरी दी गई, यह दिखाती है कि सरकार न्याय व्यवस्था में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत को पहचानती है।

    हालांकि, एक मुश्किल सवाल अब भी बना हुआ है। एक जैसे कानूनों और प्रक्रियाओं के तहत काम करने वाली अलग-अलग अदालतों के रोज़मर्रा के कामकाज में इतना फ़र्क क्यों होता है? ऐसा क्यों है कि एक अदालत परिसर दूसरे के मुक़ाबले ज़्यादा व्यवस्थित, अनुमान लगाने लायक और लोगों के लिए ज़्यादा सुलभ लगता है? ऐसा क्यों है कि कुछ जगहों पर टेक्नोलॉजी से काम बेहतर होता है, जबकि दूसरी जगहों पर उसका ठीक से इस्तेमाल ही नहीं हो पाता? ऐसा क्यों है कि एक ही प्रक्रियात्मक कानून, मुक़दमा लड़ने वालों, वकीलों और कर्मचारियों के लिए अलग-अलग तरह के अनुभव पैदा करता है?

    इसका एक जवाब 'अदालती संस्कृति' में छिपा है।

    'अदालती संस्कृति' महज़ एक सजावटी शब्द नहीं है। इसका मतलब उन स्वीकृत दिनचर्याओं, काम से जुड़े मूल्यों, अनौपचारिक नियमों और व्यवहारिक तौर-तरीकों से है, जिनके आधार पर अदालतें असल में काम करती हैं। औपचारिक कानून अदालतों को यह बताता है कि उन्हें क्या करना है; जबकि अदालती संस्कृति यह तय करती है कि उन्हें वह काम कैसे करना है। इसका असर समय की पाबंदी, फ़ाइलों के लेन-देन, मामलों की सूची बनाने के तरीकों, आपसी बातचीत, सुनवाई टालने के रवैये, कर्मचारियों की तत्परता, टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल, मुक़दमा लड़ने वालों के प्रति संवेदनशीलता और हर कार्य दिवस को कितनी गंभीरता से लिया जाता है—इन सभी बातों पर पड़ता है।

    भारतीय विधि आयोग ने 2009 में ही इस चिंता को पहचान लिया था। उस समय आयोग ने यह टिप्पणी की थी कि काम करने की संस्कृति में आम तौर पर गिरावट आई है और न्यायपालिका भी इससे अछूती नहीं रही है। इस मुद्दे पर एक बार फिर से ध्यान दिए जाने की सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि आजकल न्यायिक सुधार की पूरी बहस खाली पदों, मामलों के आंकड़ों और डिजिटल बदलावों के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है। ये सभी चीज़ें ज़रूरी तो हैं, लेकिन ये किसी भी अदालत के कामकाज की पूरी तस्वीर पेश नहीं कर पातीं।

    अदालत महज़ एक कानूनी मंच ही नहीं है, बल्कि यह अपने आप में एक संस्था भी है। इसमें लोग होते हैं, उनकी अलग-अलग भूमिकाएं होती हैं, काम करने की तय दिनचर्याएँ होती हैं, संसाधन होते हैं, काम के लिए प्रोत्साहन मिलते हैं। साथ ही इसमें काम करने के कुछ अनौपचारिक तौर-तरीके भी शामिल होते हैं। जज, वकील, कोर्ट स्टाफ़, सरकारी वकील, पुलिस अधिकारी और मुक़दमेबाज़ अलग-थलग होकर काम नहीं करते। उनके व्यवहार का आपस में रोज़ाना तालमेल होता है। इस तालमेल की वजह से अक्सर देरी, उलझन और अविश्वास पैदा होता है।

    इसीलिए न्यायिक सुधार में कोर्ट कल्चर को एक मापने लायक चीज़ बनाया जाना चाहिए।

    उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की निचली अदालतों पर अपने डॉक्टोरल रिसर्च में कोर्ट कल्चर को कोर्ट की खासियतों और काम करने के तरीकों के कुल जोड़ के तौर पर समझा गया। इसे दो पैमानों पर मापा गया: प्रोफ़ेशनलिज़्म और मैकियावेलियनिज़्म। प्रोफ़ेशनलिज़्म का मतलब था अनुशासन, काम के मूल्यों का पालन करना और मुक़दमे से जुड़े लोगों के सबसे अच्छे हित में काम करना। मैकियावेलियनिज़्म का मतलब था काम करवाने के लिए हेर-फेर करना, धोखा देना और सही जानकारी छिपाना।

    इसके नतीजे संस्थागत तौर पर काफ़ी अहम थे। कोर्ट कल्चर का कोर्ट के कामकाज से एक अहम और सकारात्मक रिश्ता था। प्रोफ़ेशनलिज़्म का कोर्ट के कामकाज से सकारात्मक रिश्ता था, जबकि मैकियावेलियनिज़्म का उससे नकारात्मक रिश्ता था। कोर्ट के कामकाज को खुद न्याय तक पहुँच, न्यायिक गतिविधियों की गुणवत्ता और जनता के भरोसे के आधार पर मापा गया।

    यह इसलिए मायने रखता है, क्योंकि ज़्यादातर सार्वजनिक चर्चाओं में कोर्ट के कामकाज को सिर्फ़ मुक़दमों के निपटारे की समस्या के तौर पर देखा जाता है। निपटारा ज़रूरी है। जो व्यवस्था मुक़दमों का फ़ैसला एक सही समय-सीमा के अंदर नहीं कर पाती, वह असरदार तरीके से न्याय नहीं दे सकती। हालांकि, सिर्फ़ निपटारे से ही कोर्ट के कामकाज का पूरा मतलब नहीं निकल जाता। एक कोर्ट को सुलभ, निष्पक्ष, पारदर्शी, व्यवस्थित, संवेदनशील और भरोसेमंद भी होना चाहिए।

    कोर्ट के कामकाज को मापने के लिए अक्सर निपटारे की दर और लंबित मुक़दमों (बैकलॉग) जैसे आंकड़ों पर ही भरोसा किया जाता रहा है। मेरा रिसर्च यह बताता है कि ये पैमाने न्याय तक पहुँच, जनता का भरोसा, आज़ादी और न्यायिक गतिविधियों की गुणवत्ता जैसे गुणात्मक पहलुओं को पूरी तरह से नहीं दर्शा पाते। यह आंकड़ों के ख़िलाफ़ कोई तर्क नहीं है। बल्कि, यह बेहतर आँकड़ों के पक्ष में दिया गया एक तर्क है।

    अदालत भले ही अधिक मामलों का निपटारा करे, फिर भी आम वादियों के लिए प्रक्रिया समझना मुश्किल हो सकता है। वादी को अंतिम आदेश मिल सकता है, लेकिन पूरी प्रक्रिया के दौरान वह भ्रमित रह सकता है। डिजिटल केस-स्टेटस सिस्टम मौजूद हो सकता है, लेकिन यदि जानकारी को ठीक से अपडेट नहीं किया जाता है तो पारदर्शिता का वादा अधूरा रह जाता है। अदालत की इमारत में सुधार किया जा सकता है, लेकिन यदि कर्मचारियों का व्यवहार, अनुशासन और संचार कमजोर रहता है तो न्याय तक पहुंच सीमित रहती है।

    अदालती संस्कृति यह भी समझाती है कि केवल संसाधन ही एक समान परिणाम क्यों नहीं देते। मेरे शोध में पाया गया कि अदालती संसाधनों, जिनमें भौतिक अवसंरचना, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी अवसंरचना और मानव संसाधन शामिल हैं, का अदालती प्रदर्शन के साथ महत्वपूर्ण सकारात्मक संबंध है। इसमें यह भी पाया गया कि अदालती संसाधन अदालती संस्कृति और अदालती प्रदर्शन के बीच के संबंध को नियंत्रित करते हैं।

    सरल शब्दों में, बेहतर संसाधन अदालतों को बेहतर प्रदर्शन करने में मदद करते हैं, लेकिन इनका प्रभाव तब अधिक मजबूत होता है जब कार्य संस्कृति पेशेवर कामकाज का समर्थन करती है। कंप्यूटर, केस-सूचना प्रणाली और डिजिटल रिकॉर्ड तभी उपयोगी होते हैं, जब लोग उनका सावधानीपूर्वक उपयोग करते हैं। अधिक कर्मचारी तभी मददगार होते हैं जब भूमिकाएं स्पष्ट हों, प्रशिक्षण पर्याप्त हो और जवाबदेही वास्तविक हो। अवसंरचना तभी पहुंच में सुधार करती है जब अदालत के उपयोगकर्ता को अधिकारों के धारक भागीदार के रूप में माना जाता है, न कि असुविधा के रूप में।

    राष्ट्रीय न्यायालय प्रबंधन प्रणाली (NCMS) पहल इस बात को भी दर्शाती है कि न्यायालयों को ऐसे संस्थानों के रूप में देखा जाना चाहिए, जिन्हें प्रबंधन, डेटा, योजना और मानव संसाधन प्रणालियों की आवश्यकता होती है। सुप्रीम कोर्ट के NCMS पृष्ठ पर न्यायालय प्रबंधन कार्य के अंतर्गत नीति और कार्य योजनाएं, केस प्रबंधन प्रणालियां, मानव संसाधन विकास रणनीति और न्यायालय उत्कृष्टता के लिए राष्ट्रीय ढांचा सूचीबद्ध हैं। सुधार प्रक्रिया में न्यायालय संस्कृति मूल्यांकन को शामिल करके इस दिशा को और अधिक सुदृढ़ किया जाना चाहिए।

    इस प्रकार के मूल्यांकन से न्यायिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। इसमें निर्णयों की सत्यता का मूल्यांकन नहीं किया जाना चाहिए और न ही जजों पर व्यक्तिगत मामलों के परिणामों को लेकर दबाव डाला जाना चाहिए। इसका ध्यान प्रशासनिक और प्रक्रियात्मक अनुभव पर केंद्रित होना चाहिए: समय की पाबंदी, सूचना की स्पष्टता, सम्मानजनक व्यवहार, अभिलेखों का स्थानांतरण, डिजिटल अद्यतन, केस-प्रवाह प्रक्रियाएं, वादियों के साथ संचार, कर्मचारियों का प्रशिक्षण और उपयोगकर्ता की प्रक्रिया को समझने की क्षमता।

    हाईकोर्ट जिला स्तर पर आवधिक न्यायालय संस्कृति सर्वेक्षणों से शुरुआत कर सकते हैं। इन सर्वेक्षणों में वकील, न्यायालय कर्मचारी और वादी शामिल होने चाहिए। प्रश्न स्पष्ट होने चाहिए। क्या केस स्थिति अद्यतन विश्वसनीय हैं? क्या केस सूचियां पूर्वानुमानित हैं? क्या स्थगन की व्याख्या की जाती है? क्या वादियों के साथ गरिमापूर्ण व्यवहार किया जाता है? क्या मध्यस्थों पर अनावश्यक निर्भरता के बिना जानकारी उपलब्ध है? क्या डिजिटल प्रणालियों का उपयोग नियमित कार्य उपकरणों के रूप में किया जा रहा है या केवल औपचारिक अनुपालन के रूप में? क्या अदालत परिसर महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगजनों के लिए सुरक्षित और सुलभ हैं?

    इन परिणामों का उपयोग अदालतों को बदनाम करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। इनका उपयोग निदान के लिए किया जाना चाहिए। जिन अदालतों में डिजिटल अपेडट की कमी है, उन्हें कर्मचारियों के प्रशिक्षण की आवश्यकता हो सकती है। जिन अदालतों में उपयोगकर्ता अनुभव खराब है, उन्हें बेहतर सूचना काउंटरों की आवश्यकता हो सकती है।

    अदालती कर्मचारियों को प्रौद्योगिकी और सार्वजनिक संपर्क में संरचित प्रशिक्षण की आवश्यकता है। बार एसोसिएशनों को उन प्रथाओं का सामना करना चाहिए, जो स्थगन और प्रक्रियात्मक भ्रम को सामान्य बनाती हैं। समय पर न्याय की कीमत पर इन्हें नियमित मुकदमेबाजी रणनीतियों के रूप में नहीं छोड़ा जा सकता।

    उद्देश्य किसी एक पक्ष को दोष देना नहीं है। देरी अक्सर प्रणालीगत होती है। जज भारी कार्यभार के तहत काम करते हैं। वकील, अदालत के कर्मचारी, वादी, पुलिस और अभियोजन पक्ष सभी अदालतों के कामकाज को प्रभावित करते हैं। संस्कृति-आधारित दृष्टिकोण सहायक होता है, क्योंकि यह अदालत को एक पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखता है, न कि केवल जज-केंद्रित संस्था के रूप में।

    यह दृष्टिकोण सार्वजनिक विश्वास की भी रक्षा करता है। अदालतें कानून के अनुसार निर्णय लेने के कारण अधिकार रखती हैं। हालांकि, नागरिक उस अधिकार का अनुभव प्रक्रिया के माध्यम से करते हैं। यदि प्रक्रिया अपारदर्शी, डरावनी, खर्चीली और अनिश्चित है तो निर्णय से पहले ही विश्वास कमजोर हो जाता है। यदि प्रक्रिया अनुशासित, सम्मानजनक और समझने योग्य हो तो प्रतिकूल परिणाम आने पर भी विश्वास कायम रह सकता है।

    इसलिए भारत में न्यायिक सुधार की चर्चा को संकीर्ण लंबित मामलों के दायरे से हटकर प्रदर्शन के दायरे में ले जाना होगा। लंबित मामले पूछते हैं: कितने मामले लंबित हैं? प्रदर्शन एक व्यापक प्रश्न पूछता है: न्याय तक पहुंच, गुणवत्ता, समयबद्धता और विश्वास के माध्यम से न्यायालय न्याय प्रदान करने में कितना सक्षम है?

    न्यायिक सुधार के अगले चरण में तीन ऑडिट शामिल होने चाहिए: रिक्तियों का ऑडिट, संसाधनों का ऑडिट और संस्कृति का ऑडिट। पहला ऑडिट हमें बताता है कि क्या पर्याप्त जज और कर्मचारी उपलब्ध हैं। दूसरा ऑडिट हमें बताता है कि क्या न्यायालयों के पास पर्याप्त भवन, प्रौद्योगिकी और सहायक प्रणालियां हैं। तीसरा ऑडिट हमें बताता है कि क्या न्यायालय की दैनिक कार्यप्रणाली इन संसाधनों को न्याय में परिवर्तित करती है।

    तीसरे ऑडिट के बिना पहले दो ऑडिट अधूरे रह जाएंगे।

    एक नागरिक न्यायिक सुधार का अनुभव केवल स्वीकृत संख्या या परियोजना व्यय के माध्यम से नहीं करता है। वह इसका अनुभव तब करता है जब उसके मामले की जानकारी स्पष्ट हो, उसकी उपस्थिति का सम्मान किया जाए, फाइल का पता लगाया जा सके, सूचीबद्ध मामले की सार्थक प्रगति हो, न्यायालय अनुशासन के साथ कार्य करे और प्रक्रिया उसे संस्था पर विश्वास करने का कारण दे।

    इसलिए न्यायालय की संस्कृति कोई मामूली मुद्दा नहीं है। यह एक प्रदर्शन कारक है। यह निर्धारित करता है कि क्या कानूनी नियम, सार्वजनिक धन और डिजिटल प्रणालियां व्यवहार में न्याय का रूप लेती हैं।

    लेखक- डॉ. दिनेश कुमार जांगरा कार्य के भविष्य के विषय में प्रोफेसर हैं और एक सैन्य अनुभवी हैं। ये विचार उनके व्यक्तिगत हैं।

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