भारत में बाल विवाह: विवाह को मान्यता, लेकिन नाबालिग पत्नी से यौन संबंध को अपराध मानने का कानूनी विरोधाभास

Dr Kavita Surbhi

13 July 2026 4:29 PM IST

  • भारत में बाल विवाह: विवाह को मान्यता, लेकिन नाबालिग पत्नी से यौन संबंध को अपराध मानने का कानूनी विरोधाभास

    भारत में बाल विवाह को नियंत्रित करने वाला वैधानिक ढांचा एक गंभीर ढांचागत अंतर्विरोध (Structural Contradiction) से ग्रसित है। एक तरफ, हमारा दीवानी कानून (Civil Law) बाल विवाह को पूर्णतः शून्य (Void) न मानकर उसे तब तक वैध मानता है जब तक कि उसे निरस्त न करा दिया जाए। दूसरी तरफ, हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली (Criminal Justice System) उसी विवाह के उपभोग (Consummation) को एक गंभीर अपराध मानती है। यह विधिक विसंगति लाखों नाबालिगों को एक ऐसे कानूनी शून्य (Legal Vacuum) में धकेल देती है जहाँ वे राज्य की नजर में तो विवाहित हैं, परंतु कानून के वास्तविक संरक्षण से वंचित हैं।

    राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-21) के अनुसार, भारत में 20-24 वर्ष की 23.3 प्रतिशत महिलाओं का विवाह अठारह वर्ष की आयु से पहले ही हो गया था। पश्चिम बंगाल, बिहार और त्रिपुरा जैसे राज्यों के कुछ हिस्सों में यह आंकड़ा 40 प्रतिशत से भी अधिक है। कड़े दंडात्मक प्रावधानों के बावजूद इन आंकड़ों का बने रहना हमारी विधायी और प्रवर्तन संरचना (Legislative and Enforcement Architecture) की बुनियादी खामियों को उजागर करता है। कोई भी सुसंगत विधिक दर्शन (Coherent Legal Philosophy) एक ही समय में किसी विवाह की वैधानिक वैधता का बचाव नहीं कर सकता, जबकि उसके वास्तविक उपभोग को एक वैधानिक अपराध मानता हो।

    वैधानिक टकराव: बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA) बनाम पोक्सो (POCSO)

    इस प्रणालीगत विफलता की जड़ बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 (PCMA) की धारा 3 में निहित है। विधायिका ने बाल विवाह को शुरुआत से ही 'शून्य' (Void ab initio) घोषित नहीं किया। इसके बजाय, ऐसे विवाहों को केवल 'शून्यकरणीय' (Voidable) श्रेणी में रखा गया है। इसके तहत वयस्क होने के बाद (18 वर्ष पूरे होने पर) नाबालिग को अदालत में याचिका दायर करने के लिए केवल दो वर्ष की सीमित अवधि मिलती है। जब तक यह न्यायिक उपाय नहीं किया जाता, तब तक वह विवाह दीवानी कानून के तहत पूर्णतः वैध रहता है।

    यह दीवानी वैधता, यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO) के तहत स्थापित आपराधिक कानूनी ढांचे के सीधे टकराव में खड़ी है। इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ (2017) के ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि 18 वर्ष से कम आयु की बालिका के साथ विवाह के भीतर भी किया गया संभोग 'यौन हमला' (Penetrative Sexual Assault) है, जिसके लिए न्यूनतम 10 वर्ष के कारावास का प्रावधान है।

    यह स्थिति कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए विरोधाभासी आदेश पैदा करती है। राज्य एक वैवाहिक स्थिति को नागरिक मान्यता तो देता है, लेकिन उस स्थिति के लिए आवश्यक शारीरिक कृत्य को गंभीर अपराध घोषित करता है। यह विधिक विसंगति (Juridical Dissonance) कोई तकनीकी त्रुटि नहीं है, बल्कि एक नीतिगत विफलता है जो पीड़ित बच्चियों को विधिक सुरक्षा से वंचित करती है।

    'सेवा' (SEVA 2024) मामले में न्यायिक संयम

    पिछले वर्ष सर्वोच्च न्यायालय ने सेवा (SEVA) बनाम भारत संघ (2024) मामले में प्रवर्तन मशीनरी को मजबूत करने के लिए व्यापक निर्देश जारी किए। न्यायालय ने बाल विवाह को "सहमति और कानूनी क्षमता के विपरीत एक विरोधाभास" (Oxymoron) माना और बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारियों (CMPOs) के लिए अनिवार्य प्रशिक्षण का आदेश दिया।

    हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय इस बुनियादी कानूनी अंतर्विरोध को पूरी तरह हल करने से पीछे हट गया। न्यायालय ने यह तो माना कि पीड़ितों पर निर्भर प्रवर्तन प्रणाली (Victim-dependent Enforcement) पूरी तरह विफल रही है, लेकिन उन्होंने एक संस्थागत संयम (Institutional Restraint) बनाए रखा। न्यायालय का मानना था कि व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) के परे जाकर बाल विवाह को पूर्णतः शून्य घोषित करना संसद के विधायी क्षेत्राधिकार का मामला है।

    'सोशल एंड रूरल रिसर्च इंस्टीट्यूट' के आंकड़े बताते हैं कि बाल विवाह का शिकार होने वाली 1% से भी कम लड़कियों को यह पता होता है कि PCMA की धारा 3 उन्हें विवाह निरस्त करने का अधिकार देती है। एक सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर मौजूद नाबालिग लड़की से यह उम्मीद करना कि वह 18 साल के बाद दो साल की समय-सीमा के भीतर अदालत का दरवाजा खटखटाएगी, एक अव्यावहारिक कानूनी उपाय है।

    'शून्य घोषित करने' (Void Ab Initio) की अनिवार्यता

    PCMA में संशोधन करके बाल विवाह को शुरुआत से ही 'शून्य' (Void ab initio) घोषित करने से यह दीवानी और आपराधिक कानून का टकराव तुरंत समाप्त हो जाएगा। यदि कानून की नजर में विवाह का कोई अस्तित्व ही नहीं होगा, तो पोक्सो (POCSO) के संरक्षण से बचने के लिए किसी वैवाहिक स्थिति का दावा नहीं किया जा सकेगा। कानून स्वचालित रूप से कार्य करेगा, और पीड़िता पर मुकदमेबाजी का बोझ नहीं रहेगा।

    यह सुधार वैश्विक विधायी रुझानों के अनुरूप है। वर्ष 2022 में इंग्लैंड और वेल्स ने 'विवाह और नागरिक भागीदारी (न्यूनतम आयु) अधिनियम' लागू करके नाबालिगों के विवाह को पूरी तरह अमान्य और संदंभात्मक रूप से अपराध घोषित कर दिया। जर्मनी ने भी 2017 में अपने नागरिक संहिता में संशोधन करके यही व्यवस्था लागू की। 'सिडा' (CEDAW) के अनुच्छेद 16(2) में स्पष्ट निर्देश है कि बच्चे के विवाह का 'कोई कानूनी प्रभाव नहीं होगा'। भारत की वर्तमान 'शून्यकरणीय' (Voidable) व्यवस्था इस अंतरराष्ट्रीय मानक का उल्लंघन करती है।

    राजनीतिक जड़ता बनाम संवैधानिक नैतिकता

    भारत के विधि आयोग (Law Commission of India) ने 2008 में ही बाल विवाह को पूर्णतः शून्य घोषित करने की सिफारिश की थी। इसके बावजूद 17 वर्षों की विधायी निष्क्रियता का कारण कानूनी जटिलता नहीं, बल्कि राजनीतिक संवेदनशीलता है। न्यूनतम आयु का कोई भी सार्वभौमिक नियम सीधे तौर पर व्यक्तिगत कानूनों (विशेष रूप से मुस्लिम पर्सनल लॉ) को प्रभावित करता है, जिससे यह मुद्दा समान नागरिक संहिता (UCC) के राजनीतिक विवादों में उलझ जाता है।

    इस लेख में व्यक्त विचार एवं मत लेखक के निजी हैं। इनका प्रकाशक, संपादक या संस्थान के आधिकारिक विचारों या नीतियों से आवश्यक रूप से कोई संबंध नहीं है।परंतु, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) के सिद्धांतों के तहत नवतेज सिंह जौहर (2018) से लेकर सेवा (2024) तक बार-बार स्पष्ट किया है—कोई भी सामुदायिक प्रथा या धार्मिक संहिताओं को मौलिक अधिकारों के ऊपर प्राथमिकता नहीं दी जा सकती। बाल विवाह को पूर्णतः शून्य करने की मांग संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 (समानता, गैर-भेदभाव और जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) पर आधारित है। राजनीतिक असुविधा के आधार पर इन मौलिक अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता।

    राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) ने 2022 में PCMA के तहत केवल 1,050 मामले दर्ज किए। लाखों बाल विवाहों की जमीनी हकीकत के सामने यह आंकड़ा केवल कम रिपोर्टिंग नहीं दिखाता, बल्कि यह साबित करता है कि वर्तमान कानूनी प्रवर्तन मॉडल पूरी तरह से निष्क्रिय हो चुका है। दीवानी कानून के तहत विवाह को वैध रखकर आपराधिक कानून के जरिए डर पैदा करने की नीति पूरी तरह विफल रही है।

    निष्कर्ष

    केवल विधिक सुधारों से गरीबी, शिक्षा की कमी या पितृसत्तात्मक मानदंडों को रातों-रात समाप्त नहीं किया जा सकता। अशिक्षित महिलाओं में बाल विवाह का प्रचलन 48% है। इसलिए बालिकाओं को स्कूलों में बनाए रखने और उनके आर्थिक सशक्तीकरण में संस्थागत निवेश अत्यंत आवश्यक है।

    परंतु, सामाजिक-आर्थिक प्रयास तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक कि हमारी कानूनी प्रणाली उसी संस्था को वैधता देती रहे जिसे वह समाप्त करना चाहती है। संसद को अविलंब PCMA में संशोधन कर बाल विवाह को शुरुआत से ही अवैध घोषित करना चाहिए। एक ऐसी कानूनी व्यवस्था जो विवाह को अनुमति देती है और उसके उपभोग को अपराध मानती है, बच्चों की सुरक्षा नहीं कर रही; वह केवल अपने ही अंतर्विरोधों को छिपा रही है।

    इस लेख में व्यक्त विचार एवं मत लेखक के निजी हैं। इनका प्रकाशक, संपादक या संस्थान के आधिकारिक विचारों या नीतियों से आवश्यक रूप से कोई संबंध नहीं है।

    लेखक एक स्वतंत्र मानवाधिकार शोधकर्ता एवं विधिक प्रणालियों की विशेषज्ञ हैं।

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