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सुप्रीम कोर्ट में जजों ‌की नियुक्तियांः रुझानों और प्रवृत्त‌ियों की पहचान

LiveLaw News Network
19 Oct 2020 1:07 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट में जजों ‌की नियुक्तियांः रुझानों और प्रवृत्त‌ियों की पहचान
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स्वप्‍निल त्रिपाठी

हाल में खबरें आईं कि कानून मंत्रालय (भारत सरकार) सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिशों का इंतजार कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट में जजों की अनुमोद‌ित संख्या 34 (चीफ जस्टिस समेत) है। हालांकि, कोर्ट वर्तमान में 30 जजों के साथ ही कार्यरत है, क्योंकि जस्ट‌िस गोगोई, जस्ट‌िस गुप्ता, जस्ट‌िस भानुमति और जस्ट‌िस मिश्रा की सेवानिवृत्ति के बाद अब तक एक भी नियुक्ति नहीं हो पाई है। जस्ट‌िस गोगोई 2019 में सेवानिवृत्त हुई थी, जबकि शेष इस वर्ष की शुरुआत में सेवानिवृत्त हुए थे।

जब भी सुप्रीम कोर्ट का एक जज रिटायर होता है, यह सवाल उठने लगता है कि उसके बदले किसे नुयक्त किया जाएग। सवाल उठता है कि नियुक्ति बार से होगी या बेंच? क्या नियुक्ति हाई कोर्ट से होगी? महिला की नियुक्ति होगी या पुरुष की? आदि ऐसे सवाल हैं, जिनका कोई निर्णायक जवाब नहीं है, क्योंकि इतिहास ने हमें दिखाया है कि सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति के मामलों में कुछ भी निश्चित नहीं है। कभी-कभी, कॉलेजियम या सरकार ने कुछ सिफारिशों को वापस भेजकर कानूनी बिरादरी को आश्चर्यचकित कर दिया था, जबकि सिफारिशें विशुद्ध रूप से योग्यता के आधार पर रही हैं, या उनके पीछे मजबूत समर्थन रहा है।

हालांकि कोई भी अदालत में नियुक्तियों का अनुमान नहीं लगा सकता है, फिर भी पिछली नियुक्तियों के आधार पर एक पैटर्न तैयार किया जा सकता है जो सामान्य प्रवृत्ति और कारकों का पता लगाने में मददगार हो सकता है, जो जजों की नियुक्ति में भूमिका निभाते हैं। वर्तमान आलेख में, इन मापदंडों पर चर्चा की जाएगी। सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया का अवलोकन किया जाएगा। इसके बाद, विभिन्न मापदंडों की चर्चा की जाएगी, सुप्रीम कोर्ट की नियुक्तियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

शुरुआत में, यह बताना उचित है कि इस लेख में ‌दिए गए रुझान और पैटर्न विशुद्ध रूप से सांख्यिकीय जानकारी पर आधारित हैं। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध जजों के आंकड़ों का अध्ययन किया गया है। कुछ मामलों में, जहां जानकारी अनुपलब्ध थी, न्याय विभाग (भारत सरकार) या सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को दी गई आरटीआई द्वारा प्राप्त आधिकारिक जानकारियों पर भरोसा किया गया है।

भारत के सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति

भारत की न्यायिक प्रणाली में त्रिस्तरीय पदानुक्रम है। नीचे से ऊपर तक, पहले अधीनस्थ अदालतें (जिन्हें जिला न्यायपालिका भी कहा जाता है) जो हर जिले में सामान्य नागरिक और आपराधिक मामलों की सुनवाई करती हैं। दूसरे हाईकोर्ट हैं (हर राज्य में संयुक्त रूप से या व्यक्तिगत रूप से एक हाई कोर्ट है) जो राज्य में अधीनस्थ अदालतों पर अधिकार क्षेत्र का उपयोग करते हैं। तीसरा, सुप्रीम कोर्ट है जो भारत का शीर्ष कोर्ट है और हर विवाद का अंतिम मध्यस्थ है।

सुप्रीम कोर्ट में 34 न्यायाधीश (एक मुख्य न्यायाधीश सहित) होते हैं। संविधान का अनुच्छेद 124 (3) सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया प्रदान करता है। एक व्यक्ति को तीन तरीकों से कोर्ट में नियुक्त किया जा सकता है-

(ए) यदि वह कम से कम पांच वर्ष हाई कोर्ट का जज रहा/रही हो। (खंडपीठ से नियुक्ति);

(बी) यदि वह कम से कम दस वर्ष हाई कोर्ट का वकील रहा/रही हो। (बार से नियुक्ति);

(सी) यदि वह भारत के राष्ट्रपति की राय में एक प्रतिष्ठित न्यायविद है। (गणमान्य न्यायविद)

संविधान के पाठ के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति से संबंधित निर्णय भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से राष्ट्रपति द्वारा लिए जाने हैं। भारत में, राष्ट्रपति एक नाम मात्र का प्रधान/हस्ताक्षरकर्ता प्राधिकारी होता है, जिसकी कोई वास्तविक शक्तियां नहीं होती हैं और वह मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करता है। सलाह बाध्यकारी होती है। इसलिए, वास्तव में, यह कानून मंत्रालय है, जो नियुक्ति के मामलों पर भारत के मुख्य न्यायाधीश को परामर्श देता है।

हालांकि, In Re Special Reference के मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियुक्ति के मामलों में, भारत के मुख्य न्यायाधीश की प्रधानता होगी और उनका निर्णय अंतिम होगा। कोर्ट ने जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली विकसित की है, जिसके अनुसार नियुक्तियों पर निर्णय भारत के मुख्य न्यायाधीश और कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों के निकाय द्वारा लिया जाता है। हालांकि, व्यवहार में अक्सर कॉलेजियम द्वारा सुझाए गए नामों को या तो मंत्रालय द्वारा पुनर्विचार के लिए वापस कर दिया जाता है या कई दिनों तक पुष्टि नहीं की जाती है।

विगत नियुक्तियों का विश्लेषण

शुरुआत में, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि नियुक्ति के लिए तीन श्रेणियों-बेंच, बार और प्रतिष्ठित न्यायविद में से, यह लोकप्रिय रूप से माना जाता है कि केवल पहली दो श्रेणियों का ही उपयोग किया जाता है। मैं व्यक्तिगत रूप से इस कथन से असहमत हूं और पहले भी तर्क दिया है कि कि प्रतिष्ठित न्यायविद् श्रेणी के तहत नियुक्तियां वास्तव में की गई हैं। इस आलेख में भी, इस श्रेणी के तहत एक ही नियुक्ति पर विचार किया है,वह जस्ट‌िस एससी रॉय की नियुक्ति, क्योंकि उन्हें न तो बार से नियुक्त किया गया था, न बेंच से।

बेंच से नियुक्तियां

26.01.1950 (जिस दिन संविधान को स्वीकार किया गया था और अदालत अस्तित्व में आई थी) से 23.09.2019 (जिस दिन अंतिम नियुक्ति कोर्ट में की गई थी) के बीच, 245 जजों को कोर्ट में नियुक्त किया गया है। 245 में से, 237 जजों को अनुच्छेद 124 के खंड (ए) के तहत नियुक्त किया गया है और एक एक जज हाईकोर्ट से नियुक्त किया गया है। (दूसरे शब्दों में, बेंच से नियुक्त किया गया है)

अवलोकन 1: सुप्रीम कोर्ट में प्रेसीडेंसी कोर्ट हावी हैं

सुप्रीम कोर्ट में ‌जिन हाईकोर्टों से सर्वाधिक जजों की नियुक्त की गई है, उनमें पहला नंबर बॉम्बे हाईकोर्ट (25) का है, इसके बाद कलकत्ता (24), मद्रास (23) (सामूहिक रूप से प्रेसीडेंसी कोर्ट) और इलाहाबाद (22) का स्थान है। सांख्यिकीय रूप से, कोर्ट में नियुक्त किए गए 237 जजों में से 94 इन हाईकोर्टों से हैं, जो जजों की कुल संख्या का 39.6% (लगभग 40%) है। ये चार कोर्ट शेष 25 हाईकोर्टों से नियुक्तियों पर हावी हैं और प्रबल हैं।

इन चार हाईकोर्टों के प्रति प्रथम दृष्टया झुकाव इस तथ्य के कारण हो सकती है कि वे सबसे पुराने हाईकोर्ट हैं और इसलिए, एक स्थापित बार है। इन हाईकोर्टों की स्थापना 19 वीं शताब्दी में यानि 1862 में बॉम्बे, कलकत्ता और मद्रास में हुई थी और 1866 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की स्‍थापना हुई थी। संभवतया, शेष हाईकोर्टों को अपना बार स्थापित करने और कोर्ट में नियुक्तियों के लिए भरोसा हासिल करने में समय लगा।

शेष हाईकोर्टों में से, लगभग सभी 20 वीं शताब्दी में स्थापित किए गए थे, अधिकतम नियुक्तियां आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट (16), दिल्ली (15), और केरल हाईकोर्ट (14) से हुई हैं। दिल्ली हाईकोर्ट का प्रदर्शन सराहनीय है। 1966 में स्‍थापित किए जाने के बावजूद, इसके जजों की अच्छी संख्या सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गई । दूसरी ओर, राजस्थान हाईकोर्ट का प्रदर्शन खराब है, क्योंकि दिल्ली में वर्ष 1928 यानी 38 साल पहले स्‍थापित किए जाने के बावजूद, इसके केवल जज ही 8 सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे हैं, जो दिल्ली का लगभग आधा है।

अवलोकन 2: हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की ओर झुकाव

एक अन्य कारक, जो हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की सुप्रीम कोर्ट के नियुक्ति के मामले में महत्वपूर्ण वजन रखता है, वह यह है कि क्या उसने किसी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्य किया है। बेंच से नियुक्त किए गए 237 जजों में से 160 ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवा की है यानी 68%। इस अभ्यास में विशेष रूप से वर्ष 2000 के बाद की वृद्धि देखी गई है, क्योंकि 1950-2000 के बीच की नियुक्त‌ियों में केवल 52% [1] ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीशों के रूप में कार्य किया था, जबकि यह वर्ष 2000 तक बढ़कर 87% [2] हो गया। आंकड़े बताते हैं कि कॉलेजियम ऐसे उम्मीदवारों को नियुक्त‌ि में वरीयता देता है, जिन्हें हाईकोर्ट का नेतृत्व करने का अनुभव रहता है। यह केवल कुछ मामलों में अपवाद रहता है।

अवलोकन 3: हाईकोर्ट में नियुक्ति से पहले वकालत करने वाले जजों को वरीयता

संविधान के अनुच्छेद 217 में कहा गया है कि हाईकोर्ट में जज के रूप में नियुक्त के लिए, उम्मीदवार के पास दस साल न्यायिक अध‌िकारी के रूप में (जिला न्यायाधीश के रूप में) कार्य करने का अनुभव या हाईकोर्ट के अधिवक्ता के रूप में कार्य करने का अनुभव हो। इसलिए, जिला न्यायालय के जज को भी हाईकोर्ट और संभवतः सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्त किया जा सकता हैं।

आज तक, केवल 29/237 यानी हाईकोर्ट से नियुक्त 12% जजों ने ही अधीनस्थ न्यायालयों में कार्य किया है यानी जिला न्यायाधीश रहे हैं। इससे पता चलता है कि कॉलेजियम उन लोगों को तरजीह देता है जो हाईकोर्ट में अपनी नियुक्ति से पहले जिला न्यायाधीश के बजाय अधिवक्ता के रूप में अभ्यास करते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने वाले जिला जजों की सबसे अधिक संख्या मद्रास (5), उसके बाद इलाहाबाद (4) और बॉम्बे (3) की है। दिलचस्प बात यह है कि कलकत्ता हाईकोर्ट (सबसे पुराने हाईकोर्टों में से एक होने के बावजूद) में रहा कोई भी जज, जिसने जिला न्यायाधीश के रूप में कार्य किया हो, उसे सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त नहीं किया गया है।

बार से नियुक्तियां

कोर्ट में नियुक्त 245 में से 7 न्यायाधीश बार से हैं यानी कम से कम दस साल तक हाईकोर्ट में वकील रहे हैं। [3] यह संख्या 2% है, जो कि बेंच से नियुक्तियों की स्पष्ट प्राथमिकता को दर्शाता है।

वर्ष 1950-2000 के बीच, इस श्रेणी के तहत केवल तीन नियुक्तियां की गईं, जबकि वर्ष 2014 में चार नियुक्तियां की गईं। 2014 में तेजी से हुई नियुक्ति और अचानक बदलाव यह दर्शाता है कि कॉलेजियम और मंत्रालय बार से नियुक्तियों की ओर बढ़ रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि 7 में से 4 (यानी 57%) बार नियुक्ति प्राप्तकर्ताओं ने भारत सरकार (केंद्र सरकार) के एक कानून अधिकारी के रूप में कार्य किया था, [4] जिससे पता चलता है कि कानून मंत्रालय नियुक्ति के लिए न्यायिक अधिकारियों के नामों की पुष्टि करता है।

लिंग और सुप्रीम कोर्ट

लैंगिक न्याय का अगुवा बनने के बावजूद, जजों की नियुक्तियों के मामले में खुद समानता नहीं रही है। कोर्ट में नियुक्त किए गए 245 जजों में से केवल आठ महिलाएं हैं यानी मात्र 3.2%। वास्तव में, अदालत के कामकाज के पहले 29 वर्षों के दौरान, बेंच पर कोई महिला नहीं थी। 1950-2000 के बीच, केवल दो महिलाओं को नियुक्त किया गया था। सौभाग्य से, वर्ष 2000 में संख्या में सुधार हुआ, क्योंकि छह महिला जजों ने खंडपीठ की सेवा की। कलकत्ता (2) और बॉम्बे (2) के हाईकोर्टों ने महिला जजों की अधिकतम संख्या दी है। अन्य को क्रमशः केरल, पटना, मद्रास से नियुक्त किया गया है।

बार से नियुक्तियों के मामले में भी, महिलाओं की हिस्सेदारी अपर्याप्त है। नियुक्त किए गए सात जजों (यानी 14%) में से केवल एक महिला यानी जस्टिस इंदु मल्होत्रा ​​की नियुक्त‌ि हुई है। उनकी नियुक्ति इस श्रेणी में पहली नियुक्ति के 54 साल बाद 2018 में की गई थी।

समापन टिप्पणी

कॉलेजियम जल्द ही शीर्ष अदालत में नियुक्ति के लिए नामों पर विचार-विमर्श करेगा। केवल एक ही उम्मीद की जा सकती है कि ये नाम अनुच्छेद 124 (3) की भावना को सही मायने में दर्शाते हों और बार और बेंच को समान वजन दिया गया हो। मुझे पूरी उम्मीद है कि कॉलेजियम अपने पुराने रुझानों को छोड़ेगा और जजों की नियुक्त‌ि हाईकोर्ट, लिंग इत्यादि के प्रति किसी भी झुकाव के बिना करेगा।

मुझे पूरी उम्मीद है कि कम से कम (ए) एक की नियुक्ति बार होगी और / या (बी) एक नियुक्त‌ि महिला की होगी। कॉलेजियम और मंत्रालय की वर्ष 2014 के बाद, सुप्रीम कोर्ट में महिलओं की नियुक्त‌ि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए सराहना की जानी चाहिए। हालांकि, अभी करने के लिए बहुत कुछ है, खासकर तब तक, जब तक कि सुप्रीम कोर्ट का नेतृत्व एक महिला मुख्य न्यायाधीश के हाथों में नहीं आ जाता है।

लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

(यह लेख पहली बार लेखक के निजी ब्लॉग 'बेसिक' स्ट्रक्चर पर प्रकाशित हुआ था। लेखक इस पोस्ट के साथ कानूनी बिरादरी के किसी भी सदस्य को कष्ट पहुंचाना नहीं चाहता है।)

[1] 1950-2000 के बीच, 134 न्यायाधीशों को हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया गया था, जिनमें से 70 ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्य किया था। (70/134= 52% राउंडेड ऑफ)।

[2] 2001-2020 के बीच, 103 न्यायाधीशों को उच्च न्यायालय से न्यायालय में नियुक्त किया गया था, जिनमें से 90 ने उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्य किया था। (90/103 = 87% - राउंडेड ऑफ)।

[3] बार से सप्रीम कोर्ट में नियुक्त‌ियों संबंध में दायर आरटीआई जवाब में, न्याय विभाग ने बताया कि जस्टिस एसएम सिकरी, जस्टिस कुलदीप सिंह, जस्टिस संतोष हेज, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस इंदु मल्होत्रा को बार से सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया गया है।

[4] मैंने केवल भारत के अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल या भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के पदों को ध्यान में रखा है, क्योंकि वे औपचारिक संवैधानिक पद हैं और सरकार द्वारा इन नियुक्तियों के लिए जारी अधिसूचनाएं सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं।

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