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आखिर क्यों उत्तर-प्रदेश सरकार द्वारा प्रदर्शनकारियों से सम्बंधित पोस्टर/बैनर लगाना है 'अत्यधिक अन्यायपूर्ण'? कुछ विचार

SPARSH UPADHYAY
11 March 2020 7:45 AM GMT
आखिर क्यों उत्तर-प्रदेश सरकार द्वारा प्रदर्शनकारियों से सम्बंधित पोस्टर/बैनर लगाना है अत्यधिक अन्यायपूर्ण?  कुछ विचार
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बीते सोमवार को उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार को गंभीर झटका देते हुए, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ में उत्तर-प्रदेश पुलिस द्वारा लगाए गए सभी पोस्टरों और बैनरों को हटाने का आदेश दिया था। दरअसल, इन बैनरों में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरोध प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर हिंसा फैलाने के आरोपी व्यक्तियों के नाम, उनका पता, उनके पिता का नाम और फोटो लगाये गए थे।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा की खंडपीठ ने इस सम्बन्ध में बीते रविवार को 2 सत्रों में सुनवाई की थी- एक सुबह 10 बजे, और बाद में दोपहर 3 बजे यूपी के महाधिवक्ता (एजी) राघवेन्द्र सिंह को सुना गया था। इसके बाद सोमवार को यह कहते हुए अदालत ने अपना उक्त आदेश (पोस्टर एवं बैनर हटाने का) सुनाया कि अगर जनता के साथ अन्याय हो रहा है तो कोई भी अदालत अपनी आंखें बंद नहीं कर सकती है।

क्या वाकई राज्य सरकार के पास इस सम्बन्ध में कोई अधिकार नहीं है?

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान, एडवोकेट-जनरल राघवेंद्र प्रताप सिंह ने यह तर्क दिया कि अदालत को इस मामले में एक जनहित याचिका के रूप में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसमें शामिल लोगों ने सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है।

महाधिवक्ता ने कथित सीएए प्रदर्शनकारियों के पोस्टर लगाने में राज्य सरकार के कृत्य को 'निवारक' करार दिया और कहा कि यह पोस्टर/बैनर इस लिए लगाये हैं जिससे भविष्य में इस तरह की हिंसा की घटनाओं को दोहराया न जाए।

दिलचस्प बात यह है कि यह बात खुद राज्य सरकार की तरफ से भी स्वीकार की गयी कि ऐसा कोई कानून मौजूद नहीं है, जिसके अंतर्गत राज्य सरकार के पास यह अधिकार हो कि वो इस प्रकार से लोगों से जुडी निजी जानकारी को सार्वजानिक रूप से बैनर/पोस्टर के रूप में चस्पा कर सके।

अदालत के आदेश में भी यह लिखा गया है कि, "किसी भी क़ानून की अनुपस्थिति को महाधिवक्ता ने स्वीकार किया है।" हालाँकि, यहाँ सवाल यह भी उठता है कि क्या सरकार के पास एक सरकारी नीति के तहत किसी अभियुक्त के खिलाफ ऐसे पोस्टर/बैनर चस्पा करने की ताकत है या नहीं?

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि,

"दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के तहत, न्यायालय के पास एक ऐसे व्यक्ति से सम्बंधित एक लिखित उद्घोषणा प्रकाशित करने के लिए शक्ति उपलब्ध है, जिसके विरुद्ध एक वारंट जारी किया गया हो और ऐसा व्यक्ति वारंट के निष्पादन से बचने के लिए स्वयं को छिपा रहा हो। किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत रिकॉर्ड को बड़े स्तर पर सार्वजनिक करने के लिए पुलिस या कार्यपालिका के पास ऐसी कोई अन्य शक्ति उपलब्ध नहीं है।"

अदालत ने आगे कहा कि,

"जांच एजेंसियों या अन्य अधिकारियों को उनकी पहचान और रिकॉर्ड के उद्देश्य से अभियुक्तों की तस्वीर लेने के लिए सशक्त करने के कुछ प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन वह प्रावधान भी सार्वजनिक प्रकाशन के लिए खुले नहीं है। इन तस्वीरों को प्रकाशित करने का एकमात्र समय तब है जब न्याय की पहुँच से भाग रह व्यक्ति को पकड़ने में सहायता प्राप्त करना हो।"

गौरतलब है कि हमारे कानून के अंतर्गत यह शक्ति (सार्वजनिक उद्घोषणा) किसी भी प्रकार से कार्यपालिका को नहीं सौंपी गयी है कि वो किसी व्यक्ति के खिलाफ इस प्रकार की उद्घोषणा रुपी कार्यवाही करे, जहाँ किसी व्यक्ति से सम्बंधित निजी जानकारी को इस प्रकार से चौराहों पर पोस्टर/बैनर के रूप में लगा दिया जाये। जहाँ तक बात सरकारी नीति के तहत ऐसा करने की है, तो यहाँ भी राज्य को किसी कि प्राइवेसी में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है।

इसके अलावा, जहां तक इस राज्य सरकार के इस कदम की वैधता का सवाल है, यह बताने के लिए पर्याप्त कारण हैं, जिन्हें हम लेख में समझेंगे भी, कि कोई ऐसा कानून अस्तित्व में नहीं है, जो राज्य को उन अभियुक्तों के व्यक्तिगत डेटा के साथ बैनर लगाने की अनुमति देता है जिनसे मुआवजा वसूला जाना है (अदालत ने अपने आदेश में भी इस बात को रेखान्खित किया है)।

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के तहत उद्घोषणा (proclamation) किन परिस्थितयों में की जाती है, इसे हम आगे समझेंगे, लेकिन हमे यहाँ यह जरुर समझ लेना चाहिए कि जहाँ इस प्रकार की उद्घोषणा होती भी है, वहां पर इस सम्बन्ध में कोई भी आदेश, केवल न्यायालय के द्वारा ही दिया जाता है।

इसक मतलब यह है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ ऐसी उद्घोषणा होनी है अथवा नहीं, यह निर्णय न्यायापालिका के क्षेत्राधिकार में आता। हम यह इस लेख में आगे जानेंगे भी, कि उत्तर-प्रदेश सरकार एवं सम्बंधित प्राधिकरण ने इस प्रकार के बैनर और पोस्टर लगाकर अपने क्षेत्राधिकार के बाहर जाकर कार्य किया है।

उद्घोषणा का क्या होता है मकसद?

दरअसल, आपराधिक मामलों में जब भी किसी को भगोड़ा/फरार घोषित करना होता है, वहां इस सम्बन्ध में एक उद्घोषणा की जाती है (अदालत के द्वारा)। इसके पीछे का त्वरित मकसद तो यह होता है कि ऐसे व्यक्ति की संपत्ति की कुर्की की जा सके (धारा 83, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अनुसार) और बाद में उसे बेचा या डिस्पोज़ किया जा सके (कुछ शर्तों के अधीन)।

हालाँकि, ऐसी उद्घोषणा करने का मुख्य/असल मकसद उस व्यक्ति तक यह सूचना पहुँचाना होता है कि यदि वह नियत समय पर अदालत नहीं पहुंचा तो उसकी संपत्ति की कुर्की के आदेश के पश्च्यात वह संपत्ति राज्य को दे दी जाएगी और उसके पश्च्यात उसका विक्रय कर दिया जायेगा (धारा 85, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अनुसार)। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि ऐसी उद्घोषणा के तुरंत बाद कभी भी संपत्ति की कुर्की की जा सकती है, लेकिन इसे बेचने की शक्ति की अपनी सीमायें हैं।

हालाँकि, देवेन्द्र सिंह नेगी उर्फ़ देबू बनाम उत्तरप्रदेश राज्य 1994 Cri LJ 1783 (All) के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह कहा था कि संपत्ति की कुर्की का आदेश देने के लिए अदालत को धारा 82 के अंतर्गत की गयी उद्घोषणा के पश्च्यात 30 दिन तक का इंतज़ार करना चाहिए जिसके पश्च्यात ही संपत्ति की कुर्की के आदेश दिए जा सकेंगे।

उन परिस्थितियों में, जहाँ वह व्यक्ति जिसके सम्बन्ध में अदालत द्वारा उद्घोषणा की गयी है, वह नियत समय पर अदालत में उपस्थित नहीं होता है, तो उसकी संपत्ति राज्य सरकार के व्ययनाधीन हो जाती है (धारा 85, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अनुसार), हालाँकि इस संपत्ति को 6 माह तक नहीं बेचा जा सकता है।

यहाँ ध्यान दिया जाना चाहिए कि यह शक्ति केवल न्यायालय में निहित है कि किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में इस प्रकार की उद्घोषणा करनी है अथवा नहीं। पुलिस या राज्य सरकार को ऐसी कोई शक्ति नहीं दी गयी है। इसके अलावा, न्यायालय भी आम तौर पर ऐसी उद्घोषणा नहीं कर सकता है, क्योंकि उसकी इस शक्ति के प्रयोग की अपनी सीमायें भी हैं। इसके विषय में हम आगे लेख में चर्चा करेंगे।

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 82 क्या कहती है?

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 82, फरार व्यक्ति के सम्बन्ध में होने वाली उद्घोषणा से सम्बंधित है। इसके अंतर्गत, यदि न्यायालय को यह लगता है कि कोई व्यक्ति, जिसके विरुद्ध अदालत ने वारंट जारी किया है, फरार हो गया है, या अपने को छिपा रहा है, जिससे वह वारंट निष्पादित न किया जा सके तो न्यायालय ऐसे व्यक्ति के विषय में यह उद्घोषणा कर सकता है कि वह व्यक्ति विनिर्दिष्ट स्थान में और विनिर्दिष्ट समय पर, जो उस उद्घोषणा के प्रकाशन की तारीख से कम से कम तीस दिन पश्चात् का होगा, हाजिर हो।

धारा 82 कहती है:-

फरार व्यक्ति के लिए उद्घोषणा -- (1) यदि किसी न्यायालय को (चाहे साक्ष्य लेने के पश्चात् या लिए बिना) यह विश्वास करने का कारण है कि कोई व्यक्ति जिसके विरुद्ध उसने वारंट जारी किया है, फरार हो गया है, या अपने को छिपा रहा है जिससे ऐसे वारण्ट का निष्पादन नहीं किया जा सकता तो ऐसा न्यायालय उससे यह अपेक्षा करने वाली लिखित उद्घोषणा प्रकाशित कर सकता है कि वह व्यक्ति विनिर्दिष्ट स्थान में और विनिर्दिष्ट समय पर, जो उस उद्घोषणा के प्रकाशन की तारीख से कम से कम तीस दिन पश्चात् का होगा, हाजिर हो।

(2) उद्घोषणा निम्नलिखित रूप से प्रकाशित की जाएगी :

(i) (क) वह उस नगर या ग्राम के, जिसमें ऐसा व्यक्ति मामूली तौर पर निवास करता है, किसी सहजदृश्य स्थान में सार्वजनिक रूप से पढ़ी जाएगी; ।

(ख) वह उस गृह या वासस्थान के, जिसमें ऐसा व्यक्ति मामूली तौर पर निवास करता है, किसी सहजदृश्य भाग पर या ऐसे नगर या ग्राम के किसी सहजदृश्य स्थान पर लगाई जाएगी;

(ग) उसकी एक प्रति उस न्याय सदन के किसी सहजदृश्य भाग पर लगाई जाएगी;

(ii) यदि न्यायालय ठीक समझता है तो वह यह निदेश भी दे सकता है कि उद्घोषणा की एक प्रति उस स्थान में, परिचालित किसी दैनिक समाचारपत्र में प्रकाशित की जाए जहाँ ऐसा व्यक्ति मामूली तौर पर निवास करता है।

गौरतलब है कि इस धारा का खंड 2 (a) एक आदेशात्मक प्रावधान है, यानी जहाँ न्यायालय को यह संतुष्टि हो गयी है कि कोई व्यक्ति फरार है तो उसके सम्बन्ध में उद्घोषणा, खंड 2 (i) (क़), (ख), (ग़) के अनुरूप की जाएगी (अनिवार्य रूप से), वहीँ खंड 2 (ii) के अंतर्गत उद्घोषणा का तरीका (दैनिक समाचारपत्र में प्रकाशन) अदालत के विवेक पर निर्भर करता है।

इस धारा का मुख्य उद्देश्य यह है कि व्यक्ति को सार्वजानिक रूप से सूचना दी जाए कि उसे निश्चित समय एवं स्थान पर अदालत के समक्ष पेश होना है, और यदि वो पेश नहीं होगा तो उसकी संपत्ति की कुर्की के आदेश दिए जायेंगे और अंततः वह बेची जा सकती है। ऐसा केवल इसलिए किया जाता है कि व्यक्ति अपनी संपत्ति को बचाने के लिए ही सही, अदालत में पेश होगा।

अगर हम इस प्रावधान को पढ़ें तो हम यह पाएंगे कि इस प्रावधान का भी किसी भी प्रकार का यह उद्देश नहीं है कि ऐसी उद्घोषणा के जरिये समाज के सामने कोई उदाहरण पेश करने या जनता को डराने या एक कड़वी सीख देने या नागरिकों को अवैध गतिविधियों में भाग लेने से रोकने का प्रयास किया जाता है (जैसा कि महाधिवक्ता ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष राज्य सरकार के निर्णय को उचित बताते हुए तर्क दिया)।

महाधिवक्ता की इस प्रकार की दलील कि कुछ विशिष्ट व्यक्तियों की पहचान वाले बैनर/पोस्टर का उदेश्य, केवल नागरिकों को अवैध गतिविधियों में भाग लेने से रोकना है और यह सार्वजनिक हित में है, इसलिए, न्यायालय को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, अपने आप में तार्किक नहीं है जबकि कानून के अंतर्गत जो यह प्रावधान मौजूद है, उसमे ऐसा कोई भी उद्देश्य नजर नहीं आता है।

यहाँ हमे यह जरुर याद रखना चाहिए कि राज्य-सरकार/पुलिस या न्यायालय के अलावा किसी अन्य संस्था/प्राधिकरण को किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में ऐसी कोई उद्घोषणा करने की शक्ति हासिल है ही नहीं, इसलिए महाधिवक्ता की इस दलील, कि राज्य के पास ऐसी उद्घोषणा करने की शक्ति है, को धारा 82 या सम्बंधित प्रावधानों के परस्पर नहीं समझा जाना चाहिए।

क्योंकि ऐसी कोई शक्ति राज्य-सरकार के पास होती ही नहीं है; पर चूँकि, उद्घोषणा से सम्बंधित प्रावधान दंड प्रक्रिया संहिता में है इसलिए महाधिवक्ता के तर्कों को बेहतर ढंग से समझने के लिए हमे इस कानून के इन प्रावधानों पर गौर करना चाहिए।

जैसा कि लेख में कहा गया है, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 82 से लेकर धारा 86 के प्रावधान, केवल फरार व्यक्तियों के लिए हैं, हालाँकि, मौजूदा लखनऊ मामले में तमाम ऐसे लोग हैं जो फरार नहीं है और फिर भी उनके सम्बन्ध में यह उद्घोषणा की जा रही है, जोकि प्रथम दृष्टया अनुचित है और यह बात माननीय उच्च न्यायालय ने भी रेखांकित की है।

न्यायालय की शक्ति की सीमा

लेख के इस आखिरी भाग में हम यह समझेंगे कि आखिर क्यों उत्तर-प्रदेश सरकार द्वारा ऐसी कोई भी शक्ति न होने के बावजूद, बैनर/पोस्टर पर इस तरह से नागरिकों का नाम चस्पा करना गंभीर रूप से अनुचित कृत्य था और कैसे यह कानून के दायरे में आने वाला कृत्य कत्तई नहीं था।

इस भाग में हम न्यायालय द्वार फरार व्यक्ति के सम्बन्ध में की जाने वाली उद्घोषणा के बारे में और गहराई से जानेगे और यह समझेंगे कि न्यायालय द्वारा इस शक्ति के उपयोग की भी अपनी सीमाएं हैं। और जब न्यायालय पर इतनी सीमाएं हैं तो जाहिर है कि एक प्राधिकरण/संस्था, जिसके पास ऐसी उद्घोषणा करने की कोई शक्ति है ही नहीं, वो तो जाहिर तौर पर ऐसा निर्णय नहीं ले सकती है।

जैसा कि हमने जाना, यदि किसी न्यायालय के पास यह विश्वास करने का कारण है कि कोई भी व्यक्ति, जिसके खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी किया गया है, वह फरार हो गया है या खुद को छिपा रहा है, ताकि ऐसे वारंट को अंजाम न दिया जा सके, तो ऐसी अदालत एक लिखित उद्घोषणा प्रकाशित कर सकती है, जिसके अंतर्गत ऐसे व्यक्ति को एक निर्दिष्ट स्थान पर निश्चित समय पर उपस्थित होने के लिए कहा जाता, और यह समय एवं इस उद्घोषणा को जारी/प्रकाशित करने के बीच 30 दिनों से अधिक का अंतर होना चाहिए। हमने यह भी जाना कि ऐसे व्यक्ति की संपत्ति की, ऐसी उद्घोषणा के बाद कुर्की की जा सकता है (अदालत के आदेश के अनुसार)।

जहां प्रकाशित की गयी यह उद्घोषणा, कुछ निर्दिष्ट जघन्य अपराधों के आरोपी व्यक्ति के संबंध में है, और ऐसा व्यक्ति उद्घोषणा के लिए निर्दिष्ट स्थान और समय पर उपस्थित होने में विफल रहता है, तो उसे दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 82 के तहत 'उद्घोषित अपराधी' घोषित कर दिया जाता है [(धारा 82 (4), दंड प्रक्रिया संहिता, 1973]।

जैसा कि हमने जाना, यह माना जाता है कि दंड प्रक्रिया संहिता का यह कठोर प्रावधान, एक अभियुक्त को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए मजबूर करेगा, जिससे उसकी सम्प्पति उसके हाथों से न छिन जाए।

हालाँकि, न्यायालय द्वारा ऐसी उद्घोषणा काफी गंभीरता से की जाती है। जैसा कि बिश्नुदयाल बनाम एम्परर, AIR 1943 Pat 366 एवं देवेन्द्र सिंह नेगी उर्फ़ देबू बनाम उत्तरप्रदेश राज्य 1994 Cri LJ 1783 (All) के मामले में कहा गया है, धारा 82 के अंतर्गत उद्घोषणा तब तक जारी नहीं की जा सकती है, जबतक अदालत द्वारा उससे पहले गिरफ्तारी का वारंट न जारी कर दिया जाये।

गौरतलब है कि देवेन्द्र सिंह नेगी के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि धारा 82, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के प्रावधान अनिवार्य प्रकृति के हैं और इन्हें सख्ती से लागू किया जाना होगा।

वहीँ, दीप नारायण सिंह बनाम बिहार राज्य, 1981 Cri LJ 1672 (पटना) के मामले में यह तय किया गया था कि धारा 82 के अंतर्गत कार्यवाही के लिए यह जरूरी है कि अदालत को पहले वारंट (गिरफ्तारी का) जारी करना चाहिए और यह मानने के लिए अपने कारणों को लेखबद्ध करना चाहिए कि अभियुक्त फरार है या खुद को छिपा रहा है।

इस प्रकार, हर उस मामले में जहां वारंट निष्पादित नहीं किया जाता है, वहां धारा 82 के अंतर्गत कार्यवाही अस्तित्व में नहीं आ सकती है, और यह जरुरी हो सकता है कि संबंधित अधिकारी की जांच की जाए, जो गिरफ्तारी के वारंट को निष्पादित करने के लिए गया था और उसके द्वारा अपनाए गए उपायों की भी जांच होनी चाहिए - कुंवर सिंह बनाम राज्य, 1982 A Cr R29

यही नहीं, फरार होने का मतलब यह नहीं हो सकता कि कोई व्यक्ति कहीं मिल नहीं रहा है, या वह एक नियत स्थान से कहीं और चला गया है, तो उसे फरार कह दिया जाये। असल में, 'फरार' होने का मतलब यह होगा कि वह व्यक्ति छुप रहा है ताकि इस तरह के वारंट को निष्पादित न किया जा सके। अदालत को अपनी संतुष्टि दर्ज करनी होती है कि अभियुक्त वारंट के निष्पादन से बचने के लिए फरार हो गया है या छिप रहा है और केवल तभी धारा 82, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का उपयोग उद्घोषणा के लिए किया जा सकता है।

इन सभी मामलों से यह साफ़ होता है कि एक न्यायालय के लिए भी फरार व्यक्ति के सम्बन्ध में एक उद्घोषणा करने से पहले तमाम चीज़ों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार का निर्णय बिना किसी औचित्य एवं न्याय का मत लागू किये बिना किया गया प्रतीत होता है। खासतौर से तब जब प्रदेश के मुख्यमंत्री ने अपने एक हालिया बयान में यह कहा था कि उत्तर-प्रदेश सरकार, विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा में शामिल लोगों से 'बदला' लेगी।

सरकार का फैसला प्राइवेसी के खिलाफ?

अंत में, यह कहा जा सकता है कि राज्य-सरकार का कृत्य अपने आप में घोर अनुचित प्रतीत होता है, जिसका कानून के अंतर्गत कोई प्रावधान मौजूद नहीं है। और यही कारण है कि उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में राज्य सरकार के इस निर्णय को लोगों की प्राइवेसी के विरुद्ध पाया है और यह आदेश दिया कि ऐसे पोस्टर-बैनर राज्य सरकार द्वारा हटाये जाएँ।

इसके अलावा, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में मलक सिंह एवं अन्य बनाम पंजाब एवं हरयाणा राज्य एवं अन्य AIR 1981 SC 760 के मामले का जिक्र करते हुए कहा कि "इस मामले में भी यह माना गया है कि ऐसे हिस्ट्रीशीटर, जिनके पास आवश्यक आपराधिक इतिहास है, से सम्बंधित हिस्ट्रीशीट और सर्विलांस की जानकारी को गोपनीय रखा जाना चाहिए, जिसे सार्वजनिक रूप से साझा नहीं किया जा सकता है और ऐसे हिस्ट्रीशीटरों की पुलिस स्टेशनों पर तस्वीरें पोस्ट करने का भी कोई सवाल नहीं है।"

इलाहाबाद उच्च अदालत ने अपने आदेश में के. पुट्टास्वामी एवं अन्य बनाम भारत संघ AIR 2017 SC 4161 मामले में निर्णय का हवाल करते हुए व्यक्ति की प्राइवेसी पर जोर दिया दिया और कहा कि एक व्यक्ति की गोपनीयता के हित, राज्य और व्यक्तिगत हितों को जोड़कर ओवरराइड किये जा सकते हैं।

इस मामले (पुट्टास्वामी) में ऐसे कुछ परीक्षणों और बेंच मार्क का उल्लेख किया गया है, जो हैं दायित्व, वैध लक्ष्य, आनुपातिक और प्रक्रियात्मक गारंटी और ऐसे परीक्षणों और बेंच मार्क की संतुष्टि के पश्च्यात ही किसी की प्राइवेसी के ऊपर राज्य और सार्वजनिक हित को वरीयता दी जा सकती है, हालाँकि इस मामले में ऐसी संतुष्टि अदालत को होती नजर नहीं आयी।

जब हिस्ट्रीशीटर के सम्बन्ध में अदालत द्वारा गोपनीयता को उचित महत्व देने की बात की जाती है, तो आखिर क्यों राज्य सरकार द्वारा कथित प्रदर्शनकारियों के पोस्टर-बैनर लगाते हुए उनकी प्राइवेसी के बारे में नहीं सोचा जाना चाहिए? यह वह सवाल है, जिसपर ख़ास तौर पर गौर किया जाना चाहिए।

[यह लेख इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सोमवार के आदेश में उल्लिखित कुछ महत्वपूर्ण बातों को रेखान्खित करने एवं लेखक के इस पूरे प्रकरण पर कुछ निजी विचारों को प्रस्त्तुत करने का एक प्रयास है। मौजूदा लेख में जरूरत के मुताबिक, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश का हवाला दिया गया है, जिससे पाठक इस लेख में उठाये गए बिन्दुओं को बेहतर ढंग से समझ सकें।]

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