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निर्वाचन अपराधों के 100 साल : समयानुसार बदलाव की आवश्यकता

-रतन कुमार श्रीवास्तव, आ�
5 Nov 2020 4:45 AM GMT
निर्वाचन अपराधों के 100 साल  : समयानुसार बदलाव की आवश्यकता
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शरीर में मेरुदंड का जो स्थान है वही स्थान जनतंत्र में चुनावों का है। यदि मेरुदंड में कहीं भी कोई विकार पैदा होता है तो शरीर की शक्ति क्षीण होने लगती है, ठीक उसी तरह जब चुनाव प्रक्रिया में कोई विकार पैदा होता है तो जनतंत्र की नींव भी हिल जाती है।

इतिहास गवाह है कि भारत ही नहीं, पूरे विश्व की जितनी भी जनतांत्रिक सरकारें हैं, वहां पर चुनाव प्रक्रिया को दूषित करने का प्रायः प्रयास किया जाता रहा है। चुनाव की सुचिता बनाए रखने के लिए प्रत्येक देश में विभिन्न मानवीय गतिविधियों को विभिन्न अपराधों की परिधि में रखा गया है, जिन्हें हम चुनाव अथवा 'निर्वाचन अपराध' का नाम देते हैं । भारत में भारतीय दंड संहिता, 1860 (Indian Penal Code, 1860) के अंतर्गत बहुत सी ऐसी धाराएं बनाई गई हैं जो निर्वाचन अथवा चुनाव से संबंधित विभिन्न गतिविधियों को चुनाव अपराध घोषित करती हैं।

भारतीय दंड संहिता का सृजन 1860 में किया गया था किन्तु अध्याय 9-क (Chapter 9A) में निर्वाचन सम्बन्धी अपराधों का वर्णन जो किया गया है, वह भारतीय दंड संहिता में आज से 100 साल पहले, वर्ष 1920 में संशोधित कर, बाद में जोड़े गए थे। ये चुनाव अपराध जो धारा 171-क (Sec. 171A) से लेकर 171-झ (171-I) में वर्णित किये गए हैं, वे वर्तमान समय में कितने प्रसांगिक रह गए हैं, इसका विश्लेषण हम आगे की पंक्तियों में देखेंगे।

वर्ष 1919 भारतीय जनतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहीं से भारतीय संसदीय जनतंत्र का प्रारंभ माना जाता है जब ब्रिटिश हुकूमत ने आंशिक रूप से चुनाव प्रक्रिया का आरम्भ किया था। 23 दिसंबर, 1919 को भारत सरकार अधिनियम, 1919 (Government of India Act, 1919) पास किया गया था । इस अधिनियम की प्रस्तावना में यह अंकित किया गया था कि ब्रिटिश सरकार धीरे-धीरे भारत में चुने हुए प्रतिनिधियों की उत्तरदाई सरकार को लाना चाहती है।

इस अधिनियम के द्वारा केंद्र में दो सदनों की व्यवस्था की गई - एक लोअर हाउस जिसे लेजिस्लेटिव असेंबली कहा जाता था और दूसरा अपर हाउस जिसे काउंसिल आफ स्टेट कहा जाता था। इस अधिनियम द्वारा सीमित संख्या में प्रतिनिधियों के चुने जाने की व्यवस्था की गई, किंतु यह समय काफी उथल-पुथल का था। इस समय रॉलेट एक्ट (Rowlatt Act अथवा the Anarchical and Revolutionary Crimes Act,1919) का विरोध चल रहा था, जो सरकार को भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की गिरफ्तारी का आपातकालीन निरंकुश अधिकार देता था। इसी वर्ष 13 अप्रैल, 1919 को जलियाँवाला बाग नरसंहार कांड भी हुआ था।

पूरे भारत में, और विशेषकर पंजाब और बंगाल में राजनीतिक विरोध अपने चरम सीमा पर था और इन परिस्थितियों से निपटने के लिए अंग्रेजी सरकार ने भारत सरकार अधिनियम, 1919 पारित किया था । इसी 1919 के अधिनियम के गर्भ से भारतीय दंड सहिंता के अध्याय 9-क (Chapter 9A ) का जन्म हुआ था जिसमें विभिन्न तरह के चुनाव अपराधों का सृजन किया गया था । हम कल्पना कर सकते हैं कि उस समय जो परिदृश्य स्वतंत्रता संग्राम का था वह कितना भयावह था। जलियाँवाला बाग काण्ड में जनरल डायर ने 1650 राउंड गोलियां चलवा कर हजारों लोगों को मरवा दिया था। चुनाव मात्र एक दिखावा था। साल भर के बाद Indian Elections Offences and Inquiries Act, 1920 पास किया गया जिसके द्वारा भारतीय दंड संहिता में अध्याय 9-क (Chapter 9A) जोड़ कर धारा 171-क से लेकर 171-झ (Sec. (Sec. 171-A to171-I) तक, चुनाव अपराध की धाराओं को सृजित किया गया। तत्कालीन दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 की धारा 166 में यह व्यवस्था दी गई थी कि कोई भी प्राइवेट मुकदमा बिना सरकार की अनुमति के पंजीकृत नहीं होगा और न ही कोई भी न्यायालय इसका विचारण (trial) करेगा।

धारा 171-ङ (Sec. 171E) में वोट देने के लिए रिश्वतखोरी को एवं धारा 171-च (Sec. 171-F) में वोट के लिए अनुचित दबाव देने या किसी दूसरे के नाम पर फर्जी वोट डालने को अपराध घोषित कर 1 वर्ष की सजा या आर्थिक दण्ड या दोनों का प्रावधान रखा गया और यदि वोट के लिए खानपान रसद आदि से आदर सत्कार कर प्रकारांतर से कोई रिश्वतखोरी करता है तो उसके लिए केवल आर्थिक दंड की व्यवस्था की गई थी।

किसी अभ्यर्थी (candidate) को बदनाम करने के लिए झूठे तथ्य प्रकाशित करना, किसी अभ्यर्थी के प्रचार प्रसार के लिए अवैधानिक ढंग से धन का भुगतान करना और चुनाव के संबंध में सही-सही अकाउंट ना रखना यह तीनों अपराध क्रमशः धरा 171-छ (Sec. 171-G) , 171-ज, (Sec. 171-H) और 171-झ (Sec. 171-I), में केवल ₹ 500 आर्थिक दंड से दंडित बनाए गए। सबसे महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इन 5 अपराधों में से 4 अपराध असंज्ञेय (non-cognizable) हैं, जिसका अर्थ यह है कि बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के, इसमें कोई भी जांच-पड़ताल या तफ्तीश नहीं होती। इसे सामान्य भाषा में पुलिस NCR (non-cognizable report) कहती है। दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 155 के अनुसार यदि एन.सी.आर.की सूचना थाना-इंचार्ज को दी जाती है तो वह केवल उसे रजिस्टर में दर्ज कर लेगा और मजिस्ट्रेट के पास जाने को कहेगा। इसका सार यह है कि केवल एक अपराध - जो दूसरे के नाम पर फ़र्ज़ी वोट देने का है, उसे संगेय अपराध बनाया, परन्तु आज के विधिक परिवेश में जब 7 वर्ष से कम सजा से दंडनीय अपराध में गिरफ्तारी पर रोक (विशेष परिस्थितियों को छोड़कर) लगा दी गयी है तो इसका भी कोई महत्व नहीं रह जाता। साथ ही, ये सभी अपराध जमानतीय (bailable) हैं।

भारतीय विधि आयोग (Law Commission of India) के वर्ष 1971 की 42वीं रिपोर्ट में यह सिफारिश की गई थी कि यह बहुत ही कमज़ोर कानून है क्योंकि यदि कोई व्यक्ति पोलिंग बूथ पर कोई गंभीर अपराध कर रहा है, फिर भी उसकी गिरफ्तारी की इसमें कोई व्यवस्था नहीं है, क्योंकि इसे असंज्ञेय बनाया गया है । यह इस कानून की एक बहुत बड़ी कमज़ोरी है । आयोग ने सिफारिश की थी कि इसमें सज़ा का प्रावधान कम से कम 2 साल तक किया जाय, और इसीलिए कुछ राज्यों ने इसे संशोधित कर इसे संज्ञेय (cognizable) बनाया था।

इसके बाद वर्ष 1951 में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (the Representation of the People Act, 1951) अधिनियमित किया गया और इसमें धारा 123 में "भ्रष्ट आचरण" (corrupt practices) की परिभाषा दी गई, जिसमें "रिश्वत" (bribery) को भी आई.पी.सी. के अलावा दोबारा परिभाषित किया गया । उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें केवल ब्राइबरी की परिभाषा दी गई; उसके लिए दण्ड नहीं बनाया गया। 1951 के अधिनियम की धारा 8 के अनुसार यदि कोई आई.पी.सी. की धारा 171-ङ (Sec. 171E) व 171-च (Sec. 171-F) क्रमशः bribery या undue influence अर्थात रिश्वतखोरी एवं अनुचित दबाव का अपराध करता है तो वह डिसक्वालीफाई तो किया जा सकता है किंतु इस अधिनियम में भी उसे दंडित करने का कोई प्रावधान नहीं बनाया गया है । इस तरह, कोई भी कैंडिडेट केवल अयोग्य साबित हो सकता है, अभियुक्त साबित नहीं हो सकता । उसके अपराध को साबित करने के लिए आई.पी.सी. की जो धाराएं बनाई गई हैं,उसी में कार्रवाई करनी होंगी, जो कि बहुत ही हल्की है और कम सजा से दंडित की जाने वाली हैं।

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(3) में जो व्यवस्था दी गई है उसके अनुसार यदि 2 साल की सजा का दंड किसी उम्मीदवार को दिया जाता है तभी उसकी उम्मीदवारी निरस्त होती है या वह अयोग्य ठहराया जाता है, जबकि भारतीय दंड संहिता में जो भी अपराध बनाए गए हैं, वह केवल 1 वर्ष की सजा से ही दंडनीय हैं । यह भी उल्लेखनीय है कि अयोग्य ठहराने के लिए लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 80 एवं 80A के अन्तर्गत केवल उच्च न्यायलय (High Court) में ही निर्वाचन अर्ज़ी (Election Petition) दी जा सकती है, जो साधारण काम नहीं है । इस प्रकार, इन सभी धाराओं में दंडित होने के बाद भी प्रत्येक कैंडिडेट अपनी उम्मीदवारी बनाए रख सकता है । दण्ड का जो उद्देश्य है - कि गलत कार्यों के प्रति व्यक्ति में भय पैदा हो और उसकी वह पुनरावृत्ति ना करें, यह उद्देश्य भारतीय दंड संहिता, 1860 एवं लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की इन धाराओं से पूर्णतः विफल हो जाता है।

यह भी उल्लेखनीय है कि चुनाव संबंधी लगभग सभी अपराध पुलिस के द्वारा ही स्वयं वादी बनकर या चुनाव के दिन पीठासीन अधिकारी या चुनाव कर्मियों द्वारा ही कायम कराए जाते हैं ,और एन.सी.आर. होने के कारण, मजिस्ट्रेट से आर्डर लेकर कार्यवाही करने का दायित्व भी पुलिस या चुनाव अधिकारियों का ही बनता है। चुनावी आपाधापी में किसी भी पुलिस के अधिकारी को इतना समय प्राप्त नहीं होता कि वह चुनाव के दौरान न्यायालय में जाकर ,पैरवी कर उसका आदेश प्राप्त कर तत्काल उसकी विवेचना करे क्योंकि चुनाव के दौरान शांति व्यवस्था की जिम्मेदारी को निभाना सर्वप्रथम कार्य होता है । प्रायः सभी अपराध चुनाव के बाद ही विवेचित होते हैं या फिर लंबित रहते हैं।

एक संसदीय उम्मीदवार को अपने क्षेत्र में चुनाव के लिए जो खर्च की सीमा निर्धारित की गई है वह लगभग 50 लाख से लेकर 70 लाख तक है, एवं एक विधानसभा उम्मीदवार के लिए खर्च की सीमा 20 लाख से 28 लाख रखी गई है । यह विचारणीय बिंदु है कि जहां खर्च की सीमा लाखों में रखी गई है वहीं चुनाव अपराधों के लिए आर्थिक दंड की सीमा मात्र ₹ 500 और उसके आसपास रखी गयी है । अब सवाल उठता है कि 1920 का कानून लगभग 100 साल पुराना हो चुका है, इस कानून से पुलिस आज चुनाव प्रक्रिया की शुचिता और उसकी पवित्रता को बनाए रखने के लिए कितनी प्रभावी हो सकती है।

भारतीय विधि आयोग वर्ष 1971 की अपनी 42वीं रिपोर्ट में संशोधन के लिए पहले ही सिफारिश कर चुका है, फिर भी अभी तक इसमें कोई परिवर्तन नहीं लाया गया । आज की आवश्यकता है कि इन सभी धाराओं में संशोधन के लिए माननीय चुनाव आयोग, भारतीय विधि आयोग ए्वं केंद्रीय सरकार को इस 100 साल पुरानी कानूनी प्रक्रिया को संशोधित करने पर विचार करना चाहिए और एक मजबूत कानून सृजित करना चाहिए ताकि पुलिस प्रशासन चुनाव के दौरान और सशक्त हो सके और प्रभावी ढंग से शांति व्यवस्था बनाते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करा सके।

-रतन कुमार श्रीवास्तव, आई. पी. एस. (सेवानिवृत्त)

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