प्रयाग ग्रुप मामला: 2,862 करोड़ की कथित धोखाधड़ी की गंभीरता, भगोड़ा घोषित होना और लापता धनराशि के चलते कलकत्ता हाइकोर्ट ने जमानत से किया इनकार
Amir Ahmad
16 Jan 2026 1:15 PM IST

कलकत्ता हाइकोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े एक बड़े मामले में प्रयाग ग्रुप के निदेशकों बसुदेब बागची और अविक बागची की नियमित जमानत याचिका खारिज की।
अदालत ने कहा कि हजारों निवेशकों के साथ लगभग 2,862 करोड़ की कथित धोखाधड़ी, आरोपियों का भगोड़ा घोषित होना और अपराध से अर्जित भारी राशि का अब तक पता न चल पाना, धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 45 के तहत उन्हें किसी भी तरह की राहत देने से रोकता है।
जस्टिस राजर्षि भारद्वाज और जस्टिस उदय कुमार की खंडपीठ ने कहा कि सार्वजनिक धन से जुड़े आर्थिक अपराध एक अलग श्रेणी में आते हैं। ऐसे मामलों को अधिक सख्त न्यायिक दृष्टि से देखा जाना चाहिए, खासकर तब जब आम नागरिकों की जीवनभर की कमाई दांव पर लगी हो।
अदालत ने स्पष्ट किया कि श्वेतपोश अपराधियों को कानून की अवहेलना करने की छूट नहीं दी जा सकती और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ठगे गए निवेशकों के सामूहिक हितों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
अदालत ने आरोपियों की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि वर्तमान मामला दोहरी सजा के निषेध के सिद्धांत के तहत प्रतिबंधित है।
हाइकोर्ट ने कहा कि धनशोधन एक निरंतर अपराध है और वर्ष 2016 के बाद कथित रूप से उत्पन्न हुई नई अपराधजनित आय एक अलग कारण-कार्रवाई को जन्म देती है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक कोई व्यक्ति अपराध से अर्जित धन से जुड़ी गतिविधियों में संलिप्त रहता है, तब तक धनशोधन का अपराध जारी माना जाएगा।
खंडपीठ ने इस तथ्य को विशेष महत्व दिया कि दोनों आरोपियों को न्यायिक प्रक्रिया से बचने और गैर-जमानती वारंट का पालन न करने के कारण भगोड़ा घोषित किया गया।
अदालत ने कहा कि इस आचरण के चलते उनकी जमानत की मांग पर गंभीर आघात पहुंचता है, क्योंकि वे फरार होने की आशंका, साक्ष्यों से छेड़छाड़ और गवाहों को प्रभावित करने के जोखिम की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
PMLA की धारा 45 के तहत लगाए गए वैधानिक प्रतिबंध पर अदालत ने कहा कि तथाकथित “दोहरी शर्तें” केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि विधायिका की स्पष्ट मंशा हैं। लगभग ₹1,906 करोड़ की अब तक बेहिसाब और लापता राशि को देखते हुए अदालत इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी कि आरोपियों के दोषी न होने के बारे में कोई ठोस आधार मौजूद है।
अदालत ने हाल के कुछ सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर आरोपियों की निर्भरता को भी अस्वीकार कर दिया और कहा कि वे निर्णय अपने विशेष तथ्यों पर आधारित थे।
वर्तमान मामला गहरी वित्तीय साजिश, कानून से व्यवस्थित बचाव और बड़े पैमाने पर सार्वजनिक नुकसान से जुड़ा हुआ है, जो इसे अलग बनाता है।
रिष्ठ नागरिक आरोपी की स्वास्थ्य संबंधी दलील पर अदालत ने कहा कि PMLA की धारा 45 के पहले प्रावधान के तहत जमानत का कोई स्वतः अधिकार नहीं बनता और हिरासत के दौरान भी समुचित मेडिकल सुविधा सुनिश्चित की जा सकती है।
अंततः जमानत याचिका खारिज करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि आरोपी PMLA के तहत आवश्यक शर्तों को पूरा करने में असफल रहे हैं और लापता धनराशि का पता लगाने के लिए उनकी हिरासत अभी आवश्यक है।
हालांकि, त्वरित सुनवाई के अधिकार की रक्षा के लिए अदालत ने ट्रायल कोर्ट को दिन-प्रतिदिन सुनवाई करने का निर्देश दिया और प्रवर्तन निदेशालय से कहा कि वह अनावश्यक स्थगन मांगे बिना गवाहों की पेशी सुनिश्चित करे।

