मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के पुलिस के कथित मौखिक निर्देश पर जनहित याचिका खारिज, कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा- आरोप अस्पष्ट
Amir Ahmad
18 Aug 2026 5:10 PM IST

पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के लिए पुलिस द्वारा कथित तौर पर मौखिक निर्देश दिए जाने के आरोप वाली जनहित याचिका को कलकत्ता हाईकोर्ट ने मंगलवार को खारिज की। हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका में लगाए गए आरोप अस्पष्ट हैं और उनके समर्थन में कोई ठोस सामग्री पेश नहीं की गई।
मामले की सुनवाई एक्टिंग चीफ जस्टिस तपाब्रत चक्रवर्ती और जस्टिस अतारुप बनर्जी की खंडपीठ ने की। याचिका में आरोप लगाया गया कि पुलिस अधिकारियों ने मस्जिदों के प्रतिनिधियों के साथ बैठकें कीं और उन्हें लाउडस्पीकर हटाने के मौखिक निर्देश दिए। याचिकाकर्ता का कहना था कि ऐसा सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय उन दिशा-निर्देशों के बावजूद किया जा रहा है, जिनके तहत निर्धारित ध्वनि सीमा के भीतर लाउडस्पीकर के इस्तेमाल की अनुमति है।
सुनवाई की शुरुआत में राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि उसे मिले निर्देश के अनुसार पुलिस अधिकारियों ने याचिका में लगाए गए आरोपों के अनुसार कुछ भी नहीं किया। कोर्ट ने पूछा कि क्या मस्जिद प्रतिनिधियों के साथ कथित बैठक भी नहीं हुई थी। एडवोकेट जनरल ने इसका जवाब भी नकारात्मक में दिया।
इसके बाद राज्य की ओर से जनहित याचिका की सुनवाई योग्य होने पर प्रारंभिक आपत्ति उठाई गई। एडवोकेट जनरल ने कहा कि याचिका एक वकील ने कथित मौखिक निर्देशों के आधार पर दायर की, लेकिन यह नहीं बताया गया कि ये निर्देश किस अधिकारी या प्राधिकरण ने दिए।
एडवोकेट जनरल ने कहा कि किसी वैधानिक प्रावधान के उल्लंघन को साबित करने वाला कोई दस्तावेज भी याचिका में नहीं है और आरोप अस्पष्ट हैं। राज्य ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता ने इमामों और मस्जिद प्रतिनिधियों से मिली कथित जानकारी का उल्लेख किया, लेकिन इनमें से कोई भी व्यक्ति अदालत के सामने नहीं आया।
राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि पुलिस द्वारा मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के आरोप मुख्य रूप से समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों पर आधारित हैं।
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को लेकर पहले जारी दिशा-निर्देशों का उल्लेख किया। कोर्ट ने राज्य से पूछा कि यदि निर्धारित ध्वनि सीमा के उल्लंघन पर ही कार्रवाई की जानी है तो केवल आरोपों के आधार पर पुलिस हस्तक्षेप कैसे कर सकती है।
एडवोकेट जनरल ने कहा कि पुलिस और मस्जिद प्रतिनिधियों के बीच कथित बैठकों के बारे में याचिका में पर्याप्त विवरण नहीं दिया गया। उन्होंने इन आरोपों को निराधार आरोप बताया और जनहित याचिकाओं में तथ्यों के स्पष्ट उल्लेख से संबंधित विभिन्न न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मौजूदा याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।
याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट कल्याण बनर्जी ने राज्य की आपत्ति का विरोध किया। उन्होंने कहा कि जनहित याचिका को सामान्य दीवानी या आपराधिक मुकदमे की तरह नहीं देखा जा सकता जिसमें शुरुआत से ही हर तथ्य को पूरी तरह साबित करना जरूरी हो।
उन्होंने कहा कि जनहित याचिका की व्यवस्था में मुख्य बात जनता की शिकायत और उससे जुड़ा कारण है। उनके अनुसार अदालत का दायित्व है कि वह शिकायत के वास्तविक स्वरूप की जांच करे।
सीनियर एडवोकेट ने कहा कि शुरुआती स्तर पर यह जरूरी नहीं है कि याचिकाकर्ता सामान्य दीवानी मुकदमे की तरह पूरे मामले के सभी तथ्य पेश करे। उनके अनुसार अदालत को यह देखना होता है कि न्यायिक जांच शुरू करने के लिए पर्याप्त तथ्य मौजूद हैं या नहीं।
इमामों या मस्जिद समितियों के सदस्यों के अदालत का रुख नहीं करने की राज्य की दलील पर बनर्जी ने कहा कि यदि वही लोग अदालत में आ जाते हैं तो याचिका की जनहित प्रकृति ही समाप्त हो जाएगी।
उन्होंने राज्य के इस दावे का भी विरोध किया कि पुलिस और मस्जिद समितियों के बीच कोई बैठक नहीं हुई। सीनियर एडवोकेट ने कहा कि याचिका में उठाई गई शिकायत पुलिस की कथित कार्रवाई से संबंधित है और अदालत को तकनीकी आपत्तियों के बजाय शिकायत के मूल मुद्दे पर विचार करना चाहिए।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने भी कहा कि जनहित याचिका में उठाई गई शिकायत पर विचार किया जाना चाहिए और केवल तकनीकी आधार पर उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सीनियर एडवोकेट ने कहा कि याचिकाकर्ता केवल सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय दिशा-निर्देशों के पालन की मांग कर रहा है। उनके अनुसार यदि लाउडस्पीकर का इस्तेमाल निर्धारित सीमा के भीतर किया जा रहा है तो अधिकारियों को बिना किसी उल्लंघन के उसे रोकने का अधिकार नहीं है।
हालांकि राज्य की ओर से लगाए गए प्रारंभिक आपत्ति और याचिका में ठोस सामग्री के अभाव संबंधी दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने जनहित याचिका खारिज की।


