सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत भरण-पोषण न्यायाधिकरण बच्चों को बेदखल करने का आदेश नहीं दे सकता: कलकत्ता हाइकोर्ट
Amir Ahmad
19 Feb 2026 4:24 PM IST

कलकत्ता हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत गठित भरण-पोषण न्यायाधिकरण को धारा 4 और 5 की कार्यवाही में बच्चों को संपत्ति से बेदखल करने का अधिकार नहीं है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्यायाधिकरण की शक्तियां केवल मासिक भरण-पोषण तय करने तक सीमित हैं, उन्हें परिसर खाली कराने तक विस्तारित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस कृष्णा राव ने उप-मंडल पदाधिकारी (जो भरण-पोषण न्यायाधिकरण के रूप में कार्य कर रहे थे) द्वारा पारित आदेशों में आंशिक संशोधन करते हुए पुत्र को मकान खाली करने के निर्देश को रद्द कर दिया जबकि भरण-पोषण संबंधी आदेश को बरकरार रखा।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भरण-पोषण न्यायाधिकरण अर्ध-न्यायिक कार्य करता है, इसलिए उसके आदेशों को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाइकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह मामला पश्चिम मेदिनीपुर स्थित तीन मंजिला आवासीय मकान को लेकर एक वृद्ध मां पुष्पा शर्मा और उनके दो पुत्रों के बीच विवाद से जुड़ा था। पति के निधन के बाद मां ने आरोप लगाया कि पुत्रों ने उन्हें घर से निकाल दिया और भरण-पोषण नहीं किया।
उन्होंने न्यायाधिकरण के समक्ष प्रति माह 30,000 रुपये भरण-पोषण तथा मेडिकल खर्च की प्रतिपूर्ति की मांग की।
6 सितंबर और 6 दिसंबर, 2024 के आदेशों में उप-मंडल पदाधिकारी ने पुत्रों को मासिक भरण-पोषण देने का निर्देश दिया। साथ ही तीन माह के भीतर मकान खाली करने का आदेश भी पारित किया।
पुत्रों में से एक ने बेदखली के निर्देश को हाइकोर्ट में चुनौती दी, जबकि मां ने उस आदेश के क्रियान्वयन की मांग की।
हाइकोर्ट का निर्णय
अदालत ने 2007 के अधिनियम की रूपरेखा का परीक्षण करते हुए कहा कि अध्याय-2 केवल माता-पिता और सीनियर सिटीजन के भरण-पोषण से संबंधित है और न्यायाधिकरण को केवल मासिक भरण-पोषण निर्धारित करने का अधिकार देता है।
अदालत ने कहा,
“धारा 4 और 5 केवल भरण-पोषण प्रदान करने की परिकल्पना करती हैं। इनमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बेदखली का कोई उल्लेख नहीं है। ऐसे आवेदन पर न्यायाधिकरण बेदखली का आदेश पारित नहीं कर सकता।”
न्यायालय ने यह भी कहा कि अधिनियम का उद्देश्य एक संक्षिप्त और त्वरित प्रक्रिया के माध्यम से सीनियर सिटीजन को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है न कि संपत्ति संबंधी विवादों के लिए दीवानी उपायों का विकल्प बनना।
इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने न्यायाधिकरण के उस हिस्से को निरस्त कर दिया, जिसमें पुत्र को भवन खाली करने का निर्देश दिया गया, जबकि भरण-पोषण संबंधी आदेश को यथावत रखा।

