जर्जर और गिराए जाने वाले भवन में बिजली कनेक्शन का आदेश नहीं दे सकता कोर्ट: कलकत्ता हाईकोर्ट
Amir Ahmad
23 Sept 2026 3:32 PM IST

कलकत्ता हाईकोर्ट ने ऐसे भवन में बिजली कनेक्शन देने का निर्देश देने से इनकार किया, जिसे कोलकाता नगर निगम ने असुरक्षित घोषित कर गिराने का आदेश दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि जहां भवन की स्थिति के कारण जान-माल की गंभीर सुरक्षा जोखिम हो, वहां बिजली आपूर्ति के लिए वितरण कंपनी को अनिवार्य निर्देश नहीं दिया जा सकता।
जस्टिस ओम नारायण राय ने एम/एस एसए प्रिंटर्स और एक अन्य की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं ने कोलकाता के माणिकतला मेन रोड स्थित 121/4के परिसर में संचालित प्रिंटिंग प्रेस के लिए सीईएससी लिमिटेड से बिजली कनेक्शन उपलब्ध कराने की मांग की।
याचिकाकर्ताओं का दावा था कि वे उक्त परिसर में किरायेदार हैं और उन्होंने प्रिंटिंग प्रेस के लिए बिजली कनेक्शन के लिए आवेदन किया। उनके अनुसार, शुरुआत में सीईएससी ने बताया था कि परिसर तक पहुंच कचरे के ढेर के कारण बाधित है। बाद में कोलकाता नगर निगम ने कचरा हटाकर इसका प्रमाणपत्र जारी किया।
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इसकी जानकारी CESC को दिए जाने के बाद वितरण कंपनी ने रुख अपनाया कि निजी प्रतिवादियों की ओर से आपत्ति की गई और जब तक याचिकाकर्ता पुलिस की सहायता नहीं लेते या आपत्ति का समाधान नहीं कराते, तब तक बिजली आपूर्ति नहीं की जा सकती। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने माणिकतला थाने से संपर्क किया और पुलिस अधिकारियों द्वारा कथित रूप से जारी लिखित अनापत्ति पर भरोसा किया।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि निजी प्रतिवादियों, जो भवन के मकान मालिक हैं, ने पहले उन्हें बेदखल करने के लिए मुकदमा दायर किया। यह मुकदमा 9 जनवरी 2025 को डिफॉल्ट के कारण खारिज हो गया। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन), द्वितीय कोर्ट, सियालदह के समक्ष टाइटल सूट नंबर 470/2025 दायर किया। उन्हें अंतरिम राहत देते हुए निजी प्रतिवादियों को कानून के अनुसार कार्रवाई किए बिना उन्हें परिसर से बेदखल करने से रोक दिया गया।
वहीं, CESE ने बिजली कनेक्शन देने का विरोध करते हुए कहा कि जिस परिसर में बिजली आपूर्ति की मांग की जा रही है उसे कोलकाता नगर निगम पहले ही गिराने का आदेश दे चुका है।
कोर्ट को बताया गया कि इसी भवन के एक अन्य किरायेदार ने निगम के ध्वस्तीकरण आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
जस्टिस राय की पीठ ने पाया कि उसी परिसर से संबंधित WPA 21796/2025 में समन्वय पीठ ने 22 सितंबर 2025 को ध्वस्तीकरण और भवन खाली करने का आदेश बरकरार रखा। उस आदेश में दर्ज किया गया कि भवन का एक हिस्सा पहले ही गिर चुका था और बाकी ढांचा भी जल्द गिरने के गंभीर खतरे में था।
निजी प्रतिवादियों ने भी कहा कि भवन बेहद जर्जर स्थिति में है और इससे जान-माल को गंभीर खतरा है।
जस्टिस राय ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने कोलकाता नगर निगम और माणिकतला पुलिस थाने को भेजे गए पत्रों पर लिखी कुछ हस्तलिखित टिप्पणियों पर काफी भरोसा किया। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि ये टिप्पणियां अदालत का विश्वास पैदा नहीं करतीं। इसके बावजूद कोर्ट ने यह मानते हुए कि दस्तावेज वास्तविक हैं, मामले पर विचार किया और स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में भी भवन को बिजली देने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि यदि इन दस्तावेजों को सही मानकर भी देखा जाए तब भी भवन की गंभीर स्थिति को देखते हुए ऐसे परिसर में बिजली आपूर्ति का निर्देश नहीं दिया जा सकता, जिसे ध्वस्त किए जाने का आदेश दिया जा चुका है।
हाईकोर्ट ने उसी भवन से जुड़े पहले के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि समन्वय पीठ ने पाया कि भवन का एक हिस्सा पहले ही ढह चुका है और बाकी ढांचा भी गिरने के आसन्न खतरे में है। ऐसी जर्जर और असुरक्षित इमारत को केवल किरायेदारी के अधिकारों को बनाए रखने के लिए खड़ा रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 43 पर भी विचार किया। इस धारा के तहत संबंधित परिसर के मालिक या कब्जाधारी द्वारा आवेदन किए जाने पर बिजली आपूर्ति किया जाना अनिवार्य है लेकिन यह प्रावधान अधिनियम की अन्य शर्तों के अधीन है।
जस्टिस राय ने कहा कि इन प्रावधानों में परिसर और उसके आसपास लोगों तथा संपत्ति की सुरक्षा से जुड़े पहलुओं को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। कोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में भवन की जर्जर स्थिति के कारण सुरक्षा का गंभीर खतरा मौजूद है और परिसर को पूरी तरह ध्वस्त किए जाने का आदेश भी दिया जा चुका है। ऐसे में वितरण कंपनी को वहां बिजली आपूर्ति करने का अनिवार्य निर्देश देना पूरी तरह अनुचित होगा।
हाईकोर्ट ने CESE को बिजली कनेक्शन देने के लिए परमादेश जारी करने का कोई आधार नहीं पाया और WPA 21296/2026 को बिना किसी जुर्माने के खारिज किया।

