14 साल से अलग रहना, पत्नी और बेटे के प्रति पति की बेरुखी क्रूरता: कलकत्ता हाईकोर्ट ने तलाक बरकरार रखी

  • 14 साल से अलग रहना, पत्नी और बेटे के प्रति पति की बेरुखी क्रूरता: कलकत्ता हाईकोर्ट ने तलाक बरकरार रखी

    कलकत्ता हाईकोर्ट ने महिला को क्रूरता के आधार पर दिए गए तलाक का आदेश बरकरार रखा।

    अदालत ने कहा कि 14 साल से अधिक समय तक पति-पत्नी का अलग रहना और पति का अपनी पत्नी व बेटे के प्रति उदासीन रवैया यह दर्शाता है कि उनके वैवाहिक संबंध इस हद तक बिगड़ चुके हैं कि अब उनका साथ रहना संभव नहीं है।

    जस्टिस मधुरेश प्रसाद और जस्टिस पार्थ प्रतिम रॉय की खंडपीठ ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत विवाह का पूरी तरह टूट जाना अपने आप में तलाक का स्वतंत्र आधार नहीं है। हालांकि, यदि वैवाहिक संबंध लंबे समय से कड़वाहट और कटुता से भरे हों, तो ऐसी स्थिति भी अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता मानी जा सकती है।

    पीठ ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच संबंध इतने खराब हो चुके हैं कि उनका एक साथ रहना संभव नहीं रह गया।

    हाईकोर्ट अरूप कुमार सूर की अपील पर सुनवाई कर रहा था। उन्होंने 12 अक्टूबर 2023 को ट्रायल कोर्ट द्वारा उनकी पत्नी आनंदमयी सूर को क्रूरता के आधार पर दिए गए तलाक के आदेश को चुनौती दी थी।

    दोनों की शादी जुलाई 2010 में हुई थी और जुलाई 2011 में उनके बेटे का जन्म हुआ। पत्नी के मुताबिक, बेटे के जन्म के कुछ समय बाद ही पति ने उस पर मायके से पैसे लाने का दबाव बनाना शुरू किया। उसने आरोप लगाया कि उसके पिता की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे पति की मांग पूरी कर सकें। इसके बाद पति उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने लगा। पत्नी ने यह भी आरोप लगाया कि पति अक्सर नशे की हालत में घर लौटता था और बीमार होने पर उसे इलाज तक नहीं दिलाता था।

    महिला का कहना था कि आखिरकार उसे अपने बेटे के साथ वैवाहिक घर से निकाल दिया गया। इसके बाद पति ने न तो उन्हें वापस लाने का प्रयास किया और न ही पत्नी या बेटे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उठाई।

    पति ने तलाक की कार्यवाही में इन आरोपों से इनकार किया। उसका दावा था कि पत्नी खुद वैवाहिक घर लौटने को तैयार नहीं थी, जबकि वह उसे वापस लाने के लिए उसके मायके गया।

    हाईकोर्ट में पति के वकील ने दलील दी कि पत्नी क्रूरता के आरोप साबित करने में विफल रही है। इस संबंध में पत्नी के उस बयान का हवाला दिया गया, जिसमें उसने स्वीकार किया कि कथित प्रताड़ना या पैसों की मांग को लेकर उसने पुलिस या पंचायत में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई।

    पति की ओर से यह भी कहा गया कि लंबे समय तक अलग रहने के आधार पर ही तलाक नहीं दिया जा सकता, क्योंकि हिंदू विवाह अधिनियम में विवाह का पूरी तरह टूट जाना स्वतंत्र कानूनी आधार नहीं है।

    दूसरी ओर, पत्नी के वकील ने कहा कि पति ने अपने लिखित जवाब में आरोपों का स्पष्ट खंडन नहीं किया और जिरह के दौरान भी कई महत्वपूर्ण आरोपों को चुनौती नहीं दी।

    वकील ने पति के उन बयानों की ओर भी अदालत का ध्यान दिलाया, जिनमें उसने स्वीकार किया कि उसे अपने बेटे की पढ़ाई के बारे में जानकारी नहीं थी और उसने बेटे की शिक्षा में सहयोग देने के लिए कोई कदम नहीं उठाया था।

    मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि पति को यह भी पता नहीं था कि उसकी पत्नी वर्तमान में कहां रह रही है, जबकि उसका मायका पास के ही गांव में था। उसे अपने बेटे की पढ़ाई और उसके स्कूल के नाम तक की जानकारी नहीं थी।

    पीठ के अनुसार, ये बातें दर्शाती हैं कि पति न तो पत्नी के साथ रहने का इच्छुक था और न ही अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारियां निभाने में उसकी कोई रुचि थी।

    अदालत ने यह भी गौर किया कि पत्नी ने वैवाहिक घर से जबरन निकाले जाने के बारे में जो बयान दिया, पति ने जिरह के दौरान उसे चुनौती नहीं दी। इसके अलावा, ऐसा कोई सबूत भी नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि पति ने वैवाहिक संबंध सुधारने या पत्नी और बेटे को वापस लाने का वास्तविक प्रयास किया।

    इस संबंध में हाईकोर्ट ने अपने पुराने फैसले ए.ई.जी. करापिएट बनाम ए.वाई. डर्डेरिया का हवाला दिया। इस फैसले में कहा गया कि यदि कोई पक्ष जिरह के दौरान दूसरे पक्ष के गवाह के सामने अपने मामले से जुड़ी महत्वपूर्ण बात नहीं रखता, तो परिस्थितियों के अनुसार इसे उस गवाह के बयान को स्वीकार करने के रूप में देखा जा सकता है।

    पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के समर घोष बनाम जया घोष मामले का भी उल्लेख किया। इस फैसले में माना गया कि लंबे समय तक अलग रहना इस बात का संकेत हो सकता है कि वैवाहिक संबंध पूरी तरह टूट चुका है। ऐसी परिस्थितियों में कानूनी रूप से विवाह का बंधन बनाए रखने पर जोर देना मानसिक क्रूरता का कारण बन सकता है।

    हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के राकेश रमन बनाम कविता फैसले का भी संदर्भ दिया। इसमें कहा गया कि भले ही विवाह का पूरी तरह टूट जाना हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक का स्वतंत्र आधार न हो, लेकिन वर्षों से कटुता और तनाव से भरा वैवाहिक संबंध दोनों पक्षों के लिए क्रूरता का रूप ले सकता है।

    इन सभी तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों पर विचार करते हुए खंडपीठ ने कहा कि पति-पत्नी 14 साल से अधिक समय से अलग रह रहे हैं और उपलब्ध साक्ष्य पत्नी तथा बेटे के प्रति पति की बेरुखी को दर्शाते हैं।

    अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही आकलन करते हुए क्रूरता के आधार पर तलाक देने का निर्णय लिया। इसलिए हाईकोर्ट ने तलाक के आदेश को बरकरार रखते हुए पति की अपील खारिज की।

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