स्टांप पेपर पर किया गया 'कॉन्ट्रैक्ट विवाह' हिंदू कानून में अमान्य: कलकत्ता हाइकोर्ट
Amir Ahmad
9 March 2026 12:39 PM IST

कलकत्ता हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि केवल गैर-न्यायिक स्टांप पेपर पर हस्ताक्षर कर किया गया तथाकथित “कॉन्ट्रैक्ट विवाह” हिंदू कानून के तहत मान्य नहीं है। इसलिए ऐसे संबंध के आधार पर द्विविवाह या वैवाहिक क्रूरता के आपराधिक आरोप नहीं लगाए जा सकते।
जस्टिस उदय कुमार की पीठ ने एक व्यक्ति के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि हिंदू विवाह के लिए कानून में निर्धारित रीति-रिवाज और धार्मिक अनुष्ठान आवश्यक होते हैं। केवल स्टांप पेपर पर किया गया समझौता वैध विवाह का स्थान नहीं ले सकता।
मामला एक महिला की शिकायत से जुड़ा है, जिसमें उसने दावा किया कि 27 जून 2011 को उसका संबंध आरोपी के साथ वैवाहिक रिश्ते में बदल गया। हालांकि FIR में उसने खुद बताया कि यह “विवाह” केवल गैर-न्यायिक स्टांप पेपर पर हस्ताक्षर करके किया गया।
दोनों लगभग तीन साल तक साथ रहे। इसके बाद जुलाई, 2014 में आरोपी ने दूसरी महिला से विधिवत रजिस्टर्ड विवाह किया। इससे नाराज होकर महिला ने आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 494 (द्विविवाह) और 498ए (क्रूरता) के तहत मामला दर्ज कराया।
हाइकोर्ट ने कहा कि द्विविवाह का अपराध तभी बनता है, जब पहला विवाह कानून के अनुसार वैध रूप से संपन्न हुआ हो। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धाराओं के अनुसार विवाह का संपन्न होना पारंपरिक रीति-रिवाजों और धार्मिक विधियों के साथ होना जरूरी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल स्टांप पेपर पर किया गया समझौता इन कानूनी शर्तों को पूरा नहीं करता। इसलिए ऐसा “विवाह” कानूनी रूप से शून्य माना जाएगा।
पीठ ने कहा कि यदि पहला विवाह ही कानून के अनुसार वैध नहीं है तो उसके आधार पर द्विविवाह का मामला नहीं बन सकता।
अदालत ने यह भी देखा कि जब वैध विवाह का अस्तित्व ही नहीं है तो वैवाहिक क्रूरता से संबंधित धारा 498ए भी लागू नहीं हो सकती। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में पति शब्द की व्यापक व्याख्या की गई लेकिन वह उन मामलों पर लागू होती है जहां विवाह औपचारिक रीति-रिवाजों के साथ हुआ हो, भले ही वह बाद में अवैध माना जाए।
यह सिद्धांत उन संबंधों पर लागू नहीं होता जो शुरुआत से ही कानून की नजर में अस्तित्वहीन हों।
हाइकोर्ट ने कहा कि इस मामले में अभियोजन की पूरी कहानी कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है। ऐसे मामले में आरोपी को मुकदमे का सामना करने के लिए मजबूर करना आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
इसी आधार पर अदालत ने संबंधित आपराधिक कार्यवाही रद्द की और आरोपी को राहत दी। साथ ही यह स्पष्ट किया कि यदि शिकायतकर्ता चाहे तो वह अन्य कानूनों, जैसे घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण कानून, के तहत उपलब्ध कानूनी उपायों का सहारा ले सकती है।

