मरते समय न कोई बयान, न क्रूरता का सबूत: कलकत्ता हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न मामले में 24 साल बाद पति को किया बरी

Amir Ahmad

30 March 2026 11:22 AM IST

  • मरते समय न कोई बयान, न क्रूरता का सबूत: कलकत्ता हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न मामले में 24 साल बाद पति को किया बरी

    कलकत्ता हाईकोर्ट ने अहम फैसले में 24 साल पुराने मामले में पति को धारा 498ए के आरोप से बरी किया। अदालत ने कहा कि न तो क्रूरता का ठोस सबूत पेश किया गया और न ही कोई वैध मरते समय का बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) मौजूद था जिससे दोष सिद्ध किया जा सके।

    जस्टिस चैताली चटर्जी दास ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन पक्ष के आरोप अस्पष्ट, विरोधाभासी और भावनात्मक दावों पर आधारित थे, जिनमें कानूनी रूप से दोष साबित करने के लिए जरूरी ठोस आधार का अभाव था।

    मामला बोरेन मंडल की अपील से जुड़ा था जिन्हें 2002 में मालदा सेशन कोर्ट ने धारा 498ए के तहत दोषी ठहराते हुए दो साल की सजा सुनाई। आरोप था कि दहेज की मांग को लेकर पति द्वारा मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के कारण पत्नी ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली थी और अपनी नाबालिग बेटी को भी जहर दिया था। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने दहेज मृत्यु (धारा 304बी) के आरोप से पहले ही बरी किया था।

    हाईकोर्ट ने साक्ष्यों की जांच में कई गंभीर खामियां पाईं। अदालत ने पाया कि विवाह के 6-7 वर्षों के दौरान कभी भी उत्पीड़न या दहेज मांग को लेकर कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई। मृतका के भाई ने भी माना कि आरोपी का व्यवहार सामान्य था और मृतका ने कभी प्रताड़ना की शिकायत नहीं की।

    सबसे महत्वपूर्ण यह रहा कि मृतका की मां ने अदालत में स्वीकार किया कि उसने बेटी की मौत के बाद “रंजिश में” मामला दर्ज कराया। इस बयान ने पूरे मामले को गंभीर रूप से कमजोर किया।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में कोई वैध डाइंग डिक्लेरेशन नहीं था। केवल यह कहना कि “वह मर जाएगी” किसी भी तरह से कानूनी रूप से स्वीकार्य बयान नहीं माना जा सकता।

    जांच में भी कई कमियां सामने आईं न तो जहर की पहचान की गई न ही फोरेंसिक रिपोर्ट पेश की गई और न ही बच्ची की मौत से संबंधित कोई ठोस साक्ष्य दिया गया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि जब निचली अदालत पहले ही दहेज से जुड़े आरोपों को खारिज कर चुकी थी तो उसी आधार पर क्रूरता का आरोप भी टिक नहीं सकता।

    अंत में अदालत ने कहा कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने के लिए नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि और सजा को रद्द करते हुए आरोपी को बरी कर दिया और उसकी जमानत समाप्त करने का आदेश दिया।

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