रेलवे की 'नो-रिफंड' पॉलिसी को चुनौती: बॉम्बे हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर
LiveLaw Network
9 Jan 2026 6:45 PM IST

भारतीय रेलवे की तत्काल टिकट रिफंड नीति के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें रेलवे की 'नो-रिफंड' नीति को 'मनमाना' और 'असंवैधानिक' करार दिया। याचिका विशेष रूप से कंफर्म तत्काल टिकटों के रद्दीकरण (Cancellation) पर एक भी रुपया वापस न देने के रेलवे के नियमों को चुनौती दी।
प्रमुख आरोप: जनता की जेब पर डाका और 'अन्यायपूर्ण लाभ' (Unjust Enrichment)
याचिकाकर्ता और वकील सचिन तिवारी ने तर्क दिया कि जब कोई यात्री अपना कंफर्म तत्काल टिकट रद्द करता है तो रेलवे उस सीट को तुरंत वेटिंग लिस्ट वाले दूसरे यात्री को बेच देता है। इस प्रक्रिया में रेलवे एक ही सीट के लिए दो बार किराया वसूलता है:
1. पहले यात्री से: जिसका पूरा पैसा 'नो-रिफंड' नीति के तहत जब्त कर लिया जाता है।
2. दूसरे यात्री से: जिसे वही रद्द की गई सीट दोबारा बेची जाती है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि यह रेलवे द्वारा जनता के पैसे का 'अन्यायपूर्ण लाभ' (Unjust Enrichment) उठाने जैसा है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (गरिमा के साथ जीने का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।
RTI के चौंकाने वाले आंकड़े
याचिका में सूचना के अधिकार (RTI) से प्राप्त आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि रेलवे केवल टिकट रद्दीकरण से ही हजारों करोड़ रुपये कमा रहा है:
2022: वेटिंग लिस्ट टिकटों के रद्दीकरण से ₹887 करोड़ से अधिक की कमाई।
2023: यह आंकड़ा बढ़कर ₹1,042 करोड़ से ज्यादा हो गया।
नवंबर 2023: केवल 13 दिनों (5 से 17 नवंबर) के भीतर तत्काल वेटिंग लिस्ट रद्दीकरण से ₹2.91 करोड़ की कमाई हुई।
याचिकाकर्ता की मांगें (Prayers)
याचिका में न्यायालय से निम्नलिखित हस्तक्षेप की मांग की:
1. उचित रिफंड तंत्र: कंफर्म तत्काल टिकट रद्द करने पर एक वाजिब राशि वापस दी जानी चाहिए।
2. आपातकालीन छूट: चिकित्सा आपात स्थिति या परिवार में मृत्यु जैसे मामलों में पूर्ण रिफंड का प्रावधान हो।
3. पारदर्शिता: रेलवे हर साल तत्काल बुकिंग और रद्दीकरण से होने वाली कमाई का डेटा सार्वजनिक करे।
पुरानी नीति का हवाला
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि 2015 से पहले, पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे (Northeast Frontier Railway) जैसे कुछ जोन में तत्काल टिकट रद्द करने पर 25% रिफंड मिलता था। 2015 के नए नियमों के बाद इसे पूरी तरह खत्म कर दिया गया, जिसे याचिकाकर्ता ने 'जनविरोधी' कदम बताया है।
याचिकाकर्ता वकील सचिन तिवारी ने कहा कि यह लड़ाई करोड़ों मध्यमवर्गीय और गरीब यात्रियों के हितों की रक्षा के लिए है, जो रेलवे को परिवहन के मुख्य साधन के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

